Tuesday, 21 August 2018, 3:07 PM

प्रेरक बातें

दुनिया में होता है अपना अपना मूल्य

Updated on 4 December, 2014, 9:23
रामकृष्ण परमहंस के पास एक बार एक सेठ आया। सेठ अहंकारी और लोभी था। अपने अहंकार की पुष्टि के लिए उसने एक कीमती दुशाला रामकृष्ण को भेंट की। स्वामी जी ने उस दुशाला को स्वीकार कर लिया। कुछ दिनों बाद जब सेठ फिर आया तो देखा दुशाला तो नीचे बिछा हुआ... आगे पढ़े

गुरु का सामीप्य अनुभव करो

Updated on 3 December, 2014, 12:30
यदि तुम खुद को गुरु के निकट अनुभव नहीं कर रहे हो, तो इसका कारण तुम ही हो. तुम्हारा मन, तुम्हारा अहंकार तुम्हें दूर रख रहा है. जो कुछ भी तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण है, अंतरंग है, उसे गुरु के साथ बांट लो, बता दो. संकोच मत करो, शरमाओ नहीं, इस... आगे पढ़े

सत्ता की भूख और आधिपत्य भाव

Updated on 26 November, 2014, 7:49
लोग सत्ता के भूखे इसलिए होते हैं क्योंकि वे अपनी ओर ध्यान आकर्षित कराना चाहते हैं. जिस प्रकार धन साधन होता है, उसी प्रकार सत्ता भी साधन है. किसी परिणाम को पाने के लिए जोश होता है. जो लोग सत्ता और धन को साधन न मानकर साध्य मान लेते हैं,... आगे पढ़े

वेदों में ग्राम्य संस्कृति

Updated on 25 November, 2014, 12:51
सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद के अनुसार, चाक्षुष मनु के प्रपौत्र राजा वेन के पुत्र पृथु आदि कृषक थे, जिनके नाम पर धरती का नाम पृथ्वी पड़ा। ऋग्वेद में ही कहा गया है - वश्वि पुष्टे ग्रामे। अस्मिन अनातुरम।। अर्थात गांव विश्व की शांत और स्वावलंबी इकाई के रूप में विकसित... आगे पढ़े

भगवान का विश्वरूप

Updated on 25 November, 2014, 8:20
अर्जुन भगवान के विश्वरूप को देखना चाहता था, अत: भगवान कृष्ण ने अपने भक्त अर्जुन पर अनुकम्पा करते हुए उसे अपने तेजोमय तथा ऐश्वर्यमय विश्वरूप का दर्शन कराया. यह रूप सूर्य की भांति चमक रहा था और इसके मुख निरंतर परिवर्तित हो रहे थे. कृष्ण ने यह रूप अर्जुन की... आगे पढ़े

समता ही है योग

Updated on 23 November, 2014, 9:36
संतुलन, संगीत. दो के बीच चुनाव नहीं, दो के बीच समभाव. विरोधों के बीच चुनाव नहीं, अविरोध. दो अतियों के बीच, दो पोलेरिटीज के बीच, दो ध्रुवों के बीच पसंद-नापसंद नहीं, राग-द्वेष नहीं, साक्षी भाव. समता का अर्थ ठीक से समझ लेना जरूरी है, क्योंकि कृष्ण कहते हैं, वही योग... आगे पढ़े

ईश्वर एक है

Updated on 22 November, 2014, 9:36
जिस प्रकार पानी को कोई जल, कोई पानी, कोई वाटर कहता है, इसी तरह ईश्वर को कोई हरि, कोई अल्लाह, तो कोई गॉड कहता है। जैसे मिठाई अलग-अलग आकार की होती है, उसी तरह ईश्वर भी देश-काल के अनुसार अलग रूपों में होते हैं।   एक बड़े से तालाब में बहुत से... आगे पढ़े

कड़वे अनुभवों की पाठशाला

Updated on 18 November, 2014, 12:47
दैनिक जीवन में हमें कई कड़वे अनुभवों से दो-चार होना पड़ता है। कड़वे अनुभव पाठशाला की तरह होते हैं, जो हमें अलग-अलग तरह की सीख देते हैं और जीवन पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं... धीमी गति से बहती क्षीण धारा। यह गोमुख से निकली गंगा है, जिसे... आगे पढ़े

