Monday, 30 March 2020, 3:55 PM

जीवन मंत्र

कर्म का फल हैं योनियां 

Updated on 30 March, 2020, 6:00
जीवों में शरीर तथा इन्द्रियों की विभिन्न अभिव्यक्तियां प्रकृति के कारण हैं। कुल मिलाकर 84 लाख भिन्न-भिन्न योनियां हैं और ये सब प्रकृतिजन्य हैं। जीव के विभिन्न इन्द्रिय-सुखों से ये योनिया मिलती हैं जो इस या उस शरीर में रहने की इच्छा करता है। जब उसे विभिन्न शरीर प्राप्त होते... आगे पढ़े

मृत्यु का अर्थ 

Updated on 29 March, 2020, 6:00
मृत्यु एक शात सत्य है। यह अनुभूति प्रत्यक्ष प्रमाणित है, फिर भी इसके संबंध में कोई दर्शन नहीं है।  अब तक जितने ऋषि-महर्षि या संत-महंत हुए हैं, उन्होंने जीवन दर्शन की चर्चा की है। जीवन के बारे में ऐसी अनेक दृष्टियां उपलब्ध हैं जिनसे जीवन को सही रूप में समझा... आगे पढ़े

 अंतर्दृष्टि से अनुबंधित है ज्ञान

Updated on 24 March, 2020, 6:00
बुद्धि अच्छी चीज है, पर कोरी बौद्धिकता ही सब कुछ नहीं है। इससे व्यक्ति के जीवन में नीरसता और शुष्कता आती है। ज्ञान अंतर्दृष्टि से अनुबंधित है, इसलिए यह अपने साथ सरसता लाता है। ज्ञानी व्यक्तियों के लिए पुस्तकीय अध्ययन की विशेष अपेक्षा नहीं रहती। भगवान महावीर ने कब पढ़ी... आगे पढ़े

भगवान की विचारणाएं

Updated on 23 March, 2020, 6:00
जब मनुष्य इस जिम्मेदारी को समझ ले कि मैं क्यों पैदा हुआ हूं और पैदा हुआ हूं तो मुझे क्या करना चाहिए? भगवान द्वारा सोचना, विचारना, बोलना, भावनाएं आदि अमानतें मनुष्य को इसलिए नहीं दी गई हैं कि उनके द्वारा वह सुख-सुविधाएं या विलासिता के साधन जुटा अपना अहंकार पूरा... आगे पढ़े

प्रार्थना की पुकार

Updated on 22 March, 2020, 6:00
यदि प्रार्थना सच्ची हो तो परमपिता परमेश्वर उस प्रार्थना को जरूर ही सुनते हैं। परमपिता परमेश्वर अत्यंत कृपालु और दयालु हैं, परंतु प्रार्थना के लिए भी हृदय का पवित्र और निर्मल होना अत्यंत आवश्यक है। मन का पवित्र होना, अहंकार और अभिमान से रहित होना नितांत आवश्यक है। ऐसे पवित्र-हृदय-अंतŠ... आगे पढ़े

 विवेक ही धर्म है 

Updated on 21 March, 2020, 6:00
युग के आदि में मनुष्य भी जंगली था। जब से मनुष्य ने विकास करना शुरू किया, उसकी आवश्यकताएं बढ़ गई। आवश्यकताओं की पूर्ति न होने से समस्या ने जन्म लिया। समस्या सामने आई तब समाधान की बात सोची गई। समाधान के स्तर दो थे- पदार्थ-जगत, मनो-जगत. प्रथम स्तर पर पदाथरे... आगे पढ़े

 धर्म क्या है?

