Saturday, 16 December 2017, 9:08 AM

कविता

वक्त बहुत गुजारा मैनें...

Updated on 20 April, 2017, 23:45
वक्त बहुत गुजारा मैनें, खो दिया वो समय कुछ ही क्षण मे| वक्त का कैहर देखो  मुझपर क्षण क्षण भारी सा है शहर में | खुली किताब न ज़िंदगी की पृष्ठ रंग देखा हर क्षण, वक्त भी सलाह करता नही किसी से बदल गया एक क्षण में | मुठ्ठी मे बंदकर समय रखा था,... आगे पढ़े

ये सितारों से भरा आसमा इतना खमोश क्यों है,

Updated on 27 August, 2016, 20:37
ये सितारों से भरा आसमा इतना खमोश क्यों है, ये चाँद सा चेहरा इतना खमोश क्यों है । तेरी चँचलता दिखती है मुझे तेरी आँखों मे, तेरी नादानियाँ दिखती है मुझे तेरी बातों में। तू हँसती है खिलखिला कर, लेकिन तेरा मन इतना खमोश क्यों है। क्या हुनर है तुझमें खुद का गम छुपाकर औरों... आगे पढ़े

"हाॅर्न धीरे बजाओ मेरा 'देश' सो रहा है"...!!!

Updated on 9 August, 2016, 10:29
एक ट्रक के पीछे लिखी ये पंक्ति झकझोर गई...!! "हाॅर्न धीरे बजाओ मेरा 'देश' सो रहा है"...!!! उस पर एक कविता इस प्रकार है कि..... 'अँग्रेजों' के जुल्म सितम से...   फूट फूटकर 'रोया' है...!! 'धीरे' हाॅर्न बजा रे पगले....     'देश' हमारा सोया है...!! आजादी संग 'चैन' मिला है... 'पूरी' नींद से सोने दे...!! जगह मिले वहाँ 'साइड' ले ले... हो 'दुर्घटना'... आगे पढ़े

शिकायत करूँ तुझसे या तेरा शुक्रिया करूँ

Updated on 8 July, 2016, 18:51
शिकायत करूँ तुझसे या तेरा शुक्रिया करूँ। कभी आसमां दिखा देता है,और कभी जमी पर गिरा देता है। अकसर ये तेरी इनायत का तुफान मुझे,किनारे से मजधार पर ला देता है। कभी छमछम करती बारिश तन को भिगा जाती है, तो कभी चिलचिलाती धूप से मन को जला देता है। अकसर ये तेरी इनायत का... आगे पढ़े

खिलौनों से खेलने वाली जब दुल्हन बन जाती है

Updated on 3 May, 2016, 10:50
  खिलखिला के हंसने वाली घूँघट में शरमाती है जिसके बिंदिया की चमक में चाँद तारे दिखाई देते थे जिसकी पायल की छनक में सात सुर सुनाई देते थे आज वह इस घर से दुल्हन बन के जाएगी उसी याद में माँ ममता के अश्क बहाएगी सखियाँ उसे सजाकर रातों के किस्से... आगे पढ़े

माँ

Updated on 1 May, 2016, 20:46
अंजान थी इस दुनिया से मैं, इस ज़मी पर लाया मुझे माँ ने कितनी खूबसूरत है ये दुनिया, इससे अवगत कराया मुझे माँ ने आई जब यह मैं सब, देखकर घबरा गई, रोने लगी मैं जोर से] माँ होश में तब आ गई लगाकर मुझे गले से, अपने होने का अहसास कराया धड़कन सुनकर माँ... आगे पढ़े

तब क्या किसी साहित्यकार ने.... पुरस्कार लौटाया था .....

