Thursday, 19 September 2019, 3:49 AM

जीवन मंत्र

आत्मा का दिव्य भाव 

Updated on 18 September, 2019, 6:00
जो व्यक्ति दिव्य पद पर स्थित है, वह न किसी से ईष्या करता है और न किसी वस्तु के लिए लालायित रहता है। जब कोई जीव इस संसार में भौतिक शरीर से युक्त होकर रहता है, तो समझना चाहिए कि वह प्रकृति के तीन गुणों में से छूट जाता है।... आगे पढ़े

प्रधानता आत्मा को 

Updated on 17 September, 2019, 6:00
मनुष्य सामान्यत: जो बाह्य में देखता, सुनता, समझता है वह यथार्थ ज्ञान नहीं होता। किन्तु भ्रमवश उसी को यथार्थ ज्ञान मान लेता है। अवास्तविक ज्ञान को ही ज्ञान समझकर और उसके अनुसार अपने कार्य करने केकारण मनुष्य अपने मूल उद्देश्य सुख-शान्ति की दिशा में अग्रसर न होकर विपरीत दिशा में... आगे पढ़े

 कैंची काटती है, सुई जोड़ती है 

Updated on 16 September, 2019, 6:00
कैंची काटती (तोड़ती) है और सुई जोड़ती है। यही कारण है कि तोड़ने वाली कैंची पैर के नीचे पड़ी रहती है और जोड़ने वाली सुई सिर पर स्थान पाती है। इसलिए मनुष्य का यही धर्म है कि इनसान को जोड़े न कि तोड़े। उन्होंने सास-बहू में एका होने का आह्वान... आगे पढ़े

जहाँ शांति है वही सुख 

Updated on 15 September, 2019, 6:00
यदि हमारे पास दुनिया का पूरा वैभव और सुख-साधन उपलब्ध है परंतु शांति नहीं है तो हम भी आम आदमी की तरह ही हैं। संसार में मनुष्यों द्वारा जितने भी कार्य अथवा उद्यम किए जा रहे हैं सबका एक ही उद्देश्य है 'शांति'। सबसे पहले तो हमें ये जान लेना... आगे पढ़े

जीवन एक क्रिकेट मैच 

Updated on 14 September, 2019, 6:00
प्रांतिकारी संत तरुणसागरजी ने क्रिकेट की व्याख्या करते हुए कहा कि जीवन एक क्रिकेट है, धरती की विराट पिच पर समय बॉलिंग कर रहा है। शरीर बल्लेबाज है, परमात्मा के इस आयोजन पर अम्पायर धर्मराज हैं। बीमारियाँ फील्डिंग कर रही हैं, विकेटकीपर यमराज हैं, प्राण हमारा विकेट है, जीवन एक... आगे पढ़े

क्या हैं आध्यात्मिक होने का अर्थ 

Updated on 13 September, 2019, 6:00
यह प्रश्न किसी भी जिज्ञासु के मन में उठ सकता है कि हमें ठीक-ठीक ऐसा क्या करना चाहिए ताकि वह जो परम है, जो परमेश्वर है, वह मेरे जीवन में घटित हो सके? सदगुरु इसका उत्तर देते हैं कि अध्यात्म भीगी बिल्लियों के लिए नहीं है, क्या तुम समझ रहे... आगे पढ़े

ज्ञेय और ज्ञान का संबंध

Updated on 12 September, 2019, 6:00
दर्शन के क्षेत्र में ज्ञान और ज्ञेय की मीमांसा चिरकाल से होती रही है। आदर्शवादी और विज्ञानवादी दर्शन ज्ञेय की स्वतंत्र सत्ता स्वीकार नहीं करते। वे केवल ज्ञान की ही सत्ता को मान्य करते हैं। अनेकांत का मूल आधार यह है कि ज्ञान की भांति ज्ञेय की भी स्वतंत्र सत्ता... आगे पढ़े