Updated on 20 March, 2020, 6:00
धर्म के मुख्यत:  दो आयाम हैं। एक है संस्कृति, जिसका संबंध बाहर से है। दूसरा है अध्यात्म, जिसका संबंध भीतर से है। धर्म का तत्व भीतर है, मत बाहर है। तत्व और मत दोनों का जोड़ धर्म है। तत्व के आधार पर मत का निर्धारण हो, तो धर्म की सही... आगे पढ़े

नित अभ्यास से दर्शन कर सकते हैं ईश्वर का

Updated on 18 March, 2020, 6:00
सभी शास्त्र  कहते हैं कि बिना भगवान को प्राप्त किये मुक्ति नहीं मिल सकती है। इसलिए भगवान की तलाश के लिए कोई व्यक्ति मंदिर जाता है तो कोई मस्जिद, कोई गुरूद्वारा, तो कोई गिरजाघर। लेकिन इन सभी स्थानों में जड़ स्वरूप भगवान होता है। अर्थात ऐसा भगवान होता है जिसमें... आगे पढ़े

ईश्वर को पाने के लिए प्रेम मार्ग से गुजरना होगा 

Updated on 17 March, 2020, 6:00
प्रेम शक्ति भी है और आसक्ति भी। जब व्यक्ति का प्रेम कामना रहित होता है तो यह शक्ति होती है और जब प्रेम में किसी चीज को पाने का लोभ रहता है तो यह आसक्ति बन जाती है। सच्चा प्रेम वह होता है जो प्रेम में किसी प्रकार का लोभ... आगे पढ़े

एक प्रवाह है जीवन 

Updated on 15 March, 2020, 6:00
जीवा एक प्रवाह है। वह रुकता नहीं, बहता रहता है। जो बहता है, वही प्रवाह होता है। जिसमें ठहराव है, गतिहीनता है, वह प्रवाह नहीं हो सकता। प्रवाह स्वच्छता का प्रतीक है, जबकि ठहराव में गंदगी की संभावना बनी रहती है। प्रवाह में जीवनी शक्ति है, जबकि ठहराव में अस्तित्व... आगे पढ़े

इच्छा का लक्ष्य है खुशी 

Updated on 13 March, 2020, 6:00
बुरी आदत को छोड़ने की असमर्थता तुम्हें तकलीफ देती है। जब तुम बहुत पीड़ित होते हो, वह व्यथा तुम्हें उस आदत से छुटकारा दिलाती है। जब तुम अपनी कमियों से व्यथा महसूस करते हो, तब तुम साधक हो। पीड़ा तुम्हें आसक्ति से दूर करती है। यदि अपने दुर्गुणों को हटा... आगे पढ़े

रोजाना करें इन वैदिक मंत्रो का जाप, पाए सभी मुसीबतों से छुटकारा

Updated on 11 March, 2020, 6:30
इस व्यस्त दुनिया में सभी को सुख, शान्ति, समृद्धि और वैभव की कामना होती है. लोग इसके लिए बहुत से ध्यान, यग और पाठ भी करते हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी मंत्र हैं जिनका रोज सच्चे मन से उच्चारण करने से मन को तो शांति मिलती ही हैं साथ ही... आगे पढ़े

इसलिए रह जाती है पूर्व जन्म की स्मृतियां 

Updated on 10 March, 2020, 6:00
माना जाता है कि संसार में हम जो भी काम करते अथवा बोलते हैं वह एक उर्जा के रूप में प्रकृति में वर्तमान रहती है। उर्जा के विषय में विज्ञान कहता है कि उर्जा कभी नष्ट नहीं होती है। इसका स्वरूप बदलता रहता है। हमारी आत्मा भी उर्जा का ही... आगे पढ़े

तुम्हारी सम्पदा है निष्ठा  

Updated on 8 March, 2020, 0:00
यदि तुम सोचने हो कि ईश्वर में तुम्हारी निष्ठा ईश्वर का कुछ हित कर रही है, तो यह भूल है। ईश्वर या गुरु में तुम्हारी निष्ठा ईश्वर या गुरु का कुछ नहीं करती। निष्ठा तुम्हारी सम्पदा है। निष्ठा तुम्हें बल देती है। तुममें स्थिरता, केंद्रीयता, प्रशांति और प्रेम लाती है।... आगे पढ़े