Updated on 6 November, 2015, 15:10
तब क्या किसी साहित्यकार ने ,, पुरस्कार लौटाया था ..... जब गिरिराज हिमालय दुःख से,, जोर जोर से रोया था ... जब भारत का भाग्य यूँ ही,, 70 वर्षों तक सोया था जब सलेम ने गुलशन कुमार को,, मंदिर में मरवाया था ... तब क्या किसी साहित्यकार ने ,, पुरस्कार लौटाया था ..... जब नक्सलियों के हमले में ,, बच्चे तक... आगे पढ़े

हर-हर मोदी, हर-हर मोदी

Updated on 11 October, 2015, 19:39
हर-हर मोदी, हर-हर मोदी कष्ट हमारे हर-हर मोदी अच्छे दिन तो अस्त हो गए काली रात है सर पर मोदी बस विदेश में घूम-घूमकर उड़ा पतंगें फर-फर मोदी महंगाई का रुदन मचा है देख ज़रा तू घर-घर मोदी पहले के ही घाव हरे हैं और नमक ना धर-धर मोदी क्या क्या बाक़ी रहा भुगतना जन की हालत... आगे पढ़े

काशी के चंदन में है मदीने की वो खुशबू।

Updated on 6 October, 2015, 14:13
काशी के चंदन में है मदीने की वो खुशबू। दुनिया की हर रौनक को मैं नाम तुम्हारे कर दूं। वो मुट्ठी भर उम्मीदें वो गहरे गम के साए। वो छितरी धूप सुनहरी और लंबी-लंबी राहें। लब पर नाम हो रब का जब सफर खत्म हो जाए। तेरी मिट्टी पाक मदीने तेरा कण-कण पावन काशी। जन्नत को मैं क्या चाहूं बस नाम तुम्हारा कह... आगे पढ़े

कैसे इंसान हैं हम

Updated on 20 July, 2014, 22:26
मैं गजल हूं मैं कोई आज का अखबार नहीं। इस सियासत से मेरा कोई सरोकार नहीं।। सब यहाँ आगे निकल जाने पे आमादा हैं। साथ चलने के लिए कोई भी तैयार नहीं।। टुकड़ों-टुकड़ों में बटी है ये हमारी धरती। आसमानों पे मगर एक भी दीवार नहीं।। कैसे इंसान हैं हम साथ रहा करते हैं। प्यार करते हैं... आगे पढ़े

प्यार वही है

Updated on 14 July, 2014, 16:16
तुम मिलोगी कभी, यह उम्मीद नहीं है इस पड़ाव पर भी मेरी बेचैनी वही है। जहां बैठकर सपनों में खो जाते थे हम-तुम पार्क की वह बैंच आज भी वहीं है। तुम्हें भुलाने के लाख जतन किए मैंने फिर भी मई की वह दोपहर आज भी वहीं है। मैं जाता हूं वहां, बैंच को छूता हूं दूर... आगे पढ़े

वह कहीं गायब है...

Updated on 4 June, 2014, 17:33
वह कहीं गायब है... वह कोने में खड़ा महत्वपूर्ण था। उसकी जम्हाई में मेरी बात अपना अर्थ खो देती थी। वह जब अंधेरे कोने में गायब हो जाता तो मैं अपना लिखा फाड़ देता। वह कहीं गायब है.... ’वह फिर दिखेगा’... कब? मैं घर के कोनों में जाकर फुसफुसाता हूँ। ’सुनों... अपने घर में कुछ फूल आए... आगे पढ़े

जिंदगी...

Updated on 10 May, 2014, 19:17
रोज सैकड़ों चेहरे देखने को मिले, न जाने कितने फिर कभी नहीं मिले। हमने भुला दिए सारे शिकवे-गिले, क्या पता कोई आखिरी बार मिले। हम तो अपना दर्द दिल में समेटे चले, रोएंगे तब जब हिसाब का कांधा मिले। जिंदगी गुजर गई खुदा से नहीं मिले, मौत के बाद क्या पता मिले न मिले।                         -मिलिंद बायवार   ... आगे पढ़े

