Monday, 06 July 2020, 8:29 AM

जीवन मंत्र

योगनिद्रा से दूर होंगे सभी तनाव  

Updated on 18 June, 2020, 6:15
आठ घंटे की नींद लेने के बाद जब उठते हैं तो आप खुद को थका हुआ और बोझिल महसूस करते हैं। जिसका सीधा सा मतलब है कि आप तनाव में हैं जो आप के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। नींद पूरी करने के बावजूद यदि थकान महसूस हो तथा... आगे पढ़े

हर मनुष्य के जीवन हैं दुख

Updated on 9 June, 2020, 6:00
एक बार भगवान बुद्ध से किसी भिक्षु ने पूछा-भगवान! ईश्वर है या नहीं है? बुद्ध ने इसका सीधा उत्तर न देकर प्रश्नकर्ता भिक्षु से कहा-मनुष्य की समस्या ईश्वर के होने या न होने की नहीं है। मनुष्य की मुख्य समस्या है उसके जीवन में आने वाले दुखों की। भगवान बुद्ध... आगे पढ़े

 मृत्यु के उपरांत शरीर नष्ट हो जाता है 

Updated on 8 June, 2020, 6:00
अष्टावप्र गीता' में आचार्य अष्टावक्र कहते हैं कि मनुष्य शरीर मात्र शरीर नहीं है। वह चैतन्य आत्मा है। आत्मा ही इस शरीर की पोषक है। जैसे ही आत्मा इस शरीर से बाहर निकलती है, शरीर विकृत होने लगता है। बुद्धि, कर्म, भोग, अहंकार, लोभ, मोह शरीर और मन के धर्म... आगे पढ़े

धर्म का अर्थ

Updated on 31 May, 2020, 6:00
किसी संत के पास एक युवक आया और उसने उनसे धर्म ज्ञान देने की प्रार्थना की। संत ने कहा कि वह उनके साथ कुछ दिन रहे, फिर वे उसे धर्म का सार बताएंगे। युवक उनके आश्रम में रहने लगा। वह संत की हर बात मानता और उनकी सेवा करता। इस... आगे पढ़े

सदाचार की परीक्षा

Updated on 30 May, 2020, 6:00
राजा अंग सिंह के पुत्र प्रवीण सिंह गलत संगति में पड़कर अनुचित कार्य करने लगा। चारों तरफ से उसकी शिकायतें आने लगीं। इससे राजा अत्यंत चिंतित हो गए। प्रवीण सिंह अभी बालक ही था, इसलिए राजा चाहते थे कि उसका स्वभाव बदले और भविष्य में वह एक नेक राजा बन... आगे पढ़े

वैज्ञानिक बनने की चाह

Updated on 29 May, 2020, 6:00
किसी समय लंदन की एक बस्ती में एक अनाथ बालक रहता था। वह अखबार बेचकर किसी तरह अपना गुजारा करता था। कुछ समय बाद उसे एक जिल्दसाज की दुकान पर जिल्द चढ़ाने का काम मिल गया। उस बालक को पढ़ने का बहुत शौक था। वह पुस्तकों पर जिल्द चढ़ाते समय... आगे पढ़े

प्रतिभा और ज्ञान 

Updated on 24 May, 2020, 6:00
एक संत को जंगल में एक नवजात शिशु मिला। वह उसे अपने घर जे आए। उन्होंने उसका नाम जीवक रखा। उन्होंने जीवक को अच्छी शिक्षा-दीक्षा प्रदान की। जब वह बड़ा हुआ तो उसने संत से पूछा, 'गुरुजी, मेरे माता-पिता कौन हैं?' संत को जीवक के मुंह से यह सुनकर बड़ा... आगे पढ़े

 संकल्प और साहस  

Updated on 23 May, 2020, 6:00
खेल की कक्षा शुरू हुई तो एक दुबली-पतली अपंग लड़की किसी तरह अपनी जगह से उठी। वह खेलों के प्रति जिज्ञासा प्रकट करते हुए शिक्षक से ओलिंपिक रेकॉर्ड्स के बारे में सवाल पूछने लगी। इस पर सभी छात्र हंस पड़े। शिक्षक ने भी व्यंग्य किया- तुम खेलों के बारे में... आगे पढ़े

चिंतन सही हो 

Updated on 19 May, 2020, 6:00
एक व्यक्ति ने अपने मित्र से साठ रूपए उधार लिए। कुछ दिनों बाद वह आया और बीस रूपए देकर बोला, 'सारे रूपए आ गए?' मित्र ने कहा, 'साठ दिए थे और तुम बीस लौटा रहे हो, तो अभी चालीस रूपए बाकी रहेंगे। तीस और तीस साठ होते हैं।' उसने कहा,... आगे पढ़े