जीवन और मृत्यु 

Updated on 7 March, 2020, 6:00
चीन में लाओत्से के समय में ऐसी प्रचलित धारण थी कि आदमी के शरीर में नौ छेद होते हैं। उन्हीं नौ छेदों से जीवन प्रवेश करता है और उन्हीं से बाहर निकलता है। दो आंखें, दो नाक के छेद, मुंह, दो कान, जननेंद्रिय, गुदा। इसके साथ चार अंग हैं- दो... आगे पढ़े

हर जीव में व्याप्त नारायण 

Updated on 6 March, 2020, 6:00
वैदिक साहित्य से हम जानते हैं कि परम-पुरुष नारायण प्रत्येक जीव के बाहर तथा भीतर निवास करने वाले है। वे भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों जगतों में विद्यमान हैं। यद्यपि वे बहुत दूर हैं, फिर भी हमारे निकट हैं-आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतरू हम भौतिक इन्द्रियों से न तो उन्हें... आगे पढ़े

विवेक ही धर्म है 

Updated on 4 March, 2020, 6:00
युग के आदि में मनुष्य भी जंगली था। जब से मनुष्य ने विकास करना शुरू किया, उसकी आवश्यकताएं बढ़ गई। आवश्यकताओं की पूर्ति न होने से समस्या ने जन्म लिया।समस्या सामने आई तब समाधान की बात सोची गई। समाधान के स्तर दो थे- पदार्थ-जगत, मनो-जगत. प्रथम स्तर पर पदार्थ के... आगे पढ़े

 सफलता चाहिए तो पहले ये सीखें

Updated on 3 March, 2020, 6:00
किसी भी काम में लगन का अपना महत्व होता है, सफलता आपकी एकाग्रता पर ही निर्भर करती है। आप संसार को पाने की दौड़ में हो या परमात्मा को, जब तक हम ध्यान लगाकर काम नहीं करेंगे कभी ठीक परिणाम नहीं मिलेगा। इसके लिए जरूरी है कि आप पहले अपने... आगे पढ़े

न देने वाला मन 

Updated on 2 March, 2020, 6:00
एक भिखारी सुबह-सुबह भीख मांगने निकला। चलते समय उसने अपनी झोली में जौ के मुट्ठी भर दाने डाल लिए। टोटके या अंधविश्वास के कारण भिक्षाटन के लिए निकलते समय भिखारी अपनी झोली खाली नहीं रखते। थैली देख कर दूसरों को लगता है कि इसे पहले से किसी ने दे रखा... आगे पढ़े

व्यवहार से ही मिल गया सवाल का जवाब

Updated on 1 March, 2020, 6:00
एक दार्शनिक समस्याओं के अत्यंत सटीक समाधान बताते थे। एक बार उनके पास एक सेनापति पहुंचा और स्वर्ग-नर्क के विषय में जानकारी चाही। दार्शनिक ने उसका पूर्ण परिचय पूछा तो उसने अपने वीरतापूर्ण कार्यो के बारे में सविस्तार बताया। उसकी बातें सुनकर दार्शनिक ने कहा - शक्ल-सूरत से तो आप... आगे पढ़े

दु:खी होने की बजाय दुख का उपचार करें 

Updated on 24 February, 2020, 6:00
लोगों से अपने सुना होगा कि संसार में दु:ख ही दु:ख है। असफलता मिलने पर कई बार आप भी यही सोचते होंगे, जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है। संसार में दु:ख इसलिए है क्योंकि संसार में सुख है। अगर सुख नहीं होता तो दु:ख का अस्तित्व भी नहीं होता है। ईश्वर... आगे पढ़े

