Monday, 23 April 2018, 8:46 PM

प्रेरक बातें

इन 8 बातों ने बनाया नरेंद्र को स्वामी विवेकानंद

Updated on 12 January, 2015, 13:04
स्वयं के प्रति ईमानदार रहें। खुद पर यकीन रखेंगे तो दुनिया जीत सकते हैं। इस दुनिया में कोई भी कार्य ऐसा नहीं है जो इंसान नहीं कर सकता है। अगर दुनिया में कोई पाप सबसे बड़ा है तो वह है अपने आपको कमजोर कहना। अपना रास्ता खुद बनाएं। इस दुनिया में नाम... आगे पढ़े

भारत भूमि की महिमा

Updated on 12 January, 2015, 8:59
भारत केवल भूगोल या इतिहास का ही अंग नहीं है. यह सिर्फ एक देश, एक राष्ट्र, एक जमीन का टुकड़ा मात्र नहीं है. यह कुछ और भी है. एक प्रतीक, एक काव्य, कुछ अदृश्य सा- फिर भी जिसे छुआ जा सके! कुछ विशेष ऊर्जा-तरंगों से स्पंदित है यह जगह, जिसका... आगे पढ़े

एकाग्रता का अभ्यास

Updated on 10 January, 2015, 12:27
बात तब की है जब स्वामी विवेकानंद इतने विख्यात नहीं हुए थे। उन्हें अच्छी पुस्तकें पढ़ने का बहुत शौक था। एक बार वे देश में ही कहीं प्रवास पर थे। उनके गुरुभाई उन्हें एक बड़े पुस्तकालय से अच्छी-अच्छी पुस्तकेें लाकर देते थे। स्वामी जी की पढ़ने की गति बहुत तेज थी।... आगे पढ़े

मिलन: न तन, न मन, न भावना से

Updated on 9 January, 2015, 12:50
सद्गुरू, एक होना ना केवल सामाजिक स्तर पर बल्कि आध्यात्मिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण समझा जाता है। प्रेमी युगल अकसर तन, मन और भावना से एक होने की बात भी करते हैं। लेकिन क्या यह संभव है? इस सृष्टि में तन, मन या भावना के धरातल पर कोई भी दो... आगे पढ़े

दुराचारी का वध जरूरी

Updated on 9 January, 2015, 9:56
भौतिक दृष्टि से, प्रत्येक व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को तुष्ट करना चाहता है और चाहता है कि ईश्वर उसके आज्ञापालक की तरह काम करें. किन्तु ईश्वर उनकी तृप्ति वहीं तक करते हैं जितने के वे पात्र होते हैं. किन्तु जब कोई इसके विपरीत मार्ग ग्रहण करता है अर्थात जब वह अपनी इन्द्रियों... आगे पढ़े

जैसी करनी वैसा फल

Updated on 8 January, 2015, 9:00
कर्मफल एक ऐसी सच्चाई है जिसे इच्छा या अनिच्छा से स्वीकारना ही होगा. यह समूची सृष्टि एक सुनियोजित व्यवस्था की श्रृंखला में जकड़ी हुई है. क्रिया की प्रतिक्रिया का नियम कण-कण पर लागू होता है और उसकी परिणति का प्रत्यक्ष दर्शन पग-पग पर होता है. कुछ कर्म तत्काल फल देते... आगे पढ़े

प्रेम की पवित्रता

Updated on 6 January, 2015, 13:06
इन दिनों प्राय: प्रेम का अर्थ लोभ, स्वार्थ, कामना और वासना से लगाया जाता है। यह कोई प्रेम नहीं है, यह तो कुछ पाने की इच्छा है और इच्छा तो अनंत होती है। इसकी पूर्ति संभव नहीं है, लेकिन प्रेम तो शुरू भी है और अंत भी। कहीं कोई विराम... आगे पढ़े