विश्व प्रेम की भावना से करें कर्म

Updated on 16 November, 2014, 20:59
स्वामी दयानंद ने फर्रुखाबाद में गंगा के किनारे एक झोपड़ी में अपना डेरा डाला था। कैलाश नाम का एक युवक की उन पर बड़ी ही श्रद्धा थी। एक दिन वह उनके पास आया और उसने अंदर आने की अनुमति मांगी। दयानंद हंसते हुए बोले, 'यदि कैलाश इस छोटे से झोपड़े में... आगे पढ़े

समर्पण का अर्थ

Updated on 16 November, 2014, 9:15
समर्पण कोई कृत्य नहीं है, जो तुम कर सको. समर्पण तो ऐसी चित्त की दशा है जहां तुम पाते हो कि अब मुझसे तो कुछ भी नहीं होता. जरा भी आशा बनी रही कि मुझसे कुछ हो सकता है तो समर्पण न होगा; तो तुम्हारा अहंकार बचा है. जिस दिन तुम्हारा... आगे पढ़े

निर्गुण हैं भगवान

Updated on 14 November, 2014, 8:57
संसार के सारे भौतिक कार्यकलाप प्रकृति के गुणों के अधीन संपन्न होते हैं. यद्यपि प्रकृति के गुण परमेश्वर कृष्ण से उद्भूत हैं, किंतु भगवान उनके अधीन नहीं होते. उदाहरणार्थ, राज्य के नियमानुसार कोई दंडित हो सकता है, किंतु नियम बनाने वाला राजा उस नियम के अधीन नहीं होता. इसी तरह... आगे पढ़े

ज्ञान का घड़ा

Updated on 13 November, 2014, 12:47
यह अफ्रीकी लोककथा है। एक व्यक्ति उस इलाके का सबसे ज्ञानी मनुष्य था। सारा ज्ञान सिर्फ उसके ही पास था। सभी लोग उससे सलाह लेने आते थे। उसका मानना था कि उसके ज्ञान देने से ही वहां के लोग समझदार हो पा रहे हैं। इसी अहंकार में उसने सोचा कि... आगे पढ़े

नकारात्मक भाव ही है दुख

Updated on 13 November, 2014, 9:07
चारों ओर प्रकाश व्याप्त होने पर भी व्यक्ति अंधकार का रोना रो सकता है और अंधेरा-अंधेरा चीखता-चिल्लाता रह सकता है. इसके मात्र दो ही कारण हो सकते हैं. एक तो यह कि व्यक्ति किसी तंग कोठरी में चारों ओर से बंद दरवाजों और खिड़कियों के भीतर बंद हो. उस स्थिति में... आगे पढ़े

दर्द एक अनुभूति है

Updated on 12 November, 2014, 9:41
चलते-चलते रुक जाने का कोई कारण तो होता है। फिर रुककर बैठा हुआ आदमी पुन: क्यों चल पड़ता है? तब ऐसा नहीं लगता कि इसमें कोई स्वाभाविकता है। किसी न किसी चीज का अहसास है। वह अहसास मन को होता है या तन को, प्रवाह तो कभी अहसास से नहीं... आगे पढ़े

भक्तियोग का महात्म्य

Updated on 11 November, 2014, 9:14
सुख-दुख भौतिक जीवन को दूषित करने वाले हैं. कोई कभी भी सुख-दुख के आने-जाने पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता. अत: मनुष्य को चाहिए कि भौतिकवादी जीवन शैली से अपने को अलग कर लें और दोनों ही दशाओं में समभाव बनाये रखें. सामन्यत: जब हमें इच्छित वस्तु मिल जाती है तो... आगे पढ़े

सत्य का वास्तविक अर्थ

Updated on 10 November, 2014, 8:11
सत्य का अर्थ समझ लेना अत्यंत अनिवार्य है. साधारणत: हम सोचते हैं, सत्य कोई वस्तु है, जिसे खोजना है; जैसे सत्य कहीं रखा है- किसी दूर के मंदिर में सुरक्षित है प्रतिमा की भांति. हमें यात्रा करनी है, मंदिर के द्वार खोलने हैं और सत्य को उपलब्ध कर लेना है. ऐसा... आगे पढ़े

पर्यावरण को बचाने का संकल्प लें

Updated on 5 November, 2014, 13:20
कार्तिक पूर्णिमा पर नदियों के घाटों की शोभा अद्वितीय होती है। मान्यता है कि इस दिन देवता दीपावली मनाते हैं। हमारे लिए देव दीपावली का यह पर्व नदियों व पर्यावरण को शुद्ध रखने का संकल्प लेने का अवसर देता है... कार्तिक पूर्णिमा की रात नदियों, खासकर गंगा में लाखों की संख्या... आगे पढ़े