मेरी माँ के जैसी ही ये धरा है।

Updated on 7 May, 2014, 11:37
मेरी माँ के जैसी ही ये धरा है। इसका दिल भी करुणा से भरा है।। हे धरा, तुझमें माँ की तस्वीर नजर आती है, हे धरा, तुझमें हर जीव की तकदीर नजर आती है, हे धरा, तुम हम सबका पालन-पोषण करती हो, हे धरा, तुम में हर रिश्तों की जंजीर नजर आती है, हे धरा, तेरा... आगे पढ़े

अन्नदाता किसान

Updated on 17 April, 2014, 18:50
अन्नदाता किसान   हे अन्नाजी अन्नदाता किसान, अन्न बहुत उपजाता है। कृषि प्रधान है देश हमारा, कृषक यही लूटा जाता है।। तन-मन-धन सब कुछ अर्पण कर, जोखिम लेकर अन्न कमाता। खाद-बीज बिजली पानी का, महंगा बिल जब भर जाता।। लाभ-हानि लेखा-जोखा में, उसके हक में क्या आता। देनदार शावक का बनकर, कर्जदार जब बन जाता।। कर्ज के बदले किसान की, भू-बंधक खाता चढ़ जाता। अन्न दायिनी... आगे पढ़े

सहज मिले अविनासी / कबीर

Updated on 2 April, 2014, 20:12
पानी बिच मीन पियासी। मोहि सुनि सुनि आवत हाँसी ।। आतम ग्यान बिना सब सूना, क्या मथुरा क्या कासी । घर में वसत धरीं नहिं सूझै, बाहर खोजन जासी ।। मृग की नाभि माँहि कस्तूरी, बन-बन फिरत उदासी । कहत कबीर, सुनौ भाई साधो, सहज मिले अविनासी ।। ... आगे पढ़े

साधो, देखो जग बौराना / कबीर

Updated on 2 April, 2014, 20:12
साधो, देखो जग बौराना । साँची कही तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना । हिन्दू कहत,राम हमारा, मुसलमान रहमाना । आपस में दौऊ लड़ै मरत हैं, मरम कोई नहिं जाना । बहुत मिले मोहि नेमी, धर्मी, प्रात करे असनाना । आतम-छाँड़ि पषानै पूजै, तिनका थोथा ज्ञाना । आसन मारि डिंभ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना... आगे पढ़े

सोच सकता हूँ

Updated on 5 March, 2014, 17:56
मैं सुनाता आ रहा हूँ गीत कविता सुन जिसे क्यों सो गया है कुल जहाँ संकुल यहाँ क्यों आँख खोले सो गया है सत्य आशय झूठ संशय एक आशा एक भाषा सोच सकता हूँ मैं इतना तन बदन अब रो गया है ... आगे पढ़े

तमाशबीन

Updated on 5 March, 2014, 17:55
हताश से दीख रहे हैं ये हरे पेड़ बनती देख बिल्डिंगें अपने आस पास उन्हें पता है उनके इतने फलदार होते हुए भी उनके प्रति कोई नहीं व्यक्त करेगा अपनी सहानुभूति उनके पालनहार ही बनेंगे उनके भक्षक उन्हें देख निहत्था व लाचार उनकी भावभीनी विदाई की करेंगे तैयारी तोड़ दिए जायेंगे मकड़ी के जालों से दीखते शाखाओं पर सवार रिश्ते हरी-हरी पत्तियों पर भी नहीं खायेगा कोई तरस काटते जायेंगे पेड़ों के... आगे पढ़े

प्रकाश...

Updated on 27 February, 2014, 13:36
’गंदगी भीतर ही रखो’ की गालियों के बीच मैं अपनी बात कहता हूँ। पीछे रह गए बहुत से चित्रों को अपने साथ घसीटता फिरता हूँ। बद्दुआ देके जाती लड़कियों को दूर तक देखता हूँ, और माँ से कहता हूँ...... ’अब मैं जा रहा हूँ।’ बहुत तेज़ प्रकाश का मूल कहीं ऊपर... दूर ऊपर, सबसे ऊपरी... आगे पढ़े

बेवफ़ाई के किस्से सुनाऊँ किसे ?