प्रेम किसी पर आश्रित नहीं

Updated on 4 January, 2015, 9:37
जब तुम किसी से जुड़े होते हो, आसक्त होते हो और दूसरा तुम्हारे साथ आसक्त होता है, तो तुम्हें लगता है कि इस अजनबी संसार में तुम अकेले नहीं हो. कोई तुम्हारे साथ है. किसी से संबंधित होने का यह भाव तुम्हें एक तरह की सुरक्षा देता है. जब मानवीय... आगे पढ़े

आत्मा और परमात्मा का संबंध

Updated on 2 January, 2015, 10:15
आधुनिक विज्ञानीजन तक जो आत्मा के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करते, पर साथ ही हृदय से शक्ति साधन की व्याख्या भी नहीं कर पाते, उन परिवर्तनों को स्वीकार करने को बाध्य हैं, जो बाल्यकाल से कौमारावस्था और फिर तरुणावस्था तथा वृद्धावस्था में होते रहते हैं. वृद्धावस्था से यही परिवर्तन दूसरे... आगे पढ़े

समर्पण

Updated on 1 January, 2015, 18:22
जो सब समर्पण करता है वह सब पा लेता है। जो कतार में सबसे पीछे खड़ा हो जाता है अपने अहं और दोषों को त्याग कर वह कतार में सबसे आगे जगह पा लेता है क्योंकि वह अहं के भारी बोझ से दबा नहीं होता। ऐसा व्यक्ति अपनी बारी... आगे पढ़े

आंतरिक दरिद्रता की ऐसे करें पहचान!

Updated on 1 January, 2015, 9:07
एक छोटी-सी कहानी आपको सुनाता हूं। गुरु नानक लाहौर के पास एक गांव में ठहरे हुए थे। वहां एक बड़े वैभव शाली व्यक्ति ने जाकर उनको कहा, 'मेरे पास बहुत संपत्ति है, मुझे उसका सदुपयोग करना है। आप कोई मार्ग बताएं, आप कोई मौका दें, मैं उसका उपयोग कर सकूं।' नानक... आगे पढ़े

क्षमा का अर्थ है हृदय को उदार बनाना

Updated on 31 December, 2014, 10:02
जैन धर्म में दस दिवसीय पर्युषण पर्व एक ऐसा पर्व है जो उत्तम क्षमा से प्रारंभ होता है और क्षमा वाणी पर ही उसका समापन होता है। क्षमा वाणी शब्द का सीधा अर्थ है कि व्यक्ति और उसकी वाणी में क्रोध, बैर, अभिमान, कपट व लोभ न हो। अपने प्रतिद्वंद्वी... आगे पढ़े

जीवन धन्य बनाती हैं कथाएं

Updated on 30 December, 2014, 10:06
जीवन की स्वाभाविक मांग अध्यात्म है। जब उसकी पूर्ति होने लगती है तब सहसा प्रसन्नता, आनंद, उल्लास,जीवन में धन्यता, उत्सव धर्मिता, स्थायित्व, प्रसन्नता अनुभूत होने लगती है। अध्यात्म स्वभाव का नाम है। जो हमें स्वभाव की ओर ले आए, अपने अस्तित्व की ओर, अपनी सत्ता की ओर, उसे अध्यात्म कहते... आगे पढ़े

आसक्ति नहीं सजगता है संवेदनशीलता

Updated on 28 December, 2014, 9:43
संवेदनशील होते हुए भी विरक्त कैसे हुआ जाए? ये दोनों बातें विरोधी नहीं हैं, विपरीत नहीं हैं. यदि तुम अधिक संवेदनशील हो तो तुम विरक्त होओगे या यदि तुम विरक्त हो तो अधिकाधिक संवेदनशील होते जाओगे. परंतु संवेदनशीलता आसक्ति नहीं है, संवेदनशीलता सजगता है. केवल एक सजग व्यक्ति ही संवेदनशील... आगे पढ़े

