Wednesday, 18 September 2019, 7:30 PM

मेरी बात

आजादी का सपना

Updated on 2 September, 2019, 11:16
' हमें कहां जाना चाहिए और हमारी क्या कोशिश होना चाहिए, जिससे हम आम इंसान, किसानों और कामगारों के लिए आजादी के और अवसर ला सकें। हम एक सुखी, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील देश का निर्माण कर सकें और हम ऐसी सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक संस्थाओं की स्थापना कर सकें जो... आगे पढ़े

पर्यावरण और मानव जीवन...

Updated on 15 July, 2019, 11:47
प्रकृति के साथ की गई छेड़छाड़ एवं पर्यावरण को पहुंचाए गए नुकसान के कारण कैंसर एवं श्वास संबंधी बीमारियों ने बड़ी संख्या में मानव जाति को घेर लिया है। हमारे देश में 13 प्रतिशत व्यक्ति श्वांस की बीमारी तथा 8.3 प्रतिशत व्यक्ति कैंसर से मरते है। प्रकृति ने  हमें शुद्ध... आगे पढ़े

बढ़ती बेरोजगारी: एक राष्ट्रीय चुनौती

Updated on 18 June, 2019, 11:32
शिक्षा रोजगार प्राप्ति में सहायक हो सकती है, परंतु गारंटी नहीं हो सकती। सामाजिक और राष्ट्रीय आवश्यकताओं से सरोकार नहीं रखने वाली शिक्षा से ना तो रोजगार मिल सकता है और नहीं यह अच्छे नागरिक बनाने में सफल होती है। दुर्भाग्यवश हमारी शिक्षा पद्धाति इन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति में... आगे पढ़े

पानी गये न ऊबरे...

Updated on 21 May, 2019, 12:18
पानी एवं जैव विविधता का संरक्षण आज एक बड़ी चुनौती बन गया है तथा इस ओर हमारी उदासीनता ने मानव जीवन के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है। प्राचीन मानव सभ्यताओं का नाश प्राय: बाढ़ से हुआ था। परंतु अब अनेक विशेषज्ञों का मत है कि निकट भविष्य... आगे पढ़े

विधायिका में महिला सहभागिता

Updated on 21 May, 2019, 12:16
यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि विधायी निकायों में पुरुष और महिलाओं के संतुलित प्रतिनिधित्व से ही जटिल सामाजिक- आर्थिक समस्याओं को प्रभावी तरीके से हल किया जा सकता है। विधायिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने में लिए कानूनी आरक्षण से कहीं अधिक महिला उम्मीदवारों के बारे में राजनैतिक दलों की... आगे पढ़े

लोग साथ आते गये और कारवां बनता गया...

Updated on 21 May, 2019, 12:14
आवश्यकता इस बात की है कि महिलाएं पुरुषों की नकल नहीं करते हुए अपनी मौलिकता के साथ अपनी आंतरिक शक्ति का  समाज की शक्ति एवं टेक्नोलॉजी के साथ संतुलन बनाए रखते हुए सभी क्षेत्रों में अपनी उत्कृटता का प्रदर्शन करें। समाज की धारणा को उन्हें इस तरह बदलना होगा कि... आगे पढ़े

पर्यावरण और ऋतु संतुलन

Updated on 21 May, 2019, 12:12
जिस प्रकार प्राकृतिक आपदाएं जैसे तूफान, चक्रवात, सुनामी, भूकंप, ज्वालामुखी, वर्षा, बाढ़ आदि प्रकृति का स्वरूप बदलने की क्षमता रखते है, उसी प्रकार मानव भी अपने अविवेक पूर्ण क्रियाकलापों से नाजुक प्राकृतिक  संतुलन को बिगाड़कर भारी क्षति पहुंचा सकता है। इस संबंध में हमारी आज की गलतियों के लिए आने... आगे पढ़े

गणतंत्र और हम...

Updated on 21 May, 2019, 12:10
हमारे संविधान की संरचना में राज्य के नीति निदेशक तत्वों के साथ नागरिकों के अधिकारों एवं बुनियादी कर्तव्यों का समावेश कर एक आदर्श शासन व्यवस्था की परिकल्पना की गई है ताकि जनता द्वारा जनता के लिए जनता की सरकार का सपना साकार हो सकें। गणतंत्र का वांछित स्वरूप गण के... आगे पढ़े

प्रकृति संरक्षण : जियो और जीने दो

Updated on 27 July, 2018, 10:44
मानव के अस्तिव के लिए जरूरी है वह प्रकृति में विभिन्न जंतुओं एवं वनस्पति के संतुलन में विकृति उत्पन्न नहीं करे। विकास की अंधी दौड़ में सबसे अधिक नुकसान प्रकृति का ही हुआ है। प्रकृति संरक्षण से न केवल मानव जीवन सुरक्षित होता है बल्कि सम्पूर्ण प्राणी जगत को इससे... आगे पढ़े

वृक्षाय नम:

Updated on 18 June, 2018, 10:42
भारम में कुल वृक्षों की संख्या 35 अरब है तथा प्रति व्यक्ति 28 वृक्ष है। एक व्यक्ति को प्रति वर्ष लगभग 7-8 बड़े वृक्षों से आक्सीजन की आवश्यकता होती है।  हर व्यक्ति यदि प्रति वर्ष कम से कम 8 वृक्ष लगाने और उनके संरक्षण का संकल्प करें तो इसका अर्थ... आगे पढ़े

बिटिया हम शर्मिंदा हैं !