ज्ञान इतना आसान नहीं कि दूसरे के अनुभव से काम चला लिया जाए

Updated on 4 November, 2014, 17:48
गर शास्त्र संसार को विष जैसा कहते हैं, तो चलो मान लेते हैं। लेकिन शास्त्र सही कहते हैं या गलत, यह कैसे जानेंगे? शास्त्र में लिखा है, सिर्फ इतने से वह सही थोड़े ही हो जाएगा। लिखे शब्दों के दीवाने मत बनो। एक सज्जन एक बार मेरे पास आए। वह... आगे पढ़े

मन की यात्रा अधूरी ही होती है

Updated on 4 November, 2014, 12:13
मन की यात्रा अधूरी ही होती है। वैसे तो आदमी जीता पूरा है और पूरी तरह से जीने का प्रयास करता है, पर वह जी नहीं पाता। ऐसा इसलिए, क्योंकि वह जीने के लिए प्रयास करता है। उन प्रयासों में वह कुछ संभावनाओं में डूबकर जीता है। कुछ कल्पनाओं में... आगे पढ़े

एकांत ध्यान की भूमिका

Updated on 1 November, 2014, 10:17
तुम किसी शांत दशा में घर में बैठे हो और अचानक पाते हो कि घर तुम्हारे भीतर नहीं है. तो तुम्हें विहार का स्वाद मिलेगा. पत्नी के पास बैठे हो और चौंककर देखा कि कौन पत्नी, कौन पति! कौन मेरा, कौन तेरा! क्षण भर को एक अजनबी राह पर मिलन हो... आगे पढ़े

जिएं वर्तमान को

Updated on 31 October, 2014, 11:34
एक तालाब में दो बत्तखें तैर रही थीं। न जाने क्या हुआ, दोनों आपस में लड़ने लगीं। यह लड़ाई ज्यादा देर तक नहीं चल पाई। वे अलग हुईं और विपरीत दिशा में तैरने लगीं। फिर दोनों ने अपने-अपने पंख तेजी से झाड़े। इस प्रकार लड़ाई के दौरान बनी ज्यादा ऊर्जा... आगे पढ़े

चुभन और ग्लानि में फर्क

Updated on 29 October, 2014, 12:19
एक भक्त ने कहा, गुरुजी मुझे माफ कर दीजिए यदि मैंने कोई गलती की है. तुम्हें क्यों माफ किया जाए? तुम माफी इसलिए मांग रहे हो क्योंकि तुम्हें चुभन महसूस हो रही है और तुम इससे मुक्त होना चाहते हो. लेकिन चुभन को वहीं रहने दो. चुभन तुम्हें दोबारा गलती नहीं... आगे पढ़े

मनुष्य आदतन आसक्ति व विरक्ति के मध्य झूलता है

Updated on 28 October, 2014, 13:27
राग और द्वेष से असंपृक्त हो जाना अनासक्ति है। मनुष्य आदतन आसक्ति और विरक्ति के मध्य झूलता है। या तो वह किसी चीज की ओर आकर्षित होता है या विकर्षित, परंतु वह यह नहीं जानता कि इन दोनों से बड़ी बात है कि कर्तव्य कर्म करते समय निष्पृह भाव में... आगे पढ़े

क्या दीए की रोशनी से मिट पाएगा यह अंधेरा?

Updated on 26 October, 2014, 21:14
यह अंधेरा कब तक रहेगा? जब तक तुमने स्वयं को शरीर माना है, यह अंधेरा रहेगा। जब तक दीया है, तक तक अंधेरा रहेगा। ज्योति अकेली हो, फिर उसके नीचे कोई अंधेरा नहीं रहेगा। ज्योति सहारे से है। थोड़ी देर को सोचो, ज्योति, ज्योति मुक्त हो गई अकेली आकाश में,... आगे पढ़े

आइए जानें हमारे ऋषियों के बारे में

Updated on 26 October, 2014, 9:35
अंगिरा: ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र थे। उनके पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी। विश्वामित्र : गायत्री मंत्र का ज्ञान देने वाले विश्वामित्र वेदमंत्रों के सर्वप्रथम द्रष्टा माने जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत इनके पुत्र थे। विश्वामित्र की... आगे पढ़े