Updated on 27 February, 2014, 13:23
 ग़ज़ल बेवफ़ाई के किस्से सुनाऊँ किसे  ? बात दिल की है अपनी बताऊँ किसे  ? कौन दुनियाँ में अपना तलबगार है, फोन किस को करूँ मैं बुलाऊँ किसे ? रूठने और मनाने के मौसम गये, किससे रूठूँ मैं अब, मैं मनाऊँ किसे ? ज़ख़्म दो चार हो तो गिनायें भी हम, सैकड़ो ज़ख़्म अपने गिनाऊँ  किसे  ?   छोड़ देते... आगे पढ़े

कल कैसे जिये हम वो आज अंदाज भूल गये - अक्षय आजाद भंडारी, धार

Updated on 26 February, 2014, 11:16
  कल कैसे जिये हम वो आज अंदाज भूल गये   कल के रीति रिवाज क्या थे   आज हम उसे सरल बना बैठै हैं   कल का भारत कैसा था   आज उसे बदल बैठै हैं   आज देश पर राजनीति समझौते पर मत किया करें   समझौतों मे नहीं देश चलाना है   जो आखें दिखायें... आगे पढ़े

समय

Updated on 19 February, 2014, 19:29
  नमक तेल मसाले डीज़ल पेट्रोल गैस आलू प्याज़ टमाटर लकड़ी कोयला कपड़ा सभी हो रहे हैं महंगे और सस्ते हो रहे हैं सम्बन्ध व  मौत के कारण   सस्ती हो गयी है  मौत ... आगे पढ़े

राह

Updated on 19 February, 2014, 19:28
मैं आंखें खोलकर चल लूं तुम आंखें खोलकर देखो मुझे जो भी मिले रस्ता मिले राही मगर देखो नहीं गन्तव्य से मतलब नहीं पहुंचूं नहीं चिंता मैं इतना सोच सकता हूँ स्वयं हित छोड़ कर देखो ... आगे पढ़े

मसूरी यात्रा / काका हाथरसी

Updated on 29 January, 2014, 20:05
देवी जी कहने लगीं, कर घूँघट की आड़ हमको दिखलाए नहीं, तुमने कभी पहाड़ तुमने कभी पहाड़, हाय तकदीर हमारी इससे तो अच्छा, मैं नर होती, तुम नारी कहँ ‘काका’ कविराय, जोश तब हमको आया मानचित्र भारत का लाकर उन्हें दिखाया देखो इसमें ध्यान से, हल हो गया सवाल यह शिमला, यह मसूरी, यह है नैनीताल यह है... आगे पढ़े

नाम बड़े, दर्शन छोटे : काका हाथरसी

Updated on 29 January, 2014, 20:03
नाम-रूप के भेद पर कभी किया है गौर ? नाम मिला कुछ और तो, शक्ल-अक्ल कुछ और शक्ल-अक्ल कुछ और, नैनसुख देखे काने बाबू सुंदरलाल बनाए ऐंचकताने कहँ ‘काका’ कवि, दयाराम जी मारें मच्छर विद्याधर को भैंस बराबर काला अक्षर मुंशी चंदालाल का तारकोल-सा रूप श्यामलाल का रंग है जैसे खिलती धूप जैसे खिलती धूप, सजे बुश्शर्ट पैंट... आगे पढ़े

बाल कविता : चुहिया रानी

Updated on 23 January, 2014, 21:47
चुहिया रानी, चुहिया रानी लगती हो तुम बड़ी सयानी। जैसे हो इस घर की रानी, कभी तो करती हो मनमानी। कुतुर-कुतुर सब खा जाती, आवाज सुन झट से छिप जाती। जब भी घर में बिल्‍ली आती, दूम दबा बिल में चली जाती। ... आगे पढ़े

बाल कविता: चंदा मामा

Updated on 23 January, 2014, 21:44
चंदा मामा गोल मटोल, कुछ तो बोल, कुछ तो बोल। कल थे आधे, आज हो गोल खोल भी दो अब अपनी पोल। रात होते ही तुम आ जाते , संग साथ सितारे लाते। दिन में न जाने कहां छिप जाते, कुछ तो बोल, कुछ तो बोल। ... आगे पढ़े

अंतिम छोर...

