आज के बच्चे ही कल के नागरिक और नेता बनेंगे। वही देश का भविष्य निर्माण करेंगे। इसलिए उनका स्वस्थ, शिक्षित और नैतिक विकास  सुनिश्चित करना समाज और राष्ट्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि वह बड़े होकर जिम्मेदार और सक्षम नागरिक बनें। बच्चों को ईमानदारी, सच्चाई, दूसरों के मानवाधिकारों का सम्मान, अनुशासन, संतोष, श्रम की महत्ता और समानुभूति जैसे नैतिक मूल्यों को सिखाना आवश्यक है, क्योंकि बचपन में सीखी गई आदतें उनके पूरे जीवन को आकार देती हंै। बच्चों में असीम क्षमता और नई सोच होती है। यदि हम उनकी क्षमता को सही दिशा दें तो वह समाज और दुनिया में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।  
किसी भी देश के बच्चे ही उसका भविष्य होते हैं। उनका स्वस्थ एवं समग्र व्यक्तित्व निर्माण एक ऐसा विनिवेश है जो आने वाले समय में समाज और देश को सकारात्मक प्रतिफल देता है। 
2011 की जनगणना के अनुसार देश में लगभग 33.4 करोड़  आबादी 0 से 14 वर्ष की आयु की है, जो कि हमारी कुल आबादी का 24 प्रतिशत है। स्वाभाविक तौर पर यह एक बड़ी संख्या है तथा हमें बच्चों की देखभाल और पालन-पोषण के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। बच्चों की एक अच्छी परवरिश ही एक अच्छे राष्ट्र का निर्माण करती है। इतनी बड़ी जनसंख्या का समग्र विकास एक बहुत बड़ी चुनौती है तथा इसमें अनेक बाधाएं है। 
सबसे पहली चुनौती बच्चों के स्वस्थ शारीरिक विकास की है।  एक अध्ययन के अनुसार देश में 0 से 5 वर्ष की आयु के लगभग 60 प्रतिशत बच्चे  एनीमिया के शिकार है तथा 32 प्रतिशत बच्चों का वजन निर्धारित मापदंड से कम है। बालिकाओं के कुपोषण की दर बालकों की कुपोषण दर से कहीं अधिक है। अभी भी एक बड़ी संख्या में बच्चे जल्दी स्कूल छोड़ देते हैं। प्राथमिक शिक्षा में जहां यह प्रतिशत 1.9 है वहीं उच्चतर माधमिक स्तर पर बढ़कर 14.1 प्रतिशत हो जाती है। बालिकाओं के लिए यह दर बालकों की तुलना में अधिक है। 
2011 की जनगणना के अनुसार देश में 1 करोड़ बाल श्रमिक हंै तथा कोविड महामारी के बाद यह संख्या और अधिक बढ़ गई है। खेती, गृह कार्य, खनन, ईंट-भट्टा उद्योग, कालीन बुनाई एवं पटाखा उद्योग में बड़ी संख्या में बच्चे कार्य करते हैं। बिहार, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं महाराष्ट्र में बाल श्रमिकों की संख्या सर्वाधिक है। एक अन्य चिंता का विषय भिक्षावृत्ति में बड़ी संख्या में बालक- बालिकाओं का शामिल होना है। एक अध्ययन के अनुसार देश के भिखारियों में लगभग 26 प्रतिशत बच्चे हंै। देश में हर साल गुम होने वाले बच्चों में लगभग 25 प्रतिशत का पता नहीं चलता तथा प्रति वर्ष लगभग 44 हजार  बच्चे अपहृत होकर व्यवसायिक गिरोहों के चुंगल में फंस जाते हैं। बच्चों को बड़ी संख्या में वैश्यावृत्ति का शिकार भी होना पड़ता है तथा एक अनुमान के अनुसार देश में लगभग 10 लाख बच्चे बाल वैश्यावृत्ति में फंसे हुए हंै। यह संख्या यह कार्य करने वालों का लगभग 40 प्रतिशत है।
बच्चों के व्यक्तित्व विकास में एक बड़ी समस्या उनमें नशे की लत में पडऩा होता है। देश में 10 से 17 वर्ष आयु के लगभग 1.50 करोड़ बच्चे किसी न किसी नशे की लत का शिकार हंै। प्राय: बाल श्रमिक, भिखारियों एवं वैश्यावृत्ति में लगाए गए बच्चों में नशा खोरी की आदत ज्यादा है। आज-कल छोटे बच्चों में तम्बाखू गुटखा सेवन की समस्या आम हो गई है। यह सामग्री बेचने वाले व्यक्ति यह नहीं देखते हंै कि खरीदने वाला बच्चा है। बड़ी संख्या में माता-पिता भी इसके लिए जिम्मेदार है क्योंकि वहीं बच्चों को अपने लिए यह सामग्री खरीदने भेजते हैं।
देश में बाल अपराधियों की संख्या भी बढ़ती चली जा रही है। देश में प्रतिशत वर्ष लगभग 40 हजार बाल अपराधी कानून के समक्ष प्रस्तुत किए जाते हैं। सर्वाधिक चिंताजनक यह है कि गंभीर हिंसा के अपराधों में शामिल बाल अपराधियों की संख्या जो 2016 में 32.50 प्रतिशत थी, 2022 में बढ़कर 49.5 प्रतिशत हो गई। 
टैक्नोलॉजी का बढ़ रहा उपयोग भी बच्चों के विकास पर दुष्प्रभाव डाल रहा है। मोबाइल फोन का आदी होना, मोबाइल पर अश्लील वीडियों देखना, मोबाइल पर गेम खेलना एवं उस पर सट्टा खेलने जैसी आदतें बच्चों के व्यक्तित्व विकास में बाधक हैं तथा कई बार उन्हें अपराध की ओर भी ले जाती हैं।
देश का सुनहरा भविष्य सुनिश्चित करने के लिए परिवार, समाज एवं सरकार को बच्चों के समग्र व्यक्तित्व विकास में आ रही इन बाधाओं को दूर करने के लिए गहन उपाय करने होंगे, तभी एक विकसित एवं शक्तिशाली भारत के निर्माण की अवधारणा साकार हो सकेगी।  

शुभकामनाओं सहित....