उत्तम आकिन्चन्य, ममता दुख की खान

Updated on 11 September, 2019, 6:30
बाहर के पत्थर फेंकने से काम नहीं चलेगा, बाहर के बोझ के साथ साथ भीतरी बोझ भी उतारना जरूरी है। जव तक चित्त पर काम, क्रोध, लोभ और मोह के पत्थरों का बोझ है, तब तक चेतना का ऊध्र्वारोहण संभव नहीं है। चेतना के ऊध्र्वारोहण के लिये बाहर और भीतर... आगे पढ़े

 सन्मार्ग की प्रवृत्ति

Updated on 11 September, 2019, 6:00
उत्तम कार्य की कार्य प्रणाली भी प्राय: उत्तम होती है। दूसरों की सेवा या सहायता करनी है, तो प्राय: मधुर भाषण, नम्रता, दान, उपहार आदि द्वारा उसे संतुष्ट किया जाता है। परन्तु कई बार इसके विपरीत प्रिया-प्रणाली ऐसी कठोर, तीक्ष्ण एवं कटु बनानी पड़ती है कि लोगों को भ्रम हो... आगे पढ़े

प्रेम और समर्पण

Updated on 9 September, 2019, 6:00
प्रेम जीवन की परम समाधि है. प्रेम ही शिखर है जीवन ऊर्जा का. वही गौरीशंकर है जिसने प्रेम को जाना, उसने सब जान लिया. जो प्रेम से वंचित रह गया, वह सभी कुछ से वंचित रह गया। प्रेम की भाषा को ठीक से समझ लेना जरूरी है। प्रेम के शास्त्र... आगे पढ़े

शांति के लिए संतुलन जरूरी है.... 

Updated on 8 September, 2019, 6:00
अति हमेशा नुकसान दायक है। यह नियम अच्छी और बुरी दोनों आदतों पर लागू होता है। ऋषि-मुनियों ने अति को वर्जित ही बताया है। बुद्ध ने एक शब्द दिया था मंझम मग्न यानी मध्यम मार्ग। जीवन का यह संतुलन उन्हें एक दिन वह सब दिला गया जिसके लिए उनकी पूरी... आगे पढ़े

 निर्णय में बदलाव पर नजर

Updated on 7 September, 2019, 6:00
लोगों के व्यवहार व कार्यो से या तो तुम सहमत होते हो या असहमत। परंतु इतना सदैव याद रखो कि सब कुछ परिवर्तनशील है। इसीलिए किसी भी निर्णय पर अड़े मत रहो वरना तुम्हारी धारणाएं चट्टान की तरह ठोस हो जाती हैं और तुम्हें व औरों को दु:खी करती हैं।... आगे पढ़े

पशुवध निंदनीय-दंडनीय कर्म

Updated on 6 September, 2019, 6:00
सतोगुण में किये गये पुण्यकर्मो का फल शुद्ध होता है, अतएव वे मुनिगण, जो समस्त मोह से मुक्त हैं, सुखी रहते हैं। लेकिन रजोगुण में किये गये कर्म दुख का कारण बनते है। भौतिक सुख के लिए जो भी कार्य किया जाता है, उसका विफल होना निश्चित है। उदाहरणार्थ, यदि... आगे पढ़े

वाणी हमेशा अच्छी रहे 

Updated on 5 September, 2019, 7:00
हमारी वाणी भी जीवन में अहम भाव रखती है और यह बिगड़ जाये तो जीवन कष्टकारी होने में देर नहीं लगती, इसलिए अपनी वाणी हमेशा अच्छी होनी चाहिये। अगर ऐसा नहीं होता तो हमें विपरीन हालातों का सामना करना पड़ता है। कई बार ग्रह दशा से भी वाणी खराब हो... आगे पढ़े