Updated on 15 January, 2014, 21:59
 प्रायवेट वार्ड नं. ३ जिन्दगी/मौत के मध्य जूझती संघर्ष करती गूंज रहे हैं तो केवल गीत जो उसने रचे जा पहुंची हो जैसे सूनी बर्फीली वादियों में वहाँ भी अकेली नहीं साथ है तन्हाइयां यादों के बड़े-बड़े चिनार मरणावस्था में पड़ी अपनी ही प्रतिध्वनि सुन बहती जा रही है किसी हिमनद की तरह ब्रह्माण्ड के अंतिम छोर तक..... ... आगे पढ़े

वासना

Updated on 15 January, 2014, 21:57
 वासना बस वास करती सड़क लतपथ सांस भरती इस जगह से उस जगह तक इस बदन से उस बदन तक वाहनों की आस भरती सड़क लतपथ सांस भरती वासना बस वास करती ज्योति बोली आँख खोलो कुल ह्रदय के पाट खोलो इस जखम से उस जखम तक उस वतन से इस वतन तक मानसिकता को टटोलो कुल ह्रदय के पाट खोलो ज्योति बोली... आगे पढ़े

कौए का जोड़ा और काले साँप की कहानी

Updated on 15 January, 2014, 21:52
किसी वृक्ष पर काग और कागली रहा करते थे, उनके बच्चे उसके खोड़र में रहने वाला काला सांप खाता था। कागली पुनः गर्भवती हुई और काग से कहने लगी -- ""हे स्वामी, इस पेड़ को छोड़ो, इसमें रहने वाला काला साँप हमारे बच्चे सदा खा जाता है।     दुष्टा भार्या शठं... आगे पढ़े

बाल कविता : सच्चे घर‌

Updated on 8 January, 2014, 23:26
मुझको दे दो प्यारी अम्मा, दो दो के दो सिक्के। उन सिक्कों से बनवाऊंगा, दो सुंदर घर पक्के। दो सुंदर घर पक्के अम्मा, दो सुंदर घर पक्के। इतने पक्के घुस ना पाएं उनमें चोर उच्चके। उनमें चोर उच्चके अम्मा, उनमें चोर उच्चके। अगर घुसे तो रह जाएंगे, वे घर में ही फंसके। अम्मा बोली दो रुपए में, ना बनते घर पक्के। ढेर ढेर रुपए... आगे पढ़े

बाल कविता : आसमान में पतंग

Updated on 8 January, 2014, 23:24
आसमान में चली पतंग मन में उठी एक तरंग लाल, गुलाबी, काली, नीली, मुझको तो भाती है पीली डोर ना इसकी करना ढीली सर-सर सर-सर चल सुरीली कभी इधर तो कभी उधर लहराती है फर फर फर। ... आगे पढ़े

कैसे कैसे उत्पाद

Updated on 1 January, 2014, 18:58
एक जगह बहुत भीड़ लगी थी एक आदमी चिल्ला रहा था कुछ बेचा जा रहा था आवाज कुछ इस तरह आई शरीर में स्फुर्ति न होने से परेशान हो भाई थकान से टूटता है बदन काम करने में नहीं लगता है मन खुद से ही झुंझलाए हो या किसी से लड़कर आए हो तो हमारे पास है ये दवा सभी... आगे पढ़े