कठिन लोगों के साथ कुछ इस तरह करें निबाह

Updated on 26 December, 2014, 9:54
एक बार एक शिष्य ने मुझसे पूछा कि गुरुजी जब मैं अपने पिता के साथ संवाद स्थापित करता हूं तो वे गुस्सा हो जाते हैं। वे मुझे डांटते हैं और फिर मैं परेशान हो जाता हूं कि मैं क्या करूं। मुझे समझ नहीं आता कि मैं उनके साथ कैसे संवाद स्थापित... आगे पढ़े

जीसस क्राइस्ट: एक प्रेम भरी संभावना

Updated on 25 December, 2014, 13:50
ईसामसीह और ईसाई धर्म लगभग पर्यायवाची हैं। मगर 'ईश्वर के पुत्रÓ के नाम पर, क्या हम उस असाधारण मानवता का मूलतत्व खो बैठे हैं, जिसके प्रतीक ईसामसीह थे। क्रिसमस के मौके पर सद्गुरु हमें याद दिला रहे हैं कि ईसामसीह की भावना को अपने दिल में लाने का क्या मतलब... आगे पढ़े

क्रिसमस का संदेश...अत्याचार पर सदाचार की विजय

Updated on 25 December, 2014, 11:09
ईसा मसीह का जन्म गरीब, दबे-कुचले और संत्रस्त लोगों को उनकी पीड़ा से उबारने के लिए हुआ था। उन्होंने लोगों को गरीबों-लाचारों की मदद करना, प्रेमभाव और बराबरी से रहना सिखाया। क्रिसमस भी यही संदेश देता है कि अत्याचार पर सदाचार की विजय होती है... ईसा-मसीह ने लोगों को बाहरी और... आगे पढ़े

भय से न होना भयभीत

Updated on 24 December, 2014, 7:21
यह स्वाभाविक है। जब कभी तुम आतंकित महसूस करो, बस विश्रांत हो जाओ। इस सत्य को स्वीकार लो कि भय यहां है, लेकिन उसके बारे में कुछ भी मत करो। उसकी उपेक्षा करो, उस पर किसी प्रकार का ध्यान मत दो। शरीर को देखो। वहां किसी प्रकार का तनाव नहीं होना... आगे पढ़े

ज्ञान की आग जलाती है बंधन

Updated on 23 December, 2014, 9:11
जिस इंसान ने अपने ज्ञान की अग्नि से कर्मों के बंधन और इच्छाओं के मोह को जला दिया है, ऐसे इंसान को ज्ञानी लोग भी पंडित कहते हैं। हमारे हर काम के पीछे कुछ न कुछ स्वार्थ और अच्छी-बुरी इच्छाएं रहती हैं। कर्म और इच्छाओं के इस ताने-बाने में ही इंसान... आगे पढ़े

आपके जीवन का केंद्र है...

Updated on 22 December, 2014, 10:25
आप सब छोड़ सकते हैं, पर अपनी पहचान को नहीं, अपनी बुद्धि को नहीं छोड़ सकते। अपने प्रेम को नहीं छोड़ सकते, अपनी अभिव्यक्ति को नहीं छोड़ सकते। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह तुम्हारी अपनी दुनिया है। इसे आपने मान लिया है, पर यह भी सत्य है कि यह आपकी बाहर... आगे पढ़े

विचित्र गुरु दक्षिणा

Updated on 22 December, 2014, 9:49
बात उन दिनों की है जब भारतीय संगीत में गुरु शिष्य परंपरा का महत्व अपने चरम पर था। हर शिष्य अपने गुरु से बढ़कर किसी को नहीं मानता था। इन्हीं दिनों ग्वालियर के प्रसिद्ध गायक हस्सू खां के यहां संगीत सीखने के लिए दक्षिण भारत से तीन हिंदू शिष्य आए।... आगे पढ़े