एकता में भाषा भी अवरोध

Updated on 4 September, 2019, 6:00
भाषा, जो दूसरों तक अपने विचारों को पहुंचाने का माध्यम है, उसे भी राष्ट्रीय एकता के सामने समस्या बनाकर खड़ा कर दिया जाता है. अपनी भाषा के प्रति आकषर्ण होना अस्वाभाविक नहीं है और मातृभाषा व्यक्ति के बौद्धिक विकास का सशक्त माध्यम बन सकती है, इसमें कोई संदेह नहीं. पर... आगे पढ़े

 राष्ट्रीय एकता में बाधक तत्व 

Updated on 3 September, 2019, 6:00
आर्थिक और सामाजिक असमानता राष्ट्रीय एकता में बहुत बड़ी बाधा है। उस असमानता का मूल है अहं और स्वार्थ। इसलिए राष्ट्र की भावात्मक एकता के लिए अहं-विसर्जन और स्वार्थ-विसर्जन को मैं बहुत महत्व देता हूं। जातीय असमानता भी राष्ट्रीय एकता का बहुत बड़ा विघ्न है। उसका भी मूल कारण अहं... आगे पढ़े

मन की शक्ति 

Updated on 2 September, 2019, 6:00
मन को जीवन का केंद्रबिंदु कहना असंभव नहीं है। मनुष्य की प्रियाओं, आचरणों का प्रारंभ मन से ही होता है। मन तरह-तरह के संकल्प, कल्पनाएं करता है। जिस ओर उसका रुझान हो जाता है उसी ओर मनुष्य की सारी गतिविधियां चल पड़ती है। जैसी कल्पना हो उसी के अनुरूप प्रयास-पुरुषार्थ... आगे पढ़े

कर्त्तव्य को बनाएं सर्वोपरि लक्ष्य 

Updated on 1 September, 2019, 6:00
अध्यापक ने विद्यार्थियों से पूछा- ‘रामायण और महाभारत में क्या अंतर है?’ विद्यार्थियों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार उत्तर दिए। अध्यापक को संतोष नहीं हुआ। एक विद्यार्थी ने अनुरोध किया- ‘आप ही बताइए’ अध्यापक बोला-रामायण और महाभारत में सबसे बड़ा अंतर है ‘हक-हकूक’ का। रामायण में राम ने अपना अधिकार... आगे पढ़े

साधना और सुविधा 

Updated on 31 August, 2019, 6:00
आसक्ति के पथ पर आगे बढ़ने वाले अपनी आकांक्षाओं को विस्तार देते हैं। उनकी इच्छाओं का इतना विस्तार हो जाता है, जहां से लौटना संभव नहीं है। उस विस्तार में व्यक्ति का अस्तित्व विलीन हो जाता है। फिर वह अपने लिए नहीं जीता। उसके जीवन का आधार पदार्थ बन जाता... आगे पढ़े

 प्रेम और सहयोग का नाम है परिवार  

Updated on 30 August, 2019, 6:00
पारिवारिक सदस्यों के त्याग, सहयोग, स्वच्छता, प्रेम, संतुष्टि व व्यसनमुक्ति से ही परिवार संयुक्त और समृद्घिशाली बनता है। वे सौभाग्यशाली हैं जो संयुक्त परिवार में रह रहे हैं तथा जिन्हें माता -पिता का सान्निध्य प्राप्त हो रहा है। विश्व बंधुत्व की बात करने वालों को पहले अपने परिवार में बंधुत्व... आगे पढ़े

कर्म के पाप-पुण्य में फंस जाता है जीव  

Updated on 29 August, 2019, 7:15
ईश्वर क्षेत्रज्ञ या चेतन है, जैसा कि जीव भी है, लेकिन जीव केवल अपने शरीर के प्रति सचेत रहता है, जबकि भगवान समस्त शरीरों के प्रति सचेत रहते हैं। चूंकि वे प्रत्येक जीव के हृदय में वास करने वाले हैं, अतएव वे जीवविशेष की मानसिक गतिशीलता से परिचित रहते हैं।... आगे पढ़े

सुख की उपेक्षा क्यों?  