 धर्म का अर्थ

Updated on 18 May, 2020, 6:00
किसी संत के पास एक युवक आया और उसने उनसे धर्म ज्ञान देने की प्रार्थना की। संत ने कहा कि वह उनके साथ कुछ दिन रहे, फिर वे उसे धर्म का सार बताएंगे। युवक उनके आश्रम में रहने लगा। वह संत की हर बात मानता और उनकी सेवा करता। इस... आगे पढ़े

आत्मज्ञान के लिए पात्रता

Updated on 17 May, 2020, 6:00
एक बार की बात है। एक धनिक सेठ एक पहुंचे हुए संत के पास पहुंचा और उनसे बोला, 'महाराज, मैं आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना का प्रयास करता हूं। परंतु मेरा मन ध्यान में एकाग्र ही नहीं हो पाता। आप मुझे मेरे मन को एकाग्र करने का कोई मंत्र... आगे पढ़े

हम असंतुष्ट रहेंगे तो जीवन में अशांति बनी रहेगी और हम कभी भी सुखी नहीं हो सकते

Updated on 16 May, 2020, 6:45
जो लोग अपने जीवन से असंतुष्ट रहते हैं, उनका मन कभी भी शांत नहीं हो सकता है। सुख-शांति पाना चाहते हैं तो जीवन में संतुष्टि होनी चाहिए। इस संबंध में एक लोक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार पुराने समय में एक किसान गरीबी की वजह से बहुत परेशान रहता... आगे पढ़े

 दूसरे की गलती

Updated on 15 May, 2020, 6:00
एक बार गुरु श्यामानंद ने अपने चार शिष्यों को एक पाठ पढ़ाया। पढ़ाने के बाद वह अपने शिष्यों से बोले, 'अब तुम चारों इस पाठ का बार-बार अध्ययन कर इसे याद करो। इस बीच यह ध्यान रखना कि तुम में से कोई बोले नहीं। थोड़ी देर बाद मैं तुमसे इस... आगे पढ़े

 संत का धन

Updated on 14 May, 2020, 6:00
उन दिनों विजय नगर में संत पुरंदर की ख्याति बढ़ती ही जा रही थी। हर प्रकार के मोह-माया से मुक्त त्यागमूर्ति पुरंदर अपनी पत्नी के साथ नगर से बाहर एक कुटिया में रहते थे और भिक्षा मांग कर गुजारा करते थे। उनके नाम की चर्चा उड़ते-उड़ते राजा कृष्णदेव राय तक... आगे पढ़े

श्रम रहित परिश्रम

Updated on 13 May, 2020, 6:00
महर्षि वेदव्यास किसी नगर से गुजर रहे थे। उन्होंने एक कीड़े को तेजी से भागते हुए देखा। मन में सवाल उठा- एक छोटा सा कीड़ा इतनी तेजी से क्यों भागा जा रहा है? उन्होंने कीड़े से पूछा- ऐ क्षुद्र जंतु! तुम इतनी तेजी से कहां जा रहे हो? कीड़ा बोला-... आगे पढ़े

दृष्टि में सब रखें

Updated on 12 May, 2020, 6:00
एक व्यक्ति ने कहा, 'सर्दी लग रही है। ठिठुर रहा हूं।' दूसरे ने कहा, 'जाओ, कपड़ा ओढ़ लो।' वह घर में गया और मलमल की चादर ओढ़ आया। आकर बोला, 'कपड़ा ओढ़ लिया, फिर भी ठंड लग रही है।' उसने कहा, 'भले आदमी! मैंने कपड़ा ओढ़ने के लिए कहा था।... आगे पढ़े

वर्तमान में जिएं

Updated on 11 May, 2020, 6:00
मुनि ने सेठ की पुत्रवधू से पूछा, 'श्वसुरजी कहां हैं? उसने कहा, 'जूते की दुकान पर गए हैं।' श्वसुर उस समय आराधना-कक्ष में आराधना कर रहा था। उसने सुना, वह तत्काल आया और बोला, 'महाराज! मेरी पुत्रवधू ने असत्य कहा है। मैं आराधना कर रहा था। इसने जानते हुए भी... आगे पढ़े