बीट

Updated on 1 January, 2014, 18:55
मैंने देखा, सड़क पर कुछ गुंडे छेड़ रहे थे एक बच्ची को, रो रही थी वह, मदद मांग रही थी मुझसे, पर मैं चुप था, बहुत डरा हुआ था, हँस रहे थे गुंडे, बेबस थी वह बच्ची. डाल पर बैठा एक कौवा सब कुछ देख रहा था, चिल्ला रहा था गला फाड़कर, किए जा रहा था काँव-काँव, पर बेबस था वह भी. अंत में... आगे पढ़े

साल नया फिर आया

Updated on 29 December, 2013, 22:21
लो साल नया फिर आया बच्चों इतिहास नायाब इस बार तुम रचो, बुरी आदतें अब तुरंत तुम छोड़ो बुरी संगत से भी अपना मुंह मोड़ो, कर लो बच्चों तुम एक यह प्रण सेवा में सबकी रहना है अर्पण, मात-पिता व गुरु का सदा मान करो उनके आदर्शों पर अभिमान करो, पढ़-लिखकर सदा अव्वल रहना बातें सदा तुम शालीन ही... आगे पढ़े

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..

Updated on 27 December, 2013, 13:43
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं.. तुम मत मेरी मंजिल आसान करो.. हैं फ़ूल रोकते, काटें मुझे चलाते.. मरुस्थल, पहाड चलने की चाह बढाते.. सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं.. मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते.. मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे.. तुम पथ के कण-कण को तूफ़ान करो.. मैं तूफ़ानों मे चलने का... आगे पढ़े

क्या लिखूँ..??

Updated on 27 December, 2013, 13:38
कुछ जीत लिखूँ या हार लिखूँ.. या दिल का सारा प्यार लिखूँ.. कुछ अपनो के ज़ाज़बात लिखूँ या सापनो की सौगात लिखूँ.. मै खिलता सुरज आज लिखूँ या चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ.. वो डूबते सुरज को देखूँ या उगते फूल की सांस लिखूँ.. वो पल मे बीते साल लिखूँ या सादियो लम्बी रात लिखूँ.. सागर सा... आगे पढ़े

पर्वत-सी पीर

Updated on 6 December, 2013, 13:06
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, सारी कोशिश... आगे पढ़े

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ

Updated on 5 December, 2013, 13:21
हरिवंश राय 'बच्चन' सोचा करता बैठ अकेले, गत जीवन के सुख-दुख झेले, दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ! ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! नहीं खोजने जाता मरहम, होकर अपने प्रति अति निर्मम, उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ! ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! आह निकल मुख से जाती है, मानव की... आगे पढ़े

आज मानव का सुनहला प्रात है

Updated on 4 December, 2013, 12:41
आज मानव का सुनहला प्रात है, आज विस्मृत का मृदुल आघात है; आज अलसित और मादकता-भरे, सुखद सपनों से शिथिल यह गात है; मानिनी हँसकर हृदय को खोल दो, आज तो तुम प्यार से कुछ बोल दो । आज सौरभ में भरा उच्छ्‌वास है, आज कम्पित-भ्रमित-सा बातास है; आज शतदल पर मुदित सा झूलता, कर रहा अठखेलियाँ हिमहास है; लाज... आगे पढ़े

बहुत खूबसूरत समॉ चाहती हूं।

Updated on 3 December, 2013, 17:20
(उषा यादव जी देश की प्रमुख गज़ल़कारों में शुमार की जाती हैं. वर्ष 1991 से लगातार देश की विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में उऩकी ग़ज़लें पाठकों को आनंदित करती रहती हैं . उनकी प्रकाशित रचनाएं अमराईयां औऱ सोजे निहाँ काफी पसंद की जाती हैं . विद्यावाचस्पति , सारस्वत सम्मान से... आगे पढ़े

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

Updated on 3 December, 2013, 14:15
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस गोपालप्रसाद व्यास है समय नदी की बाढ़ कि जिसमें सब बह जाया करते हैं। है समय बड़ा तूफ़ान प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं ।। अक्सर दुनियाँ के लोग समय में चक्कर खाया करते हैं। लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, इतिहास बनाया करते हैं ।। यह उसी वीर इतिहास-पुरुष की अनुपम अमर... आगे पढ़े