Updated on 28 August, 2019, 6:00
मेरे पास लोग आते हैं। जब वे अपने दुख की कथा रोने लगते हैं, तो बड़े प्रसन्न मालूम होते हैं। उनकी आंखों में चमक मालूम होती है। जैसे कोई बड़ा गीत गा रहे हों! अपने घाव खोलते हैं, लेकिन लगता है जैसे कमल के फूल ले आए हैं। सुख की... आगे पढ़े

 सुख के स्वभाव में डूबो  

Updated on 27 August, 2019, 6:15
लगता है, आदमी दुख का खोजी है। दुख को छोड़ता नहीं, दुख को पकड़ता है। दुख को बचाता है। दुख को संवारता है; तिजोरी में संभालकर रखता है।   दुख का बीज हाथ पड़ जाए, हीरे की तरह संभालता है। लाख दुख पाए, पर फेंकने की तैयारी नहीं दिखाता। जो लोग... आगे पढ़े

सत्ता और नैतिकता  

Updated on 26 August, 2019, 6:00
सत्ता के संचालन में शक्ति की अपेक्षा रहती है या नहीं, यह एक बड़ा प्रश्न है। शक्ति दो प्रकार की होती है- नैतिक शक्ति और उपकरण शक्ति। नैतिक शक्ति के बिना तो व्यक्ति सही ढंग से प्रशासन कर ही नहीं सकता। उपकरण शक्ति का जहां तक प्रश्न है, एक सीमा... आगे पढ़े

इच्छाओं को समर्पित करते जाओ  

Updated on 25 August, 2019, 6:00
सभी इच्छाएं खुशी के लिए होती हैं। इच्छाओं का लक्ष्य ही यही है। किंतु इच्छा आपको कितनी बार लक्ष्य तक पहुंचाती है? इच्छा तुम्हें आनंद की ओर ले जाने का आभास देती है, वास्तव में वह ऐसा कर ही नहीं सकती। इसीलिए इसे माया कहते हैं। इच्छा कैसे पैदा होती... आगे पढ़े

चैन से सोना है तो 'सोने' को कहें ना  

Updated on 24 August, 2019, 6:00
सोने की चमक सभी को आकर्षित करती है। इसी आकर्षण के कारण लोग अधिक से अधिक सोना खरीदने चाहते हैं। यह चाहत तब और भी बढ़ जाती है जब सोने की कीमत में अचानक थोड़ी गिरावट आती है। लोग इस मौका का लाभ उठाना चाहते हैं। आज कल बाजार में... आगे पढ़े

निष्ठा और सत्य 

Updated on 21 August, 2019, 6:00
निष्ठा अविभाजित मन, अविभाजित चेतना का स्वभाव है। ईश्वर में तुम्हारी निष्ठा है, उसे जानने का प्रयत्न मत करो। आत्मा में तुम्हारी निष्ठा है, उसे जानने का प्रयत्न मत करो। जिसमें भी तुम्हारी निष्ठा है, उसे जानने की कोशिश न करो। बच्चे को मां में विश्वास है। बच्चा मां को... आगे पढ़े

ध्वनि तंरगों से रोगें का उपचार  

Updated on 20 August, 2019, 6:00
यह बात जान कर आप सभी को आश्चर्य होगा की ध्वनि तंरगें से भी रोगों के उपाच होते है। यह विश्व जीवों से भरा है। ध्वनि तंरगों की टकराहट से सुक्ष्म जीव मर जाते है, रात्री में सूर्य की पराबैगनी किरणां के अभाव में सूक्ष्म जीव उत्पन्न होते है जो... आगे पढ़े