 कहीं आप भी पाप की पूंजी तो जमा नहीं कर रहे 

Updated on 23 February, 2020, 6:00
क्या आपने कभी किसी के ऊपर हो रहे अत्याचार के विरूद्ध आवाज उठायी है। किसी कमज़ोर और लाचार को पिटता देखकर मदद के लिए आगे आएं हैं। अगर आपने ऐसा नहीं किया है तो समझ लीजिए आपने अपने खाते में पाप की पूंजी जमा कर ली है। शाŒााW में जिस... आगे पढ़े

शरीर तो मंदिर है

Updated on 22 February, 2020, 6:00
आस्तिकता और कर्त्तव्यपरायणता की सद्वृत्ति का प्रभाव सबसे पहले सबसे समीपवर्ती स्वजन पर पड़ना चाहिए। हमारा सबसे निकटवर्ती सम्बन्धी हमारा शरीर हैं। उसके साथ सद्व्यवहार करना, उसे स्वस्थ और सुरक्षित रखना अत्यावश्यक है। शरीर को नर कहकर उसकी उपेक्षा करना अथवा उसे सजाने-संवारने में सारी शक्ति खर्च कर देना, दोनों... आगे पढ़े

 इसलिए सबसे छोटा है कलियुग 

Updated on 20 February, 2020, 6:00
शास्त्रों में सृष्टि के आरंभ से प्रलय काल तक की अवधि को चार युगों में बांटा गया है। वर्तमान में हम जिस युग में जी रहे हैं उसे कलयुग कहा गया है। इससे पहले तीन युग बीत चुके हैं सतयुग, त्रेता और द्वापर। भगवान श्री राम का जन्म त्रेतायुग में... आगे पढ़े

 ईश्वर हमेशा भक्तों की सहायता करता है

Updated on 19 February, 2020, 6:00
ईश्वर को हम भले ही न देख पाएं लेकिन ईश्वर हर क्षण हमें देख रहा होता है। उसकी दृष्टि हमेशा अपने भक्तों एवं सद्व्यक्तियों पर रहती है। अगर आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि जीवन में कभी न कभी कठिन समय में ईश्वर स्वयं आकर आपकी सहायता कर चुके हैं।... आगे पढ़े

प्रभु भक्ति में बीते समय 

Updated on 18 February, 2020, 6:00
यह भौतिक जगत प्रकृति के गुणों के चमत्कार के अन्तर्गत कार्य कर रहा है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी चेतना कृष्ण कार्य में लगाए। कृष्णकार्य भक्तियोग के नाम से विख्यात हैं। इसमें न केवल कृष्ण अपितु उनके विभिन्न पूर्णाश भी सम्मिलित हैं- यथा राम तथा नारायण। कृष्ण के असंख्य... आगे पढ़े

 उत्तम शरण है धर्म  

Updated on 17 February, 2020, 6:00
धर्म के बारे में भिन्न-भिन्न अवधारणाएं हैं। कुछ जीवन के लिए धर्म की अनिवार्यता को स्वीकार करते हैं। कुछ लोगों का अभिमत है कि धर्म ढकोसला है। वह आदमी को पंगु बनाता है और रूढ़ धारणाओं के घेरे में बंदी बना लेता है। शायद इन्हीं अवधारणाओं के आधार पर किसी... आगे पढ़े

खुद को दूसरों से श्रेष्ठ मानकर अहंकार न करें

Updated on 16 February, 2020, 6:00
ईश्वर ने जब संसार की रचना की तब उसने सभी जीवों में एक समान रक्त का संचार किया। इसलिए मनुष्य हो अथवा पशु सभी के शरीर में बह रहा खून का रंग लाल है। विभिन्न योनियों की रचना भी इसलिए की ताकि मनुष्य कभी इस बात का अहंकार न करें... आगे पढ़े