महात्मा बुद्ध की सीख

Updated on 21 December, 2014, 9:39
  गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ सभा में विराजमान थे। शिष्यगण उनका मौन देखकर चिंतित हुए कि कहीं वे अस्वस्थ तो नहीं हैं? तभी एक शिष्य ने पूछा- भगवन् आप आज इस प्रकार मौन क्यों हैं? क्या हमसे कोई अपराध हुआ है? इतने में एक अन्य अधीर शिष्य ने पूछा,... आगे पढ़े

प्रेम आनंद है, पर मोह उलझन

Updated on 20 December, 2014, 12:49
किसी इंसान के प्रति भावनाओं की मिठास को अक्सर प्रेम कहा जाता है, लेकिन कभी-कभी हमें यह भी लगता है कि हम व्यर्थ ही मोह में फंस गए हैं। हम यह कैसे पता लगा सकते हैं कि हमारे भीतर सच्चा प्रेम है या फिर हम मोह से घिरे हुए हैं? लोग... आगे पढ़े

सच बोलो पर मीठा भी बोलो

Updated on 20 December, 2014, 10:08
कभी-कभी व्यक्ति अपने चरित्र से, चिंतन से, स्वभाव से, व्यक्तित्व से, आचरण से, उपस्थिति से बहुत कुछ बोलता है। कहीं-कहीं ग्रंथों से संकेत दिए हैं कि व्यक्ति को बोलने की आवश्यकता नहीं है। बोलना तो व्यर्थ है। महापुरुष मौन से ही संकेत दे देते हैं। उनका तो आचरण और उपस्थिति ही... आगे पढ़े

भक्ति मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ संपदा है

Updated on 19 December, 2014, 9:53
 भक्ति तत्व भौतिक जगत से जुड़े हुए हमारे अस्तित्व-बोध को आध्यात्मिक जगत की परम अनुभूति से भली-भांति जोड़ देता है। हम सभी सामाजिक भावना से भी ओतप्रोत हैं, जिसकी सीमा भौगोलिक भावना से बड़ी है। सामाजिक भावना भौगोलिक सीमा में बंधी नहीं रहती, बल्कि किसी विशेष समुदाय से संबंधित लोगों... आगे पढ़े

भारत की संपदा आस्था

Updated on 18 December, 2014, 9:43
भारत की विशालता एवं सम्पदा उसकी अध्यात्मवादी आस्था रही है. इसी ने उसे पृथ्वी का स्वर्ग और देवताओं का निवास स्थल कहलाने का सौभाग्य प्रदान किया और संसार के सामने हर क्षेत्र में हर दृष्टि से सम्मानित अग्रणी बना रहा. जहां आन्तरिक उत्कृष्टता होगी, वहां बाह्य सामथ्र्य एवं समृद्धि की कमी... आगे पढ़े

23वें तीर्र्थंकर पाश्र्वनाथ: सह-अस्तित्व का दर्शन

Updated on 17 December, 2014, 17:23
23वें तीर्र्थंकर पाश्र्वनाथ जी ने अपने अनेकांत दर्शन में सह-अस्तित्व की अवधारणा दी, जिसमें सभी के प्रति समभाव को स्थापित किया गया है... कीड़ों के संक्रमण से अच्छी खेती खराब होने लगी, तो हमने उन्हें अपना विरोधी मान लिया। कीटनाशक दवाओं का प्रयोग होने लगा। परिणाम यह हुआ कि उन दवाओं... आगे पढ़े

जीवन और मृत्यु परमात्मा के हाथ में है

Updated on 16 December, 2014, 13:34
जीवन और मृत्यु परमात्मा के हाथ में है। जीव को न स्वयं जन्म चुनने का अधिकार है और न मृत्यु प्राप्त करने का अधिकार है। जीव केवल जी सकता है, जीवन पर उसका कोई अधिकार नहीं है और जब मृत्यु का काल आता है, तो परमात्मा उसे अपने हाथों मृत्यु... आगे पढ़े

क्या बिकता है प्रेम....

