आजादी के बाद देश के सामने सबसे बडी चुनौती थी व्यक्ति के मूलभूत अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करना तथा कायम रखना। हमारे संविधान ने भारत जैसे विविधता भरे देश को संसार के सबसे सशक्त लोकतांत्रिक देश के रूप में विकसित होने का अवसर दिया है। स्वस्थ एवं परिवक्त लोकतंत्र होने का यह मापदंड है कि हम स्वतंत्र विश्लेषण करे कि आजादी के बाद हम क्या पाना चाहते थेे, क्या पाया तथा क्या कुछ खो भी  दिया ।

74 वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई !
आज उन असंख्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का पुण्य स्मरण कर उन्हें श्रृद्धांजलि देने का दिन है, जिन्होंने देश को आजाद करने में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। देश की मिट्टी में अपना सब कुछ मिटा देने वाले ऐसे हजारों गुमनाम आजादी के सैनिक है जिनकी कोई पहचान नहीं बची।  उनके परिवार ने उनके जीते जी तो कष्ट सहा ही, उनके जाने के बाद वह भी गुमनामी की दौर में समा गये। ऐसे सभी अमर सेनानियों को एवं उनके परिवारों को बार-बार नमन।  
इन 73 सालों में हमने विकास के सभी क्षेत्रों में लंबी छलांग लगाई है। आज हम विश्व की 5वें नंबर की अर्थव्यवस्था है। विज्ञान और तकनीकि के क्षेत्र में हमारी प्रगति उल्लेखनीय रही है। हमारी अंतरिक्ष विज्ञान, परमाणु ऊर्जा तथा सामरिक तैयारी की क्षमता में असाधारण वृद्धि हुई है।  हरितक्रांति की बदौलत 133 करोड़ आबादी के बाबजूद हम खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर है। हमने भुखमरी, गरीबी, निरक्षरता जैसे गंभीर मसलों को काफी हद तक सुलझा लिया है। हालांकि हम यह दावा नहीं कर सकते है कि हमने इन पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है। अभी भी चौथाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे रह रही है।  देश की 77 प्रतिशत संपदा पर अभी भी केवल एक प्रतिशत आबादी का स्वामित्व है तथा आर्थिक असमानताएं बढ़ी हैं। 
यह नकारा नहीं जा सकता कि आजादी के बाद सरकारों ने शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्रों में आवश्यकता अनुसार ध्यान नहीं दिया। अभी भी हमारी जीडीपी का मात्र 4.6 प्रतिशत शिक्षा पर और 1.6 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं व्यय होता है, जो विश्व में अनेक देशों की तुलना में बहुत कम है। हाल की कोरोना महामरी ने हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की अपर्याप्तता को स्पष्ट रूप चिन्हांकित किया है। हमारी शिक्षा व्यवस्था युवाओं को ना तो रोजगार दिला पा रही है और ना हम विश्व स्तरीय शोध कार्य कर पा रहे हैं। नई शिक्षा नीति में खर्च को बढ़ाकर जीडीपी का 6 प्रतिशत करने तथा कई आधारभूत परिवर्तन करने की बात यही गई है, परंतु उसके क्रियान्वन को अभी देखना शेष है।
आजाद के बाद हमारी आबादी का चार गुना हो जाना विकास में बड़ी बाधा रहा है। विकास के साथ ही युवाओं की आकांक्षाएं बढ़ी है तथा अवसरों की कमी के कारण कई बार उनमें कुंठा भी देखने में आती है जिसका परिणाम प्राय: हिंसा के रूप में सामने आता है। यह चिंताजनक है कि गांधी के देश में, जिसका स्वतंत्रता आंदोलन मूल रूप से अहिंसा के मार्ग पर चला था  वहां अपने हितों के लिए व्यक्तिगत एवं सामूहिक हिंसा में वृद्धि देखने में आ रही है। क्षेत्रीयता एवं जातिवाद की भावना बढ़ी है। इतना वक्त गुजर जाने के बाद भी दलित समाज उचित रूप सें समाज की मुख्यधारा का अंग नहीं बन पाया है। भ्रष्टाचार अभी भी हमारी व्यवस्था को खोखला कर रहा है।  
आजादी के बाद महिलाओं के सशक्तिकरण एवं देश के विकास में उनकी भागीदारी में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। परंतु, पुरुष प्रधान हमारे देश में अभी भी इस क्षेत्र में और सुधार की आवश्यकता है। यह कटु सत्य है कि अभी भी हमारे देश में लिंग अनुपात दर प्रति हजार पर 933 है। महिला साक्षरता दर बढ़कर 61 प्रतिशत हुई है, परंतु अभी भी यह पुरुषों की तुलना में 20 प्रतिशत कम है।  हालांकि, प्रशासनिक क्षेत्र में महिलाओं का योगदान बढ़ा है तथा हाल  ही महिलाओं को सेना में  स्थाई कमीशन देना भी प्रारंभ कर दिया गया है।  परंतु अभी भी कार्य बल में महिलाओं की भागीदारी मात्र 27 प्रतिशत है। व्यवस्था में उनकी राजनैतिक भागीदारी अवश्य बढ़ी है परंतु विधायिका में 30 प्रतिशत महिला आरक्षण अभी भी एक ख्वाब ही है।
आज के दिन हमें इन सब बातों पर विचार कर संकल्प लेना होगा कि एक एकीकृत,सशक्त एवं विकसित भारत के निर्माण के लिए अपनी सामथ्र्य के अनुसार अपने-अपने स्तर पर प्रयास करें ताकि 1947 में आजादी के समय अपने स्वयं के साथ किये गए वायदे को साकार कर सकें। 
एक बार पुन: स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाओं के साथ....