वाणी का शरीर पर प्रभाव  

Updated on 19 August, 2019, 6:00
मानव शरीर में अनेक ग्रंथियां होती हैं,पियूष ग्रंथि मस्तिष्क में होती है, उससे 12 प्रकार के रस निकलते है, जो भावनाओं से विशेष प्रभावित होती हैं। जब व्यक्ति प्रसन्नचित होता है, तो इन ग्रनथियों से विशेष प्रकार के रस बहने लगते है, जिससे शरीर पुष्ट होने लगता है, बुद्धि विकसित... आगे पढ़े

 मौन का तन मन की सुन्दरता के लिये महत्व 

Updated on 18 August, 2019, 6:00
प्रत्येक मनुष्य सुन्दर एवं स्वस्थ्य रहना चाहता है। सुन्दरता एवं स्वस्थ्य का राज मौन मै छिपा हुआ है। सामान्यतŠ चुप रहना मौन है, प्राचीन पुराण बचन के साथ ईष्या, डाह, छल, कपट और हिन्सा को कम करना मोन होता है। मनोवैज्ञानिक ‘फ्रायड’ का कहना है कि जीवन अन्तर्द्वद्वी शृंखलाओं से... आगे पढ़े

ध्वनि का प्राणी शरीर पर प्रभाव  

Updated on 17 August, 2019, 6:00
यह जानकर खुश होगें की ध्वनि का प्रभाव प्रत्येक जीव के शरीर पर पड़ता है। वर्तमान औधोगिकी करण और तकनीकि से ध्वनि प्रदूषण अधिक मात्रा में बढ़ रहा है। इस ध्वनि प्रदूषण के परिणाम देखते हुये नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. राबर्ट कॉक ने सन् 1925-26 में एक बात कही थी... आगे पढ़े

जो नहीं है उसे पाना हो ध्येय

Updated on 14 August, 2019, 6:00
असंतुष्ट होने का अर्थ दुखी होना नहीं है। असल में कोई आदमी पूरी तरह सुखी होकर भी असंतुष्ट हो सकता है। सुखी होने का मतलब है, जो है, उसे आनंद से भोगना। और असंतुष्ट होने का अर्थ है: जो नहीं है उसे आनंद से पैदा करने का श्रम करना। जब... आगे पढ़े

जीवन के चार आधार

Updated on 13 August, 2019, 6:00
सुसंस्कारिता के चार आधार हैं- समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी। इन्हें आध्यात्मिक-आंतरिक वरिष्ठता की दृष्टि में उतना ही महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए जितना शरीर के लिए अन्न, जल, वस्त्र और निवास अनिवार्य समझा जाता है। समझदारी का अर्थ है- दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाना। आमतौर से लोग तात्कालिक लाभ को सब कुछ... आगे पढ़े

उपयोगी हल 

Updated on 12 August, 2019, 6:00
एक बार की बात है एक राजा था। उसका एक बड़ा-सा राज्य था।एक दिन उसे देश घूमने का विचार आया और उसने देश भ्रमण की योजना बनाई और घूमने निकल पड़ा। जब वह यात्रा से लौट कर अपने महल आया। उसने अपने मंत्रियों से पैरों में दर्द होने की शिकायत... आगे पढ़े

सम्यक दृष्टिकोण की जरूरत

Updated on 11 August, 2019, 6:00
आज मानवता को बचाने से अधिक कोई करणीय काम प्रतीत नहीं होता। मनुष्य औद्योगिक और यांत्रिक विकास कर पाए या नहीं, इनसे मानवता की कोई क्षति नहीं होने वाली है, किंतु उसमें मानवीय गुणों का विकास नहीं होता है तो कुछ भी नहीं होता है। एक मानवता बचेगी तो सब... आगे पढ़े

 व्यक्तिगत चेतना का विस्तार 

Updated on 10 August, 2019, 6:00
दूसरों के सुख-दुख का भागी बनने से हमारी व्यक्तिगत चेतना विकसित होकर विश्व चेतना बन जाती है। समय के साथ जब ज्ञान की वृद्धि होती है, तब उदासीनता संभव नहीं। तुम्हारा आंतरिक स्रोत ही आनन्द है।अपने दु:ख को दूर करने का उपाय है विश्व के दुख में भागीदार होना और... आगे पढ़े