हृदय की भाषा है कविता

Updated on 25 October, 2014, 9:23
तर्क या विचारशक्ति मनुष्य की एक बहुत छोटी सी दृश्य सत्ता है. तर्क या विचारशक्ति को छोड़ना ही है, उसे मिटा ही देना है और केवल मन के पार जाने से ही कोई भी उसे समझना प्रारम्भ करता है. धर्म के सिवाय कोई भी तत्वज्ञान यह मौलिक परिवर्तन नहीं ला... आगे पढ़े

विवेक को महत्व देने का पर्व

Updated on 23 October, 2014, 8:19
जो धन संपत्ति हमारे पास है या अपने पुरुषार्थ द्वारा हम कमाते हैं, उसका क्या उचित उपयोग होना चाहिए? पिछले वर्ष में जो आर्थिक कठिनाईयां हुई, उनके क्या कारण थे और उनको दूर करने के लिए आगामी वर्ष में क्या-क्या प्रयत्न करने चाहिए? इन बातों पर विचार करने के लिए... आगे पढ़े

हर दिल में जलाएं प्रेम का दीया

Updated on 22 October, 2014, 8:58
एक दीपक की बाती को जलने के लिए तेल में डूबे होना चाहिए साथ ही तेल के बाहर भी रहना चाहिए. यदि बाती तेल में पूरी डूब जाये तो प्रकाश नहीं दे सकती. जीवन भी दीपक की बाती के समान है. तुम्हें संसार में रहते हुए भी उसके ऊपर निष्प्रभावित... आगे पढ़े

कर्म ही जीवन है, अकर्मण्यता मृत्यु है

Updated on 21 October, 2014, 16:57
मनुष्य जीने के लिए प्रतिबद्ध है, आतुर है। यद्यपि जो पैदा हुआ है, वह मृत्यु को अवश्य प्राप्त होगा, परंतु कोई मरना नहीं चाहता। जीने के लिए मनुष्य क्या नहीं करता है और क्या नहीं सहता है। ऐसे संघर्ष करते हुए ही वह जीवन में प्रेम और श्रेय का हकदार... आगे पढ़े

प्रकाश अभय है

Updated on 19 October, 2014, 13:13
प्रकाश में भय नहीं, अभय है. अनंत-अनंत काल बीत जाने पर कोई सुरु होता है. सिद्ध तो बहुत होते हैं, सद्गुरु बहुत थोड़े. सिद्ध वह जिसने सत्य को जाना; सद्गुरु वह जिसने जाना ही नहीं, जनाया भी. सिद्ध वह जो स्वयं तो पा गया लेकिन बांट न सका; सद्गुरु वह,... आगे पढ़े

शास्त्रों से परे धर्म

Updated on 18 October, 2014, 17:23
धर्म के नाम पर झगड़े इसलिए होते हैं, क्योंकि झगड़ने वाले धर्म को जानते ही नहींऔर वे धार्मिक ग्रंथों की बातों में उलझे रहते हैं। धर्म को समझने के लिए ग्रंथों की नहीं, बल्कि स्वयं अनुभव करने की आवश्यकता है। एक बार भारत में विभिन्न संप्रदायों के प्रतिनिधि एकत्र हुए और... आगे पढ़े

देहात्म बुद्धि का मिथ्या अहंकार

Updated on 17 October, 2014, 12:48
पूर्ण कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने अस्तित्व के लिए कर्त्तव्य करने के विषय में आवश्यकता से अधिक उद्विग्न नहीं रहता. जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, भगवान कृष्ण उसके घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं. वे सदैव अपने मित्र की सुविधा का ध्यान रखते हैं और जो मित्र चौबीसों घंटे उन्हें प्रसन्न करने... आगे पढ़े

बुढ़ापे से निजात कैसे!

Updated on 16 October, 2014, 16:38
बुढ़ापा क्यों और कैसे आता है? इससे निजात कैसे पायी जाए? इस विषय पर देश विदेश में गहन अनुसंधान कार्य चल रहे हैं. अधिकांश मामलों में देखा जाता है कि व्यक्ति की वायोलजिकल एज (कायिक आयु) उसकी क्रोनोलॉजिकल एज (मियादी आयु) से बढ़ी-चढ़ी होती है. आखिर बुढ़ापा असमय क्यों आ धमकता... आगे पढ़े

भावों की श्रेष्ठता

Updated on 12 October, 2014, 16:17
यह वाह्य दृश्यमय जगत की रचना ईश्वर द्वारा की गई है। इस पृथ्वी पर मनुष्य समेत अनेक जीव-जंतु अपना जीवनयापन करते हैं। अन्यान्य जीवों में मनुष्य विवेकयुक्त होने के कारण सबसे श्रेष्ठ प्राणी है। उसे ईश्वर ने बुद्धि के द्वारा विचार करने की शक्ति प्रदान की है। विचारों को पवित्रकर... आगे पढ़े

दीपक तले अंधेरा क्यों!