काम में तल्लीनता

Updated on 10 May, 2020, 6:00
एक साधक से पूछा गया-आप साधना करते हैं? उसने कहा, 'जब भूख लगती है, तब खा लेता हूं और जब नींद आती है, तब सो जाता हूं। यही है मेरी साधना।' उसने कहा, 'बड़ी सीधी बात है। यह तो मैं भी कर सकता हूं।' साधक से कहा, 'अच्छा आओ, भोजन... आगे पढ़े

दौलत की चाह

Updated on 7 May, 2020, 6:00
संत जुनैद की एक झलक पाने और उनसे ज्ञान की बातें सुनने के लिए लोग बेकरार रहते थे। पर जुनैद दुनियावी चीजों से तटस्थ और निर्लिप्त रहते थे। वह खाने-पीने और अपने कपड़े से भी बेपरवाह रहते थे। वह हर समय घूमते रहते थे। जहां भी रात होती वह वहीं... आगे पढ़े

 नफरत का बोझ

Updated on 6 May, 2020, 6:00
बहुत पुरानी कथा है। एक बार एक गुरु ने अपने सभी शिष्यों से अनुरोध किया कि वे कल प्रवचन में आते समय अपने साथ एक थैली में बड़े-बड़े आलू साथ लेकर आएं। उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिए, जिससे वे नफरत करते हैं। जो शिष्य जितने... आगे पढ़े

अपना दृष्टिकोण

Updated on 5 May, 2020, 6:00
एक कन्या ने अपने पिता से कहा, 'मैं किसी पुरातत्वविद् से विवाह करना चाहती हूं।'  पिता ने पूछा, 'क्यों?' कन्या बोली, 'पिताजी! पुरातत्वविद् ही एक ऍसा व्यक्ति होता है जो पुरानी चीजों को ज्यादा मूल्य देता है। मैं भी ज्यों-ज्यों पुरानी होती जाऊंगी, बूढ़ी होती जाऊंगी, मेरा मूल्य भी बढ़ता... आगे पढ़े

संत की उदारता

Updated on 4 May, 2020, 6:00
संत बेनजोई के पास कई बालक शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। वह अपने सभी शिष्यों की शिक्षा पूर्ण करने के बाद ही उन्हें वहां से जाने की अनुमति देते थे। वह उद्दंड व शरारती शिष्यों को भी आज्ञाकारी और संस्कारी बनाकर ही दम लेते थे। एक बार उनके... आगे पढ़े

राजा की उदारता

Updated on 3 May, 2020, 6:00
राजा भोज के नगर में एक विद्वान ब्राह्यण रहते थे। एक दिन गरीबी से परेशान होकर उन्होंने राजभवन में चोरी करने का निश्चय किया। रात में वे वहां पहुंचे। सभी लोग सो रहे थे। सिपाहियों की नजरों से बचते हुए वह राजा के कक्ष तक पहुंच गए। स्वर्ण, रत्न, बहुमूल्य... आगे पढ़े

आत्मबल के लिए

Updated on 2 May, 2020, 6:00
एक गरीब बुढ़िया थी। अपनी झोपड़ी में अकेली रहती थी। उसके पास एक गाय थी। बस उसी के सहारे वह अपना जीवन निर्वाह करती थी। पर्युषण पर्व चल रहा था। वह अपनी झोपड़ी में बैठी-बैठी रोज देखती थी कि गांव के लोग बहुत ठाट-बाट से पूजा की थाल और प्रसाद... आगे पढ़े

विनम्रता का पाठ 

Updated on 1 May, 2020, 6:00
पंडित विद्याभूषण बहुत बड़े विद्वान थे। दूर-दूर तक उनकी चर्चा होती थी। उनके पड़ोस में एक अशिक्षित व्यक्ति रहते थे-रामसेवक। वे अत्यंत सज्जन थे और लोगों की खूब मदद किया करते थे। पंडित जी रामसेवक को ज्यादा महत्व नहीं देते थे और उनसे दूर ही रहते थे। एक दिन पंडित... आगे पढ़े

धन का भार

Updated on 29 April, 2020, 6:00
पाटलिपुत्र में नाभिकुमार की गिनती सबसे संपन्न लोगों में होती थी। लेकिन अपार धन-संपत्ति होते हुए भी उन्होंने कभी दान नहीं दिया था। कई लोगों ने उन्हें इस बारे में कहा था पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। एक रात उनके घर चोर ने सेंध लगाई। उसने सावधानी से घर का... आगे पढ़े