Updated on 14 December, 2014, 9:39
प्रेम में डूबे दिलों के लिए यह अहसास ईश्वर की आराधना के समान है, पर इस रूहानी अहसास को बाजार ने अपने तरीके से समझा और मान दिया। कहानी संग्रह, उपन्यास में इन दिनों प्रेम प्रसंग और संबंधों के बारे में अत्यधिक बताया जा रहा है। लेखिकाएं भी कहानी की... आगे पढ़े

मन को साधो जीत तुम्हारी ही होगी

Updated on 14 December, 2014, 9:15
मैं चाहता हूं कि मेरे सभी बच्चे, मैं जितना उन्नत बन सकता था, उससे सौगुना उन्नत बनें। तुम लोगों में से प्रत्येक को महान शक्ति शाली बनना होगा। आज्ञा-पालन, ध्येय के प्रति अनुराग तथा ध्येय को कार्यरूप में परिणत करने के लिए सदा प्रस्तुत रहना: इन तीनों के रहने पर कोई... आगे पढ़े

कल्पना कामना नहीं, खेल है

Updated on 13 December, 2014, 9:42
कल्पना कामना नहीं है, मात्र एक खेल है. कामना तो बिल्कुल अलग बात है. यदि तुम कल्पना के साथ बिना किसी कामना के खेलते हो- न कहीं पहुंचने के लिए, न कुछ पाने के लिए, बस एक खेल की तरह उसे लेते हो तो तुम्हारी कल्पना न कामना होती है,... आगे पढ़े

बुद्धि से नहीं, हृदय से देखो संसार

Updated on 13 December, 2014, 9:41
पहला सूत्र: सिर विहीन होने का प्रयास करो। स्वयं के सिर विहीन होने की कल्पना करो। सुनने में यह अजीब लगता है परंतु यह बहुत ही महत्वपूर्ण साधनाओं में से एक है। इसका प्रयोग करो, तब तुम जानोगे। प्रारंभ में तो यह बड़ा अटपटा और अजीब लगेगा लेकिन धीरे-धीरे तुम... आगे पढ़े

दूसरों का आईना

Updated on 12 December, 2014, 13:29
मैं मानसिक चिकित्सालय के उद्यान में टहल रहा था। वहां मैंने एक युवक को बैठे देखा, जो तल्लीनता से दर्शनशास्त्र की पुस्तक पढ़ रहा था। वह युवक स्वस्थ प्रतीत हो रहा था और उसका व्यवहार अन्य रोगियों से बिलकुल अलग था। वह यकीनन रोगी नहीं था। मैं उसके पास जाकर... आगे पढ़े

दुख से सुख की ओर...

Updated on 11 December, 2014, 12:26
जब हमें यह बोध हो जाता है कि अपनी स्थिति के लिए हम ही जिम्मेदार हैं, दूसरा कोई नहीं, उस क्षण हमारे अंदर क्रांति आती है। हमारा रूपांतरण हो जाता है- दुख से सुख की ओर... एक कॉलेज में प्रोफेसर था। नया-नया वहां पहुंचा। कॉलेज बहुत दूर था गांव से। सभी... आगे पढ़े

धर्म और राजनीति

Updated on 10 December, 2014, 9:47
धर्म का कार्य है लोगों को सदाचारी और प्रेममय बनाना है और राजनीति का अर्थ है लोगों का ध्यान रखना. उनके हित के लिए काम करना. जब धर्म और राजनीति साथ-साथ नहीं चलते हैं तब हमें भ्रष्ट राजनीतिज्ञ और कपटी धार्मिक नेता मिलते हैं. एक धार्मिक व्यक्ति जो सदाचारी और स्नेही... आगे पढ़े