Updated on 12 October, 2014, 11:54
आत्मा शात तत्व है, शरीर शात नहीं है. इसलिए तुम शरीर को पकड़ते हो, देखते हो, संभालते हो, खोजते हो. शरीर के सुखों की चिंता करते हो. इसलिए दीया तले अंधेरा इकट्ठा हो जाता है. तुम चाहे स्वीकार करो या न करो. तुम्हारे चित्त में यह तीर चुभा ही है... आगे पढ़े

प्रतिबद्धता और सुविधा

Updated on 8 October, 2014, 12:57
प्रतिबद्धता का अनुभव अपनी सुविधा के दायरे को लांघने पर ही हो सकता है. वह जो हमारी सुविधा के दायरे में होता है वह प्रतिबद्धता नहीं है. यदि तुम अपनी सुविधा पर ही ध्यान दोगे तब तुम प्रतिबद्ध नहीं रह सकते. इससे और अधिक असुविधा उत्पन्न हो जाती है. यदि तुम... आगे पढ़े

महानता की परिभाषा

Updated on 7 October, 2014, 8:35
चीन के महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस से कई लोग मिलने आते और उनसे प्रश्न पूछकर अपनी जिज्ञासा शांत करते। एक बार एक राजा ने उनसे कई प्रश्न पूछे। इसमें एक सवाल था, 'क्या ऐसा कोई व्यक्ति है जो महान हो लेकिन उसे कोई जानता न हो?' कन्फ्यूशियस मुस्करा कर बोले, 'हम... आगे पढ़े

दिव्य दृष्टि

Updated on 5 October, 2014, 17:00
ज्ञान दृष्टि से मनुष्य ज्ञान जगत से संबंधित समस्त बातों को साक्षात भाव में अनुभव कर सकता है। उसी तरह अज्ञान दृष्टि से अज्ञान के जगत और जगत के सभी पदार्थो को भिन्न-भिन्न रूप में अनुभव कर लेता है। जिन दो आंखों से हम परिचित हैं, जिन दो आंखों से... आगे पढ़े

ध्यान का दीया जला लो

Updated on 5 October, 2014, 10:09
बुद्ध कहते हैं, जीवन का इतना ही उपयोग हो सकता है कि जीते जी तुम ध्यान का दीया जला लो. ‘अंधकर में डूबे हो और दीपक की खोज नहीं करते!’ किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो, मौत के अतिरिक्त कोई भी नहीं आएगा. किन सपनों में खोए हो! जीवन को हमने देखा... आगे पढ़े

साधना का अन्यतम अंग है तप

Updated on 4 October, 2014, 12:31
मनुष्य में जो कुछ भी शक्ति है वह उसकी अपनी नहीं है। यह बात याद रखनी चाहिए कि मेरा कुछ भी नहीं है। जब मनुष्य के मन में यह भावना उठती है कि मेरी शक्ति से नहीं, उन्हीं की शक्ति से सब कुछ हो रहा है, तब उनमें अनंत शक्ति... आगे पढ़े

सात्विक प्रकृति: बढ़ाए स्थिरता और शुद्धता

Updated on 4 October, 2014, 11:41
हमारे जीवन के चार मुख्य भाग हैं – शरीर, मन, भावनाओं और उर्जा। लेकिन जीवन का स्त्रोत जो कि इन चारों से परे है, वह भी हममें मौजूद है। सात्विक बननें का मतलब है इन चारों को शुद्ध करना, ताकि हम जीवन के स्त्रोत को भी महसूस कर पाएं। आज... आगे पढ़े