रजा का खजाना

Updated on 28 April, 2020, 6:00
फारस के शासक साइरस अपनी प्रजा की भलाई में जुटे रहते थे। लेकिन खुद उनका जीवन सादगी से भरा था। वह रियासत की सारी आमदनी व्यापार, उद्योग और खेतीबाड़ी में लगा देते थे। इस कारण शाही खजाना हल्का रहता था। लेकिन प्रजा खुशहाल थी। एक दिन साइरस के दोस्त और... आगे पढ़े

मृत्यु का अर्थ

Updated on 22 April, 2020, 6:00
मृत्यु एक शात सत्य है। यह अनुभूति प्रत्यक्ष प्रमाणित है, फिर भी इसके संबंध में कोई दर्शन नहीं है। अब तक जितने ऋषि-महर्षि या संत-महंत हुए हैं, उन्होंने जीवन दर्शन की चर्चा की है। जीवन के बारे में ऐसी अनेक दृष्टियां उपलब्ध हैं जिनसे जीवन को सही रूप में समझा... आगे पढ़े

सबसे अच्छा सखा है ज्ञान 

Updated on 21 April, 2020, 6:00
आत्मा ही आनन्द का स्वरूप है। किसी भी सुखद अनुभूति में तुम आंखे मूंद लेते हो। जैसे जब किसी फूल को सूंघते हो, कोई स्वादिष्ट खाना चखते हो या किसी वस्तु को स्पर्श करते हो। दुख का केवल यही अर्थ है कि तुम अपरिवर्तनशील आत्मा पर केन्द्रित होने के बदले... आगे पढ़े

भौतिकवाद से उपजी दुर्गति

Updated on 20 April, 2020, 6:00
ऊंचा महल खड़ा करने के लिए किसी दूसरी जगह गड्ढे बनाने पड़ते हैं। मिट्टी, पत्थर, चूना आदि जमीन को खोदकर ही निकाला जाता है। एक जगह टीला बनता है तो दूसरी जगह खाई बनती है। संसार में दरिद्रों, अशिक्षितों, दु:खियों, पिछड़ों की विपुल संख्या देखते हुए विचार उठता है कि... आगे पढ़े

अहंकार से ज्ञान का नाश

Updated on 19 April, 2020, 6:00
अहंकार से मनुष्य की बुद्धि नष्ट हो जाती है। अहंकार से ज्ञान का नाश हो जाता है। अहंकार होने से मनुष्य के सब काम बिगड़ जाते हैं। भगवान कण-कण में व्याप्त है। जहाँ उसे प्रेम से पुकारो वहीं प्रकट हो जाते हैं। भगवान को पाने का उपाय केवल प्रेम ही... आगे पढ़े

सुखी जीवन के तीन सूत्र 

Updated on 18 April, 2020, 6:00
सुखी, स्वाभिमान एवं सम्मान के साथ जीवन जीने के तीन सूत्र हैं- उपयोगिता, भावना एवं कर्तव्य। उपयोगिता संबंधों को प्रगाढ़ करती है, भावना परिवार को मजबूत करती है और कर्तव्य घर, परिवार, समाज में एकता एवं समन्वय स्थापित करते हैं। उक्त प्रेरक विचार मुनि पुलकसागर महाराज ने प्रवचन माला में... आगे पढ़े

प्रेम और सहयोग का नाम है परिवार

Updated on 17 April, 2020, 6:00
पारिवारिक सदस्यों के त्याग, सहयोग, स्वच्छता, प्रेम, संतुष्टि व व्यसनमुक्ति से ही परिवार संयुक्त और समृद्घिशाली बनता है। वे सौभाग्यशाली हैं जो संयुक्त परिवार में रह रहे हैं तथा जिन्हें माता -पिता का सान्निध्य प्राप्त हो रहा है। विश्व बंधुत्व की बात करने वालों को पहले अपने परिवार में बंधुत्व... आगे पढ़े

 संयम से जीवन की उन्नति 

Updated on 16 April, 2020, 6:00
कार्तिय माहात्म्य प्रवचनों में पं. रामनिवास ब्रजवासी जी ने कहा शरद ऋतु में की जाने वाली उपासनाओं से जहाँ चंद्र किरणों से प्राप्त होने वाले अमृत तत्व से देह का सिंचन होता है, वहीं सूर्य की रश्मियों की प्रचुर ऊर्जा से उस अमृत तत्व की शरीर में स्थिरता होती है... आगे पढ़े