 'थुकदम’ पर शोध खोलेगा जीवन-मृत्यु का रहस्य 

Updated on 8 August, 2019, 6:00
गीता में कहा गया है कि शरीर तो एक पुतला मात्र है इसमें मौजूद आत्मा जीव है। यह जिस शरीर में होता है उस शरीर के गुण, कर्म और अपेक्षा के अनुरूप मृत्यु के बाद नया शरीर धारण कर लेता है। आत्मा न तो जन्म लेता है और न इसकी... आगे पढ़े

मन की शक्ति 

Updated on 7 August, 2019, 6:00
मन को जीवन का केंद्रबिंदु कहना असंभव नहीं है। मनुष्य की क्रियाओं, आचरणों का प्रारंभ मन से ही होता है। मन तरह-तरह के संकल्प, कल्पनाएं करता है। जिस ओर उसका रुझान हो जाता है उसी ओर मनुष्य की सारी गतिविधियां चल पड़ती है। जैसी कल्पना हो उसी के अनुरूप प्रयास-पुरुषार्थ... आगे पढ़े

 इस तरह रामचरित मानस बना धर्म शास्त्र 

Updated on 5 August, 2019, 6:00
करीब पांच सौ साल पहले तक कोई धर्म ग्रंथ हिंदी में नहीं था। सभी धर्म ग्रंथ संस्कृत में थे और चूंकि मध्य काल में शिक्षा दीक्षा का चलन काफी कम हो गया था, भक्ति भावना या धर्म श्रद्धा के लिए लोग संस्कृत विद्वानों की ओर ही ताकते थे। ऐसा कोई... आगे पढ़े

दूसरों के दुख से अपना दुख ज्यादा बेहतर

Updated on 4 August, 2019, 6:00
एक कहावत है 'राजा दुखी, प्रजा दुखी सुखिया का दुख दुना।' कहने का अर्थ यह है कि संसार में जिसे देखो वह अपने को दुखी ही कहेगा। राजा का अपना दुख है, प्रजा का अपना और जिसे आप सुखी माने बैठें हैं उससे पूछ कर देंखेंगे तो वह भी अपने... आगे पढ़े

व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया 

Updated on 3 August, 2019, 6:00
बदलाव का प्रम निरंतर चलता है।जैन दर्शन इस प्रम को पर्याय-परिवर्तन के रूप में स्वीकार करता है। पर्याय का अर्थ है अवस्था।प्रत्येक वस्तु की अवस्था प्रतिक्षण बदलती है।यह जगत की स्वाभाविक प्रक्रिया है। कुछ अवस्थाओं को प्रयत्नपूर्वक भी बदला जाता है।स्वभाव से हो या प्रयोग से, बदलाव की प्रक्रिया को... आगे पढ़े

दोनों प्रकार का धन एक साथ नहीं मिल सकता  

Updated on 1 August, 2019, 6:00
संसार में दो प्रकार का धन होता है भौतिक धन और दूसरा आध्यात्मिक धन। मनुष्य का स्वभाव है कि वह ज्यादा से ज्यादा धन कमाने की चाहत रखता है। कोई व्यक्ति सोना, चांदी, रूपये पैसे का अंबार लगाकर धनवान कहलाता है तो कोई भूखा, प्यासा रहकर भी धनवान कहलता है।... आगे पढ़े

 साधना और सुविधा

Updated on 31 July, 2019, 6:00
आसक्ति के पथ पर आगे बढ़ने वाले अपनी आकांक्षाओं को विस्तार देते हैं। उनकी इच्छाओं का इतना विस्तार हो जाता है, जहां से लौटना संभव नहीं है। उस विस्तार में व्यक्ति का अस्तित्व विलीन हो जाता है। फिर वह अपने लिए नहीं जीता। उसके जीवन का आधार पदार्थ बन जाता... आगे पढ़े

