राज्य की संप्रभुता के समक्ष चुनौतियां
आजादी के बाद हमने 26 जनवरी 1950 को अपने देश को एक संप्रभुता संपन्न गणराज्य घोषित करते हुए अंगीकृत किये संविधान की प्रस्तावना में लेख है:
हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :
न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा, उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढाने के लिए,
इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
संप्रभुता का अर्थ है किसी राष्ट्र या राज्य की अपने क्षेत्र और नागरिकों पर सर्वोच्च और अंतिम शक्ति, जिस पर कोई बाहरी शक्ति अंकुश न लगा सके। यह उसे स्वतंत्र रूप से शासन करने और अपने आंतरिक मामलों में स्वतंत्र और बाहरी रूप से मुक्त होकर निर्णय लेने का अधिकार देती है, चाहे वह कानून बनाना हो, कर लगाना हो या संधियां करना हो।
मात्र घोषित करने से ही कोई राष्ट्र संप्रभुता संपन्न देश नहीं बन जाता। बल्कि उसे अपनी संप्रभुता का अपनी आंतरिक शक्ति जिसमें जनशक्ति, आर्थिक शक्ति एवं सैन्य शक्ति शामिल हैं, के माध्यम से विकास करना होता है। हमारे संविधान की प्रस्तावना में भी संप्रभुता के आधार स्तंभों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है तथा संविधान में ऐसे प्रावधान किये गए हैं जिनसे हमारी संप्रभुता को शक्ति मिलती है। स्वाभाविक है भौगोलिक, धार्मिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विविधिताओं संपन्न हमारे देश में इन सभी विविधिताओं का सम्मान एवं समुचित ध्यान रखकर बनाई गई नीतियां ही देश को मजबूत बनाती हंै। इनमें से किसी भी आयाम पर नीतिविषयक विसंगतियां देश को या देश की संप्रभुता को कमजोर करती हंै। अपने संपूर्ण जनमानस को एक सूत्र में बांधकर, आंतरिक सुरक्षा को सुदृढ़ कर तथा देश को आर्थिक रूप से सशक्त बनाकर ही देश की संप्रभुता को अमली जामा पहनाया जा सकता है।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में राज्य की संप्रभुता को कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। आर्थिक वैश्वीकरण ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, निवेश और वित्तीय प्रवाहों में वृद्धि ने राज्यों की आर्थिक नीतियों पर नियंत्रण को कम कर दिया है। बहुराष्ट्रीय निगमों का प्रभाव बढ़ गया है और वह राज्यों की नीतियों को प्रभावित करने में सक्षम हैं। सूचना और विचारों के मुक्त प्रवाह ने राष्ट्रीय संस्कृतियों को कमजोर कर एक वैश्विक संस्कृति के उदय को बढ़ावा दिया है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सीमाओं को पार कर सूचना के प्रसार को आसान बना दिया है, जिससे राज्यों के लिए सूचना पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो गया है।
इसके अतिरिक्त अंतर्राष्ट्रीय संगठन जैसे संयुक्त राष्ट्र, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के हस्तक्षेप, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के फैसलों (राज्यों पर बाध्यकारी होते हैं, भले ही वे उनसे सहमत न हों), क्षेत्रीय संगठनों की नीतियों तथा अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों ने राज्यों की संप्रभुता को प्रभावित किया है। विशेषकर यदि कोई राज्य अपने नागरिकों के मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है, तो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय हस्तक्षेप कर सकता है।
आतंकवादी संगठन जहां राज्यों के भीतर हिंसा करते हैं वहीं अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक संगठन, जैसे कि ड्रग कार्टेल और मानव तस्करी नेटवर्क, राज्य की प्रभुता को कमजोर करते हैं, क्योंकि वे सीमाओं को पार कर अपराध करते हैं। गैर-सरकारी संगठन मानवाधिकारों, पर्यावरण और विकास जैसे मुद्दों पर काम करते हैं और राज्यों की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। यह सभी राज्य की प्रभुता को चुनौती देते हैं।
जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है जिसके लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होती है तथा इससे निपटने के लिए राज्यों की नीतियां प्रभावित होती हैं, जिससे उनकी संप्रभुता सीमित हो सकती है। हाल ही में कोविड-19 महामारी ने दिखाया कि कैसे एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट राज्यों की सीमाओं को पार कर राज्यों को अपनी नीतियों को बदलने के लिए मजबूर कर सकता है।
स्पष्ट है कि राज्य की प्रभुता स्वयं संपूर्ण नहीं है तथा समय-समय पर आंतरिक एवं वैश्विक स्तर पर आने वाली चुनौतियों से सामंजस्य रख कर ही राज्य अपनी संप्रभुता को स्थापित रख सकता है। हमारा गणतंत्र भी इससे अछूता नहीं है तथा एक समन्वयकारी नीति अपनाकर ही हम अपने गणतंत्र को मजबूत बनाकर संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित उद्देश्यों को प्राप्त कर सकते हैं।
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओं सहित


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