ताज़महल

Updated on 11 October, 2013, 12:06
(उषा यादव जी देश की प्रमुख गज़ल़कारों में शुमार की जाती हैं. वर्ष 1991 से लगातार देश की विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में उऩकी ग़ज़लें पाठकों को आनंदित करती रहती हैं . उनकी प्रकाशित रचनाएं अमराईयां औऱ सोजे निहाँ काफी पसंद की जाती हैं . विद्यावाचस्पति , सारस्वत सम्मान से... आगे पढ़े

ये प्यार नहीं है, तो क्या है

Updated on 31 August, 2013, 11:32
ये प्यार नहीं है, तो क्या है, अहसास नहीं है, तो क्या है। तन्हाई की रातों में, जब चाँद उतर आता खिड़की पर, सर्द हवाएं दे जाती हैं, दस्तक चुपके चुपके खिड़की पर। याद किसी की आती है, आंखें टिक जाती खिड़की पर, चादर पर सिलवट पड़ जाती है, और तकिया नम हो जाता है। ये प्यार नहीं है तो... आगे पढ़े

राखी

Updated on 20 August, 2013, 10:45
                  राखी कच्चे धागों से बनी पक्की डोर है राखी प्यार और मीठी शरारतों की होड़ है राखी भाई की लम्बी उम्र की दुआ है राखी बहन के प्यार का पवित्र धुँआ है राखी भाई से बहन की रक्षा का वादा है राखी लोहे से भी मजबूत एक धागा है राखी जांत-पांत और भेदभाव से दूर है... आगे पढ़े

" दोस्ती "

Updated on 3 August, 2013, 15:13
दोस्ती ... आगे पढ़े

आदमी की अनुपात - गिरिजा कुमार माथुर

Updated on 28 July, 2013, 19:36
आदमी की अनुपात गिरिजा कुमार माथुर दो व्‍यक्ति कमरे में कमरे से छोटे - कमरा है घर में घर है मुहल्‍ले में मुहल्‍ला नगर में नगर है प्रदेश में प्रदेश कई देश में देश कई पृथ्‍वी पर अनगिन नक्षत्रों में पृथ्‍वी एक छोटी करोड़ों में एक ही सबको समेटे हैं परिधि नभ गंगा की लाखों ब्रह्मांडों में अपना एक ब्रह्मांड हर ब्रह्मांड में कितनी ही पृथ्वियाँ कितनी ही भूमियाँ कितनी... आगे पढ़े

बाल कविता : इतनी ढे़र किताबें

Updated on 1 July, 2013, 16:18
किसको अपने जख्म दिखाऊं किसको अपनी व्यथा सुनाऊं इतनी ढेर किताबें लेकर‌ अब मैं शाला कैसे जाऊं। बीस किताबें ठूंस ठूंस कर‌ मैंने बस्ते में भर दीं हैं बाजू वाली बनी जेब में पेन पेंसिलें भी धर दीं हैं किंतु कापियां सारी बाकी उनको मैं अब कहां समाऊं। आज धरम कांटे पर जाकर‌ मैंने बस्ते को तुलवाया वजन बीस का निकला मेरा बस्ता... आगे पढ़े

कविता : लाड़ली बेटी

Updated on 1 July, 2013, 16:17
लाड़ली बेटी जब से स्कूल जाने है लगी। हर खर्चे के कई ब्योरे मां को समझाने लगी।। फूल-सी कोमल और ओस की नाजुक लड़ी। रिश्तों की पगडंडियों पर रोज मुस्काने लगी।। एक की शिक्षा ने कई कर दिए रोशन चिराग। दो-दो कुलों की मर्यादा बखूबी निबाहने लगी।। बोझ समझी जाती थी जो कल तलक सबके लिए। घर... आगे पढ़े