कृष्ण की शरण में

Updated on 3 October, 2014, 12:50
भगवान ने अनेक प्रकार के ज्ञान तथा धर्म की विधियां बताई हैं-परब्रह्म का ज्ञान, परमात्मा का ज्ञान, अनेक प्रकार के आश्रमों तथा वर्णों का ज्ञान, संन्यास का ज्ञान, अनासक्ति, इंद्रिय तथा मन का संयम, ध्यान आदि का ज्ञान. उन्होंने अनेक प्रकार से नाना प्रकार के धर्मो का वर्णन किया है. अब,... आगे पढ़े

आत्मज्ञान से आत्मविस्तार

Updated on 2 October, 2014, 12:53
अध्यात्म शास्त्र में आत्मज्ञान की महत्ता, प्रतिक्रिया एवं सिद्धि परिणति का इतना अधिक प्रतिपादन हुआ है कि उससे बढ़कर इस संसार में और कोई बड़ी उपलब्धि मानी ही नहीं गई. अन्त:ज्ञान की उपयोगिता बाह्य ज्ञान की तुलना में कहीं अधिक है. सुख-साधनों की अभिवृद्धि की तरह उपभोगकर्ता की विवेक दृष्टि... आगे पढ़े

भूखों की सेवा

Updated on 1 October, 2014, 20:40
घटना उस समय की है जब बाजीराव पेशवा की सेना ने निजाम की फौज को चारों ओर से घेर लिया था। इससे उनके रसद और हथियार मिलने के जो रास्ते थे, वे सब बंद हो गए थे और सेना में भोजन की कमी हो गई थी। संयोगवश उसी समय निजाम के... आगे पढ़े

समझ से नहीं भरता जीवन

Updated on 28 September, 2014, 12:48
आदमी ने एक बड़ी बुनियादी भूल सीख ली है-वह है, जीवन को समझ द्वारा भरने की. जीवन कभी समझ से नहीं भरता; धोखा पैदा होता है. प्रेम करो तो प्रेम जानोगे. प्रार्थना करो तो प्रार्थना जानोगे. अहंकार की सीढ़ियां थोड़ा उतरो तो निरहंकार को जानोगे. डूबो, मिटो, तो परमात्मा का... आगे पढ़े

गुरु को परमात्मा से भी श्रेष्ठ माना गया है

Updated on 25 September, 2014, 22:34
संसार के लगभग सभी धर्मो ने गुरु के महत्व को स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हुए उन्हें परम आदरणीय कहा है। यह आदर परंपरा भारतीय संस्कृति में भी दिखाई देती है। भारतीयों ने तो गुरु को परमात्मा से भी श्रेष्ठ माना है। गुरु और भगवान अगर एक साथ सामने आ... आगे पढ़े

कल्पना और संकल्पना

Updated on 24 September, 2014, 12:48
प्राय: जीवन में कुछ विशेष कार्य करने से पहले व्यक्ति तरह-तरह के संकल्प करता है। संकल्प सकारात्मक और कल्याणकारी कार्यो को करने से पूर्व की इच्छाशक्ति पर केंद्रित होने की प्रक्रिया है। नकारात्मक व मानव-विरोधी काम करने से पहले किए जाने वाले समस्त मानसिक और भाविक यत्‍‌न संकल्प नहीं हो सकते।... आगे पढ़े

कर्म में परिणाम की चिंता क्यों ?

Updated on 23 September, 2014, 8:40
कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है। व्याख्या : यदि प्रकृति सभी से कर्म करवाती है, तो कुछ लोग अकर्मण्य क्यों है? यह प्रश्न उठ... आगे पढ़े

केवल औचित्य का मार्ग अपनाएं

Updated on 18 September, 2014, 21:59
महत्ता इस बात की नहीं कि सफलता कितनी बड़ी पाई गई. गरिमा इस बात की है कि उसे किस प्रकार पाया गया. अनीति का मार्ग अपनाकर कोई सफलता अधिक बड़ी मात्रा में और अधिक जल्दी पाई जा सकती है, जबकि नीति का मार्ग अपनाकर चलने से देर भी लगेगी और... आगे पढ़े

सखा है विश्वसनीय इंद्रिय

Updated on 17 September, 2014, 11:25
तीन विषय हैं : आत्मा, इन्द्रियां एवं वस्तु (संसार) और तीन शब्द है : सुख, दु:ख और सखा. इन तीनों ही शब्दों में एक समानता है- ‘ख’, जिसका अर्थ है इन्द्रियां. आत्मा इन्द्रियों के द्वारा संसार का अनुभव करती है. जब इन्द्रियां आत्मा के साथ रहती हैं तब सुख होता है... आगे पढ़े