वीरत्व की अलंकृति है क्षमा

Updated on 15 April, 2020, 6:00
क्षमा वीरत्व की अलंकृति है। दुर्बल और विवश व्यक्ति द्वारा उद्गीत क्षमा का माहात्म्य उतना प्रखर नहीं हो सकता। ज्ञान की स्फुरणा में मौन की सार्थकता है। शक्ति-संपन्नता में क्षमा की सार्थकता है और त्याग-भावना में आत्मगोपन या अप्रशस्ति की सार्थकता है। शक्ति के अभाव में स्वीकृत का कवच व्यक्ति... आगे पढ़े

अमिट है कर्म का फल

Updated on 14 April, 2020, 6:00
यदि कर्म का फल तुरंत नहीं मिलता है तो यह नहीं समझना चाहिए कि उसके भले-बुरे परिणाम से हम सदा के लिए बच गये। कर्मफल ऐसा अमिट तथ्य है जो आज नहीं तो कल भुगतना ही पड़ेगा। कभी-कभी परिणाम में देर इसलिए होती है क्योंकि ईश्वर मानवीय बुद्धि की परीक्षा... आगे पढ़े

 सर्वव्यापी है आत्मा

Updated on 11 April, 2020, 6:00
केवल वह जो क्षणिक है, छोटा या नर है, उसे ही सुरक्षा की आवश्यकता है; जो स्थायी है, बड़ा या विशाल है, उसे सुरक्षा की जरूरत नहीं। सुरक्षा का अर्थ है समय विशेष को लंबा कर देना; इसीलिए सुरक्षा परिवर्तन में बाधक भी होती है। पूर्ण सुरक्षा की स्थिति में... आगे पढ़े

 निराशा से होती है हार

Updated on 10 April, 2020, 6:00
नियति प्रम के निरंतर उल्लंघन से प्रकृति का अदृश्य वातावरण भी इन दिनों कम दूषित नहीं हो रहा है। भूकम्प, तूफान, बाढ़, विद्रोह, अपराध, महामारियां आदि पर नियंत्रण पाना कैसे संभव होगा, समझ नहीं आता। किंकर्त्तव्यविमूढ़ स्थिति में पहुंचा हतप्रभ व्यक्ति प्रमश: अधिक निराश होता है। इतना साहस और पराक्रम... आगे पढ़े

सच्चे ज्ञानी की विशेषता

Updated on 8 April, 2020, 6:00
व्यक्ति सत्संगति से तीन वस्तुओं को-शरीर, शरीर का स्वामी या आत्मा तथा आत्मा के मित्र को- एक साथ संयुक्त देखता है, वही सच्चा ज्ञानी है। जब तक आध्यात्मिक विषयों के वास्तविक ज्ञाता को संगति नहीं होती, वे अज्ञानी हैं, वे केवल शरीर को देखते हैं, और जब यह शरीर विनष्ट... आगे पढ़े

विचारों की तरंगें

Updated on 7 April, 2020, 6:00
राजा की सवारी निकल रही थी। सर्वत्र जय-जयकार हो रही थी। सवारी बाजार के मध्य से गुजर रही थी। राजा की दृष्टि एक व्यापारी पर पड़ी। वह चन्दन का व्यापार करता था। राजा ने व्यापारी को देखा। मन में घृणा और ग्लानि उभर आई। उसने मन ही मन सोचा, 'यह... आगे पढ़े

सिद्धांत गौण है, सत्ता प्रमुख

Updated on 2 April, 2020, 6:00
पिछले दिनों में राष्ट्रीय रंगमंच पर जिस प्रकार का राजनीतिक चरित्र उभरकर आ रहा है, वह एक गंभीर चिंता का विषय है। ऐसा लगता है, राजनीति का अर्थ देश में सुव्यवस्था बनाए रखना नहीं, अपनी सत्ता और कुर्सी बनाए रखना है। राजनीतिज्ञ का अर्थ उस नीति-निपुण व्यक्तित्व से नहीं है,... आगे पढ़े

अपनेपन का प्रेम असली प्रेम 

Updated on 31 March, 2020, 6:00
जब प्रेम बहुत गहरा होता है, तब तुम किसी भी गलतफहमी के लिए पूरी जिम्मेवारी लेते हो। पल भर के लिए ऊपरी तौर से नाराजगी व्यक्त कर सकते हो, परन्तु जब इस नाराजगी को दिल से महसूस नहीं करते, तब तुम एक-दूसरे को अच्छी तरह समझ पाते हो। तब तुम... आगे पढ़े