आइए तय करें जीवन का हमारा लक्ष्य क्या है

Updated on 9 December, 2014, 11:38
हम सबकी नजर में लक्ष्य का अपना एक अलग मतलब होगा, उसके लिए हमारी अपनी एक अलग परिभाषा होगी। हो सकता है किसी के लिए एक अच्छी नौकरी तो किसी के लिए एक मकान खरीद लेना एक लक्ष्य हो। लेकिन क्या ये सब वाकई एक लक्ष्य हैं? जानते हैं सद्गुरु... आगे पढ़े

एक ईश्वर की धारणा इस तरह आई

Updated on 9 December, 2014, 9:33
जब शहर एकदूसरे से लड़े तो यह दो देवताओं के बीच लड़ाई की तरह देखी गई। जब साम्राज्य अस्तित्व में आए तो शहंशाहों ने माना कि उनके देवता ही ज्यादा बड़े देवता हैं। एक सेना अभियान पर है। वह आइएसआइएस, द इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड शम से जुड़ी है। उसने... आगे पढ़े

चलिए क्रोध के कारण को ही मिटा दिया जाए

Updated on 7 December, 2014, 9:30
रोमन सम्राट जूलियस सीजर की गिनती दुनिया के श्रेष्ठ योद्धाओं में की जाती है। वह स्वयं को वीनस देवी का वंशज मानते थे। सीजर भी अपने पूर्वजों की राह पर चलते हुए एक तानाशाह बन गया। उसने अपने जीवन में अनेक युद्ध लड़े। उसके दोस्तों की संख्या भी अच्छी-खासी थी और... आगे पढ़े

संसार का अर्थ वासना का जाल

Updated on 6 December, 2014, 9:11
संसार का अर्थ है- आकांक्षा, तृष्णा, वासना, कुछ होने की चाह. संसार का अर्थ बाहर फैले हुए चांद-तारे, वृक्ष, पहाड़-पर्वत, लोग नहीं है. संसार का अर्थ है, भीतर फैली वासनाओं का जाल. संसार का अर्थ है, मैं जैसा हूं, वैसे से ही तृप्ति नहीं; कुछ और होऊं, तब तृप्ति होगी.... आगे पढ़े

मौन वाणी का संयम है

Updated on 5 December, 2014, 9:49
मौन वाणी का संयम है। जब वाणी शब्दों के माध्यम से प्रकट होती है, तो वह गहरा प्रभाव छोड़ती है। जैसे जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है वैसे ही वाणी का अंतिम सत्य मौन है। अक्षर को ब्रह्म कहा गया है। अक्षर से शब्द बनता है और शब्द ही वाणी... आगे पढ़े

सब कुछ परम इच्छा पर निर्भर

Updated on 5 December, 2014, 9:32
सारे कार्यकलाप परमात्मा की इच्छा पर निर्भर करते हैं जो प्रत्येक हृदय में मित्र रूप में आसीन है. परमेश्वर परम कारण है. अतएव जो इन परिस्थितियों में अन्तर्यामी परमात्मा के निर्देश के अंतर्गत कृष्णभावनामय होकर कर्म करता है, वह किसी कर्म से बंधता नहीं. जो पूर्ण कृष्णभावनामय हैं, वे अन्तत: अपने... आगे पढ़े

दुनिया में होता है अपना अपना मूल्य

Updated on 4 December, 2014, 9:23
रामकृष्ण परमहंस के पास एक बार एक सेठ आया। सेठ अहंकारी और लोभी था। अपने अहंकार की पुष्टि के लिए उसने एक कीमती दुशाला रामकृष्ण को भेंट की। स्वामी जी ने उस दुशाला को स्वीकार कर लिया। कुछ दिनों बाद जब सेठ फिर आया तो देखा दुशाला तो नीचे बिछा हुआ... आगे पढ़े

गुरु का सामीप्य अनुभव करो

Updated on 3 December, 2014, 12:30
यदि तुम खुद को गुरु के निकट अनुभव नहीं कर रहे हो, तो इसका कारण तुम ही हो. तुम्हारा मन, तुम्हारा अहंकार तुम्हें दूर रख रहा है. जो कुछ भी तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण है, अंतरंग है, उसे गुरु के साथ बांट लो, बता दो. संकोच मत करो, शरमाओ नहीं, इस... आगे पढ़े