 भगवान की नज़र में हर इनसान बराबर है

Updated on 14 February, 2020, 6:00
इतिहास के पन्नों को उलट करके देखेंगे तो पाएंगे कि आज जितना ऊंच-नीच एवं अमीर-गरीब का भेद-भाव है वह वैदिक काल के आरंभ में नहीं था। उस समय सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए कर्म के अनुसार वर्ग विभेद किया गया। लेकिन बाद में व्यवस्थाओं में जटिलता... आगे पढ़े

दुखी चित्त के लक्षण हैं उत्सव

Updated on 12 February, 2020, 9:45
दुनिया में दो ही तरह के लोग हैं- एक वे जो अपने को नया करने का राज खोज लेते हैं, और एक वे जो अपने को पुराना बनाए रखते हैं और चीजों को नया करने में लगे रहते हैं। भौतिकवादी और आध्यात्मवादी में एक ही फर्क है। आध्यात्मवादी रोज अपने... आगे पढ़े

युवकत्व की पहचान

Updated on 11 February, 2020, 6:00
मनुष्य स्वतंत्र संकल्प का स्वामी होता है। उसका संकल्प जैसा होता है, व्यक्तित्व भी वैसा ही ना\मत हो जाता है। सृजन और ध्वंस के संस्कार मनुष्य के भीतर होते हैं। उन संस्कारों को वह संकल्पशक्ति के सहारे बदल सकता है। जिस व्यक्ति में विधायक भावों की प्रचुरता होता है वह... आगे पढ़े

समय का चक्र

Updated on 10 February, 2020, 6:00
जब तुम्हें लगता है कि समय बहुत कम है, तुम या तो बेचैन होते हो या अत्यन्त सजगता की अवस्था में होते हो। दुखी या उत्सुक होने पर तुम्हें समय बहुत लम्बा लगता है। जब तुम प्रसन्न हो और जो कुछ कर रहे हो, उसमें आनंद आ रहा है, तब... आगे पढ़े

राष्ट्रीय एकता में बाधक तत्व 

Updated on 8 February, 2020, 6:15
आर्थिक और सामाजिक असमानता राष्ट्रीय एकता में बहुत बड़ी बाधा है। उस असमानता का मूल है अहं और स्वार्थ। इसलिए राष्ट्र की भावात्मक एकता के लिए अहं-विसर्जन और स्वार्थ-विसर्जन को मैं बहुत महत्व देता हूं। जातीय असमानता भी राष्ट्रीय एकता का बहुत बड़ा विघ्न है। उसका भी मूल कारण अहं... आगे पढ़े

सुख, शांति चाहिये तो प्रकृति को समझें  

Updated on 7 February, 2020, 6:30
प्रकृति और मनुष्य के बीच बहुत गहरा संबंध है। मनुष्य के लिए धरती उसके घर का आंगन, आसमान छत, सूर्य-चांद-तारे दीपक, सागर-नदी पानी के मटके और पेड़-पौधे आहार के साधन हैं। इतना ही नहीं, मनुष्य के लिए प्रकृति से अच्छा गुरु नहीं है। कवियों ने प्रकृति के सान्निध्य में रहकर... आगे पढ़े

 मन की शक्ति

Updated on 7 February, 2020, 6:00
मन को जीवन का केंद्रबिंदु कहना असंभव नहीं है। मनुष्य की प्रियाओं, आचरणों का प्रारंभ मन से ही होता है। मन तरह-तरह के संकल्प, कल्पनाएं करता है। जिस ओर उसका रुझान हो जाता है उसी ओर मनुष्य की सारी गतिविधियां चल पड़ती है। जैसी कल्पना हो उसी के अनुरूप प्रयास-पुरुषार्थ... आगे पढ़े

विचार-निर्विचार, चिंतन-अचिंतन

Updated on 6 February, 2020, 6:00
पूरा विश्व, विचारों पर चलता है, सारे आविष्कार, युध्द, आतंकवाद, साहित्य सृजन, भाषण, प्रवचन, तू-तू, मैं-मैं सब विचारों की देन है। विचार ही सब कार्यों को अंजाम देता है। भक्ति, प्रार्थना, व्यवहार, सेवा सब विचारों की देन है। हम सोचते हैं तो करते हैं होता है। अब प्रश्न यह है... आगे पढ़े