Updated on 23 May, 2018, 11:12
अजीब विसंगति है कि अक्सर हम देखते है कि हर परिवार में बेटियों पर अंकुश लगाया जाता है, किन्तु बेटों पर नहीं। जिस दिन से हम अपने परिवार के बेटों पर अंकुश लगाना और उनमें संस्कार तथा नारी की इज्जत की भवना डालना शुरू कर देंगे, नारी उत्पीडऩ जैसे सामाजिक... आगे पढ़े

बिन पानी सब सून !

Updated on 21 April, 2018, 8:18
बिन पानी सब सून ! संयुक्त राष्ट्र के अनुसार जलवायु संकट के बाद विश्व में पानी की कमी शताब्दी का सबसे बड़ा संकट है तथा सन् 2032 तक पृथ्वी की आधी से ज्यादा आबादी को पीने का पानी मिलना मुश्किल होगा। क्या उन विशेषज्ञों की बात सही होगी जो कह रहे... आगे पढ़े

कब होगा महिला सशक्तिकरण

Updated on 21 April, 2018, 8:16
अगर आदमी आजाद पैदा होते हैं तो औरतें गुलाम कैसे पैदा हो सकती हैं।  हमारे समाज में  जो महिलाएं सीमाओं की परवाह नहीं करतीं, वही बाधाओं को तोडऩे में सक्षम होती हैं।  प्रत्येक देश की विकास उड़ान के दो पंख होते हैं, स्त्री और पुरूष। देश की उन्नति एक पंख... आगे पढ़े

मातृभाषा और प्राथमिक शिक्षा

Updated on 21 April, 2018, 8:14
भाषा न केवल विचार की अभिव्यक्ति तथा संवाद का माध्यम है बल्कि संस्कृति का संवाहक भी है। यदि भाषा में संस्कृति न हो तो वह अपना संस्थागत स्थान  और सम्मान खो देती है।  बालक की प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में कराने की आवश्यकता एक सर्वमान्य तथ्य है। ........................ 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा... आगे पढ़े

गण है सर्वोपरि

Updated on 21 April, 2018, 8:10
गणतंत्र उतना ही शक्तिशाली या उतना ही कमजोर होता है जितना उसके गण चाहे। गण का तंत्र पर सकारात्मक नियंत्रण तथा उसको सुदृढ़ करने की प्रवृत्ति एवं लोकतंत्र तथा नागरिकों की रक्षा करने वाली संवैधानिक एवं अन्य संस्थाओं की स्वायत्तता ही एक प्रभावी एवं स्वस्थ गणतंत्र का मूल है। ................................. 31 दिसंबर... आगे पढ़े

सर्वांगिण विकास हो...

Updated on 27 July, 2016, 13:35
सर्वांगिण विकास हो... बच्चे राष्ट्र की अमूल्य धरोहर एवं भावी संसाधन होते हैं। बच्चे किसी भी समाज या राष्ट्र का भव्यिय होते हैं। राष्ट्र के भावी निर्माण के लिए आज के बच्चे के विकास के लिए अवसर प्रदान करना समाज व राष्ट्र की नैतिक जिम्मेदारी है। सरकार द्वारा बचपन को बचाने... आगे पढ़े

प्राकृतिक पर्यावरण ...

Updated on 27 July, 2016, 13:34
प्राकृतिक पर्यावरण ... पर्यावरण शब्द का निर्माण दो शब्दों परि+आवरण से मिलकर हुआ है। 'परिÓ अर्थात् चारो तरफ तथा आवरण का अर्थ है घेरा अर्थात् प्राकृति में जो भी हमारे चारो ओर है वायु, जल, मृदा, पेड़-पौधे, प्राणी आदि सभी पर्यावरण के  अंग है। बढ़ती जनसंख्या व औद्योगिकरण के कारण 'ईको सिस्टमÓ... आगे पढ़े

...जल संकट...

Updated on 28 July, 2015, 12:19
मनुष्य चाहे कितना भी विकास कर ले, परंतु प्रकृति पर मानव का वश नहीं चल सकता। हम उसे नष्ट कर सकते है, कर भी रहे हैं मगर जब प्रकृति अपने रौद्र रूप में आती है तब मानव सिर्फ विलाप करता है। प्राकृतिक आपदाएं प्राकृतिक कम मानव निर्मित अधिक होती है। कुछ... आगे पढ़े