सत्ता की भूख और आधिपत्य भाव

Updated on 26 November, 2014, 7:49
लोग सत्ता के भूखे इसलिए होते हैं क्योंकि वे अपनी ओर ध्यान आकर्षित कराना चाहते हैं. जिस प्रकार धन साधन होता है, उसी प्रकार सत्ता भी साधन है. किसी परिणाम को पाने के लिए जोश होता है. जो लोग सत्ता और धन को साधन न मानकर साध्य मान लेते हैं,... आगे पढ़े

वेदों में ग्राम्य संस्कृति

Updated on 25 November, 2014, 12:51
सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद के अनुसार, चाक्षुष मनु के प्रपौत्र राजा वेन के पुत्र पृथु आदि कृषक थे, जिनके नाम पर धरती का नाम पृथ्वी पड़ा। ऋग्वेद में ही कहा गया है - वश्वि पुष्टे ग्रामे। अस्मिन अनातुरम।। अर्थात गांव विश्व की शांत और स्वावलंबी इकाई के रूप में विकसित... आगे पढ़े

भगवान का विश्वरूप

Updated on 25 November, 2014, 8:20
अर्जुन भगवान के विश्वरूप को देखना चाहता था, अत: भगवान कृष्ण ने अपने भक्त अर्जुन पर अनुकम्पा करते हुए उसे अपने तेजोमय तथा ऐश्वर्यमय विश्वरूप का दर्शन कराया. यह रूप सूर्य की भांति चमक रहा था और इसके मुख निरंतर परिवर्तित हो रहे थे. कृष्ण ने यह रूप अर्जुन की... आगे पढ़े

समता ही है योग

Updated on 23 November, 2014, 9:36
संतुलन, संगीत. दो के बीच चुनाव नहीं, दो के बीच समभाव. विरोधों के बीच चुनाव नहीं, अविरोध. दो अतियों के बीच, दो पोलेरिटीज के बीच, दो ध्रुवों के बीच पसंद-नापसंद नहीं, राग-द्वेष नहीं, साक्षी भाव. समता का अर्थ ठीक से समझ लेना जरूरी है, क्योंकि कृष्ण कहते हैं, वही योग... आगे पढ़े

ईश्वर एक है

Updated on 22 November, 2014, 9:36
जिस प्रकार पानी को कोई जल, कोई पानी, कोई वाटर कहता है, इसी तरह ईश्वर को कोई हरि, कोई अल्लाह, तो कोई गॉड कहता है। जैसे मिठाई अलग-अलग आकार की होती है, उसी तरह ईश्वर भी देश-काल के अनुसार अलग रूपों में होते हैं।   एक बड़े से तालाब में बहुत से... आगे पढ़े

कड़वे अनुभवों की पाठशाला

Updated on 18 November, 2014, 12:47
दैनिक जीवन में हमें कई कड़वे अनुभवों से दो-चार होना पड़ता है। कड़वे अनुभव पाठशाला की तरह होते हैं, जो हमें अलग-अलग तरह की सीख देते हैं और जीवन पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं... धीमी गति से बहती क्षीण धारा। यह गोमुख से निकली गंगा है, जिसे... आगे पढ़े

विश्व प्रेम की भावना से करें कर्म

Updated on 16 November, 2014, 20:59
स्वामी दयानंद ने फर्रुखाबाद में गंगा के किनारे एक झोपड़ी में अपना डेरा डाला था। कैलाश नाम का एक युवक की उन पर बड़ी ही श्रद्धा थी। एक दिन वह उनके पास आया और उसने अंदर आने की अनुमति मांगी। दयानंद हंसते हुए बोले, 'यदि कैलाश इस छोटे से झोपड़े में... आगे पढ़े