प्रधानता आत्मा को

Updated on 5 February, 2020, 6:00
मनुष्य सामान्यत: जो बाह्य में देखता, सुनता, समझता है वह यथार्थ ज्ञान नहीं होता। किन्तु भ्रमवश उसी को यथार्थ ज्ञान मान लेता है।   अवास्तविक ज्ञान को ही ज्ञान समझकर और उसके अनुसार अपने कार्य करने केकारण मनुष्य अपने मूल उद्देश्य सुख-शान्ति की दिशा में अग्रसर न होकर विपरीत दिशा में... आगे पढ़े

जहाँ शांति है वही सुख

Updated on 4 February, 2020, 6:00
यदि हमारे पास दुनिया का पूरा वैभव और सुख-साधन उपलब्ध है परंतु शांति नहीं है तो हम भी आम आदमी की तरह ही हैं। संसार में मनुष्यों द्वारा जितने भी कार्य अथवा उद्यम किए जा रहे हैं सबका एक ही उद्देश्य है 'शांति'। सबसे पहले तो हमें ये जान लेना... आगे पढ़े

सन्मार्ग की प्रवृत्ति

Updated on 3 February, 2020, 6:00
उत्तम कार्य की कार्य प्रणाली भी प्राय: उत्तम होती है। दूसरों की सेवा या सहायता करनी है, तो प्राय: मधुर भाषण, नम्रता, दान, उपहार आदि द्वारा उसे संतुष्ट किया जाता है। परन्तु कई बार इसके विपरीत क्रिया-प्रणाली ऐसी कठोर, तीक्ष्ण एवं कटु बनानी पड़ती है कि लोगों को भ्रम हो... आगे पढ़े

पशुवध निंदनीय-दंडनीय कर्म 

Updated on 2 February, 2020, 6:00
सतोगुण में किये गये पुण्यकर्मो का फल शुद्ध होता है, अतएव वे मुनिगण, जो समस्त मोह से मुक्त हैं, सुखी रहते हैं। लेकिन रजोगुण में किये गये कर्म दुख का कारण बनते है। भौतिक सुख के लिए जो भी कार्य किया जाता है, उसका विफल होना निश्चित है। उदाहरणार्थ, यदि... आगे पढ़े

एकता में भाषा भी अवरोध 

Updated on 1 February, 2020, 6:00
भाषा, जो दूसरों तक अपने विचारों को पहुंचाने का माध्यम है, उसे भी राष्ट्रीय एकता के सामने समस्या बनाकर खड़ा कर दिया जाता है. अपनी भाषा के प्रति आकषर्ण होना अस्वाभाविक नहीं है और मातृभाषा व्यक्ति के बौद्धिक विकास का सशक्त माध्यम बन सकती है, इसमें कोई संदेह नहीं. पर... आगे पढ़े

जीना और मरना

Updated on 31 January, 2020, 6:00
जिस भांति हम जीते हैं, उसे जीवन नाममात्र को ही कहा जा सकता है। हमे न जीवन का पता है; न जीवन के रहस्य का द्वार खुलता है। न जीवन के आनंद की वष्रा होती है; न हम यह जान पाते हैं कि हम क्यों जी रहे हैं, किसलिए जी... आगे पढ़े

विचार प्रांति की जरूरत

Updated on 28 January, 2020, 6:00
एक समय अवांछनीय व्यक्तियों या तत्वों को हटाने के लिए मुख्यत: शस्त्रबल से ही काम लिया जाता था। तब विचारशक्ति की व्यापकता का क्षेत्र खुला न था। बहुसंख्यक जनता को एक दिशा में सोचने, कुछ करने या संगठित करने के लिए उपयुक्त साधन न थे। इसलिए संसार में जब भी... आगे पढ़े