कर्म का फल हैं योनियां 

Updated on 30 March, 2020, 6:00
जीवों में शरीर तथा इन्द्रियों की विभिन्न अभिव्यक्तियां प्रकृति के कारण हैं। कुल मिलाकर 84 लाख भिन्न-भिन्न योनियां हैं और ये सब प्रकृतिजन्य हैं। जीव के विभिन्न इन्द्रिय-सुखों से ये योनिया मिलती हैं जो इस या उस शरीर में रहने की इच्छा करता है। जब उसे विभिन्न शरीर प्राप्त होते... आगे पढ़े

मृत्यु का अर्थ 

Updated on 29 March, 2020, 6:00
मृत्यु एक शात सत्य है। यह अनुभूति प्रत्यक्ष प्रमाणित है, फिर भी इसके संबंध में कोई दर्शन नहीं है।  अब तक जितने ऋषि-महर्षि या संत-महंत हुए हैं, उन्होंने जीवन दर्शन की चर्चा की है। जीवन के बारे में ऐसी अनेक दृष्टियां उपलब्ध हैं जिनसे जीवन को सही रूप में समझा... आगे पढ़े

 अंतर्दृष्टि से अनुबंधित है ज्ञान

Updated on 24 March, 2020, 6:00
बुद्धि अच्छी चीज है, पर कोरी बौद्धिकता ही सब कुछ नहीं है। इससे व्यक्ति के जीवन में नीरसता और शुष्कता आती है। ज्ञान अंतर्दृष्टि से अनुबंधित है, इसलिए यह अपने साथ सरसता लाता है। ज्ञानी व्यक्तियों के लिए पुस्तकीय अध्ययन की विशेष अपेक्षा नहीं रहती। भगवान महावीर ने कब पढ़ी... आगे पढ़े

भगवान की विचारणाएं

Updated on 23 March, 2020, 6:00
जब मनुष्य इस जिम्मेदारी को समझ ले कि मैं क्यों पैदा हुआ हूं और पैदा हुआ हूं तो मुझे क्या करना चाहिए? भगवान द्वारा सोचना, विचारना, बोलना, भावनाएं आदि अमानतें मनुष्य को इसलिए नहीं दी गई हैं कि उनके द्वारा वह सुख-सुविधाएं या विलासिता के साधन जुटा अपना अहंकार पूरा... आगे पढ़े

प्रार्थना की पुकार

Updated on 22 March, 2020, 6:00
यदि प्रार्थना सच्ची हो तो परमपिता परमेश्वर उस प्रार्थना को जरूर ही सुनते हैं। परमपिता परमेश्वर अत्यंत कृपालु और दयालु हैं, परंतु प्रार्थना के लिए भी हृदय का पवित्र और निर्मल होना अत्यंत आवश्यक है। मन का पवित्र होना, अहंकार और अभिमान से रहित होना नितांत आवश्यक है। ऐसे पवित्र-हृदय-अंतŠ... आगे पढ़े

 विवेक ही धर्म है 

Updated on 21 March, 2020, 6:00
युग के आदि में मनुष्य भी जंगली था। जब से मनुष्य ने विकास करना शुरू किया, उसकी आवश्यकताएं बढ़ गई। आवश्यकताओं की पूर्ति न होने से समस्या ने जन्म लिया। समस्या सामने आई तब समाधान की बात सोची गई। समाधान के स्तर दो थे- पदार्थ-जगत, मनो-जगत. प्रथम स्तर पर पदाथरे... आगे पढ़े

 धर्म क्या है?

Updated on 20 March, 2020, 6:00
धर्म के मुख्यत:  दो आयाम हैं। एक है संस्कृति, जिसका संबंध बाहर से है। दूसरा है अध्यात्म, जिसका संबंध भीतर से है। धर्म का तत्व भीतर है, मत बाहर है। तत्व और मत दोनों का जोड़ धर्म है। तत्व के आधार पर मत का निर्धारण हो, तो धर्म की सही... आगे पढ़े

नित अभ्यास से दर्शन कर सकते हैं ईश्वर का

Updated on 18 March, 2020, 6:00
सभी शास्त्र  कहते हैं कि बिना भगवान को प्राप्त किये मुक्ति नहीं मिल सकती है। इसलिए भगवान की तलाश के लिए कोई व्यक्ति मंदिर जाता है तो कोई मस्जिद, कोई गुरूद्वारा, तो कोई गिरजाघर। लेकिन इन सभी स्थानों में जड़ स्वरूप भगवान होता है। अर्थात ऐसा भगवान होता है जिसमें... आगे पढ़े