हमारी बढ़ती हुई आबादी द्वारा प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते भार का स्वाभाविक प्रभाव पर्यावरण पर पड़ रहा है। प्राकृतिक संसाधनों जैसे वन, मिट्टी एवं जल से महिलाओं का गहरा संबंध है। भोजन, पानी, ईधन एवं आवास के संबंध में समस्याओं से तथा प्राकृतिक आपदाओं में  महिलाएं तुलनात्मक रूप सें ज्यादा प्रभावित होती है। महिलाओं का सशक्तिकरण, उनकी इच्छा शक्ति एवं पहल पर्यावरण संरक्षण तथा जनसंख्या नियंत्रण में विशेष भूमिका निभा सकते हैं। 50 प्रतिशत आबादी की पूर्ण सहभागिता के बिना वर्ष 2030 तक निर्धारित 17 सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति संभव नहीं है।


पिछले कुछ दिनों में पर्यावरण के संबंध में कुछ चिंताजनक खबरें आई हैं। कनाडा जैसे देश में गर्मी में तापमान 49 डिग्री पार होना तथा अमेरिका के उत्तरीय इलाकों में भीषण गर्मी पडऩा एक विस्मयकारी घटना है। पर्यावरणविद्, इस तरह की घटनाओं को पर्यावरण को लगातार हो रही क्षति से जोड़ रहे हैं तथा चेतावनी दे रहे है कि आने वाले समय में इस तरह की भीषण गर्मी का प्रकोप आम हो जाएगा। 
हमारे देश में इस वर्ष मानसून का अभी तक कमजोर रहना देश के लिए शुभ संकेत नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में असामान्य अथवा अप्रत्याशित बारिश तथा भू-स्खलन ने देश में भारी तबाही मचाई है। पर्यावरण चिंता को बढ़ाने वाली दो अन्य खबरे हैं, मध्यप्रदेश में छतरपुर में हीरा उत्खनन के लिए लगभग 3 लाख वृक्षों को काटने की योजना तथा देश में वर्ष 2020 में 48 विकास कार्यों हेतु लगभग 18000 हेक्टर वन भूमि का व्यपवर्तन। उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश में विकास के लिए बडी संख्या में वृक्षों को काटने से हो रहे नुकसान को हम पहले ही भुगत रहे हैं। पर्यावरण संबंधी शोध को ध्यान में रखते हुए हमें पर्यावरण संरक्षण हेतु ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण के साथ-साथ वनों के संरक्षण पर ध्यान देना तथा वनाच्छदान को कम होने से बचाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। 
अफसोस है कि बढ़ती आबादी तथा अंधाधुंध विकास की दौड़ ने पर्यावरण संरक्षण को गौण कर दिया है। विकास की प्रक्रिया में हमें अपने सम्पूर्ण ईको सिस्टम तथा मानव की भौतिक एवं मनौवैज्ञानिक आवश्यकताओं के बीच सामंजस्य रखना होगा।  
देश में जनसंख्या नियंत्रण हेतु कानून बनाने की मांग लगातार उठाई जा रही है तथा दो से अधिक संतान वालों व्यक्तिओं को दंडित करने, उन्हें मताधिकार, शासकीय सेवा एवं शासकीय सुविधाओं से वंचित करने की बातें की जा रही है। जनसंख्या वृद्धि की समस्या को साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास भी किया जा रहा है। ध्यान रखना होगा कि पूर्व में आपातकाल के समय जबारिया परिवार नियोजन कार्यक्रम के गंभीर दुष्परिणाम हुए थे तथा उसके चलते हमारा जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम कमजोर हो गया था, जिसका दुष्परिणाम एक तेज जनसंख्या वृद्धि में देखा गया। 
हमारी जनसंख्या नियंत्रण नीति में दंड के स्थान पर प्रोत्साहन देने पर ज्यादा ध्यान देने की तथा समाज में इस समस्या के प्रति चेतना जागृत करने की आवश्यकता है।  लैंगिक असमानता एवं महिलाओं एवं बालिकाओं में अल्पशिक्षा जनसंख्या वृद्धि नियंत्रण में सबसे बड़े बाधक है। देश में स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं करने वाली महिलाओं के औसतन 3.1 बच्चे होते है। जबकि 12वीं या उससे अधिक शिक्षा प्राप्त करने वाली महिलाओं में यह आकंड़ा 1.7 बच्चों का है। स्वास्थ्य सेवाओं में भी विशेष सुधार लाना होगा ताकि शिशु मृत्युदर तथा 10 वर्ष तक के बच्चों में कुपोषण की समस्या समाप्त हो सके। देखा गया है कि आर्थिक रूप में सक्षम परिवारों में अधिक बच्चे नहीं होते। अत: बालिकाओं  और महिलाओं को शैक्षणिक, आर्थिक, सामाजिक और कानूनी स्तर सशक्त बनाकर उन्हें घर से बाहर निकलकर कमाई के अवसर प्रदान करना चाहिए ताकि उनके परिवार की आमदनी और उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो। इसका प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष प्रभाव जनसंख्या वृद्धि दर पर भी पड़ेगा। 
शुभकामनाओं सहित.....