जीवन निर्भरता और आत्म -निर्भरता का संयोग है

Updated on 26 January, 2020, 6:00
जीवन में सम्पूर्ण आत्म निर्भरता जैसा कुछ नहीं है। इसे भूल जाओ। यदि आप सोचते हो कि मैं पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हो जाऊं तो ऐसा नहीं होगा। 15, 16 या 17 साल की आयु तक आप आत्मनिर्भर नहीं थे। आप आश्रित ही पैदा हुए थे। आप अपने आप उठ... आगे पढ़े

जो हो रहा है उसके जिम्मेदार हम स्वंय हैं

Updated on 25 January, 2020, 6:00
हम मनुष्यों की एक सामान्य सी आदत है कि दु:ख की घड़ी में विचलित हो उठते हैं और परिस्थितियों का कसूरवार भगवान को मान लेते हैं। भगवान को कोसते रहते हैं कि 'हे भगवान हमने आपका क्या बिगाड़ा जो हमें यह दिन देखना पड़ रहा है।' गीता में श्री कृष्ण... आगे पढ़े

जैसा सोचेंगे वैसा ही फल मिलेगा

Updated on 24 January, 2020, 6:00
यदि आपका मन प्रसन्न नहीं है तो इसका जिम्मेदार कोई और नहीं है बल्कि आप स्वंय हैं। इसी प्रकार अगर आप सुखी है तो यह भी आपको अपने ही कारण प्राप्त हुआ है। ईश्वर का आपके सुख-दुŠ ख से कोई संबध नहीं है। ईश्वर तो मात्र कर्म का फल प्रदान... आगे पढ़े

 ईश्वरीय सिद्धांत 

Updated on 21 January, 2020, 0:00
तीन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धांत व्यक्त होते हैं- यह जो संसार है परमात्मा से व्याप्त है, उसके अतिरिक्त सब मिथ्या है, माया है, भ्रम है, स्वप्न है। मनुष्य को उसकी इच्छानुसार सृष्टि संचालन के लिए कार्य करते रहना चाहिए। मनुष्य में जो श्रे…ता-शक्ति या सौन्दर्य है वह उसके दैवी गुणों के... आगे पढ़े

अपूर्णता से पूर्णता की ओर

Updated on 20 January, 2020, 6:00
मनुष्य का बाह्य जीवन वस्तुत: उसके आंतरिक स्वरूप का प्रतिबिम्ब मात्र होता है। जैसे ड्राइवर मोटर की दिशा में मनचाहा बदलाव कर सकता है। उसी प्रकार, जीवन के बाहरी ढर्रे में भारी और आश्चर्यकारी परिवर्तन हो सकता है। वाल्मीकि और अंगुलिमाल जैसे भयंकर डाकू क्षण भर में परिवर्तित होकर इतिहास... आगे पढ़े

 द्वंद्व के बीच शांति की खोज 

Updated on 19 January, 2020, 6:00
केवल ज्ञान की बातें करों। किसी व्यक्ति के बारे में दूसरे व्यक्ति से सुनी बातें मत दोहराओ। जब कोई व्यक्ति तुम्हें नकारात्मक बातें कहे, तो उसे वहीं रोक दो, उस पर वास भी मत करो। यदि कोई तुम पर कुछ आरोप लगाये, तो उस पर वास न करो। यह जान... आगे पढ़े

 जो हो रहा है उसके जिम्मेदार हम खुद हैं 

Updated on 18 January, 2020, 6:00
हम मनुष्यों की एक सामान्य सी आदत है कि दु?ख की घड़ी में विचलित हो उठते हैं और परिस्थितियों का कसूरवार भगवान को मान लेते हैं। भगवान को कोसते रहते हैं कि 'हे भगवान हमने आपका क्या बिगाड़ा जो हमें यह दिन देखना पड़ रहा है।' गीता में श्री कृष्ण... आगे पढ़े