किसी भी शिक्षा प्रणाली को सफल बनाने में सबसे बड़ा हाथ शिक्षकों का ही होता है। यह दुर्भाग्य है कि अभी भी देश में शिक्षक के व्यवसाय को अपेक्षतया कम वरीयता दी जाती है।  अधिकांश शिक्षक अपने कार्य में गौरव महसूस नहीं करते  तथा  उनका व्यवसायिक प्रदर्शन प्राय: कमजोर रहता है। वर्तमान में शिक्षकों के सामने दो चुनौतियां है।  पहला नई शिक्षा नीति का सफल क्रियान्वन कर शिक्षा के स्तर में सर्वांगीण विकास लाना तथा दूसरा कोरोना काल में शिक्षा व्यवस्था को तकनीकी माध्यम अपनाकर सुचारू रूप से चलाना। 

नई शिक्षा नीति की घोषणा के बाद शिक्षकों से नई अपेक्षाएं की जा रही है, क्योंकि शिक्षा नीति में अधोसंरचना के अतिरिक्त जो भी नये आयाम समाविष्ट किए गए है उनकी सफलता शिक्षकों के प्रयासों के ऊपर ही निर्भर है। 
देश में सरकारी शैक्षणिक संस्थानों का स्तर प्राय: खराब है। नई शिक्षा नीति में जीडीपी का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्चे करने का लक्ष्य रखा गया है। परंतु हकीकत में वर्ष 2014-15 में यह 4.1 प्रतिशत था तथा 2020-21 में घट कर 3.2 प्रतिशत रह गया। मानव संसाधन विकास किसी भी सरकार का पहला दायित्व होता है, परंतु विभिन्न सरकारों द्वारा लगातार नीति अपनाई गई कि शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने का मुख्य दायित्व निजी क्षेत्र का ही है। 
हमारे देश में शिक्षकों की कमी भी है तथा उनकी गुणवत्ता भी वांछनीय स्तर की नहीं है। देश में अभी भी प्रति शिक्षक विद्यार्थियों की संख्या 35 है, जबकि विश्व औसत 23 है। देश में एक लाख से ज्यादा एकल शिक्षक विद्यालय है। यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार देश में 20 लाख शिक्षक और होने चाहिए। देश में प्राथमिक विद्यालयों में 9 लाख एवं उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में एक लाख शिक्षकों के पद रिक्त है। शिक्षा के अतिरिक्त अन्य कार्यों जैसे चुनाव एवं विभिन्न शासकीय सर्वेक्षण कार्य में लगाए जाने के कारण भी शिक्षक शिक्षण कार्य में समुचित ध्यान नहीं दे पाते। उच्च शिक्षा संस्थानों में भी शिक्षकों के 25 से 40 प्रतिशत पद रिक्त है। स्वाभाविक तौर पर इन सबका असर शिक्षण की गुणवत्ता पर पढ़ता है। 
विद्यालयों में अभी भी हमारा पूरा फोकस इस पर रहता है कि शिक्षक उपस्थित है या नहीं। उसके कार्य की गुणवत्ता पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। देश में प्रति 6 में 1 प्राथमिक शाला शिक्षक तथा उच्चत्तर माध्यमिक स्तर पर 14 प्रतिशत शिक्षक समुचित रूप से प्रशिक्षित नहीं है।   सेवा के दौरान शिक्षकों के प्रशिक्षण पर समुचित ध्यान नहीं दिया जा रहा। जिस के कारण उनसे अपने ज्ञान को सुधारने तथा शिक्षण की नई तकनीकों की अपेक्षा करना बेकार है। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015-16 में मात्र 13.5 प्रतिशत शिक्षकों को ही किसी तरह का प्रशिक्षण दिया गया। मध्यप्रदेश में गत वर्ष आयोजित शिक्षकों की योग्यता परीक्षा का परिणाम 30 प्रतिशत से भी कम रहा। प्रशिक्षण देने तथा न्यूनतम अंक 33 प्रतिशत करने पर पुन: परीक्षा लेने पर भी 84 शिक्षक फिर फेल हो गए। देश में शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए योग्य व्यक्तियों का शिक्षक के रूप में चयन  तथा सेवा के दौरान समय-समय पर उन्हें शिक्षण विधा का अद्यतन प्रशिक्षण देना होगा।
प्रति वर्ष 14 सितंबर को हिन्दी दिवस पर हिन्दी को उसका यथोचित सम्मान देने तथा देश में राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने का संकल्प लेने के बावजूद भी देश में हिन्दी के उपयोग में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हो रहा तथा लिखी जाने वाली अथवा बोलने वाली हिन्दी की गुणवत्ता में लगातार गिरावट हो रहा है। हिन्दी के साहित्य को अभी भी अभिजात्यवर्ग द्वारा दोयम दर्ज का माना जाता है तथा उसका प्रचार-प्रसार कम होता जा रहा है। हिन्दी के गिरते हुए स्तर के लिए बहुत हद तक हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी की पढ़ाई का गिरता हुआ स्तर है। यह बेहद चिंता का विषय है कि उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में भी बोर्ड की परीक्षा में 8 लाख बच्चे हिन्दी विषय में ही अनुत्तीर्ण हो गए। शिक्षकों द्वारा अपनी शिक्षण कला को बेहतर बनाने पर ही शिक्षित युवाओं में हिन्दी ज्ञान का स्तर सुधारेगा साथ ही हिन्दी की भी यह सही सेवा होगी।

शुभकामना सहित