कर्म के पाप-पुण्य में फंस जाता है जीव

Updated on 30 July, 2019, 6:00
ईश्वर क्षेत्रज्ञ या चेतन है, जैसा कि जीव भी है, लेकिन जीव केवल अपने शरीर के प्रति सचेत रहता है, जबकि भगवान समस्त शरीरों के प्रति सचेत रहते हैं। चूंकि वे प्रत्येक जीव के हृदय में वास करने वाले हैं, अतएव वे जीवविशेष की मानसिक गतिशीलता से परिचित रहते हैं।... आगे पढ़े

सुख की उपेक्षा क्यों?

Updated on 29 July, 2019, 6:00
मेरे पास लोग आते हैं। जब वे अपने दुख की कथा रोने लगते हैं, तो बड़े प्रसन्न मालूम होते हैं। उनकी आंखों में चमक मालूम होती है। जैसे कोई बड़ा गीत गा रहे हों! अपने घाव खोलते हैं, लेकिन लगता है जैसे कमल के फूल ले आए हैं। सुख की... आगे पढ़े

 सुख के स्वभाव में डूबो 

Updated on 28 July, 2019, 6:00
लगता है, आदमी दुख का खोजी है। दुख को छोड़ता नहीं, दुख को पकड़ता है। दुख को बचाता है। दुख को संवारता है; तिजोरी में संभालकर रखता है।   दुख का बीज हाथ पड़ जाए, हीरे की तरह संभालता है। लाख दुख पाए, पर फेंकने की तैयारी नहीं दिखाता। जो लोग... आगे पढ़े

 इच्छाओं को समर्पित करते जाओ  

Updated on 27 July, 2019, 6:00
सभी इच्छाएं खुशी के लिए होती हैं। इच्छाओं का लक्ष्य ही यही है। िंकतु इच्छा आपको कितनी बार लक्ष्य तक पहुंचाती है? इच्छा तुम्हें आनंद की ओर ले जाने का आभास देती है, वास्तव में वह ऐसा कर ही नहीं सकती। इसीलिए इसे माया कहते हैं। इच्छा वैâसे पैदा होती... आगे पढ़े

सम्यक दृष्टिकोण की जरूरत  

Updated on 26 July, 2019, 6:00
आज मानवता को बचाने से अधिक कोई करणीय काम प्रतीत नहीं होता। मनुष्य औद्योगिक और यांत्रिक विकास कर पाए या नहीं, इनसे मानवता की कोई क्षति नहीं होने वाली है, िंकतु उसमें मानवीय गुणों का विकास नहीं होता है तो कुछ भी नहीं होता है। एक मानवता बचेगी तो सब... आगे पढ़े

इस तरह रामचरित मानस बना धर्म शास्त्र  

Updated on 25 July, 2019, 6:00
करीब पांच सौ साल पहले तक कोई धर्म ग्रंथ हिदीं में नहीं था। सभी धर्म ग्रंथ संस्कृत में थे और चूंकि मध्य काल में शिक्षा दीक्षा का चलन काफी कम हो गया था, भक्ति भावना या धर्म श्रद्धा के लिए लोग संस्कृत विद्वानों की ओर ही ताकते थे। ऐसा कोई... आगे पढ़े

दूसरों के दुख से अपना दुख ज्यादा बेहतर  

Updated on 24 July, 2019, 6:00
एक कहावत है 'राजा दुखी, प्रजा दुखी सुखिया का दुख दुना।' कहने का अर्थ यह है कि संसार में जिसे देखो वह अपने को दुखी ही कहेगा। राजा का अपना दुख है, प्रजा का अपना और जिसे आप सुखी माने बैठें हैं उससे पूछ कर देंखेंगे तो वह भी अपने... आगे पढ़े