कोरोना ने संम्पूर्ण समाज को आर्थिक, सामाजिक एवं भावनात्मक रूप से बुरी तरह से प्रभावित किया है।  मानवीय संवेदानाएं हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है। संवादहीनता प्राय: असंवेदनशीलता को जन्म देती है जो वर्तमान में परिलक्षित हो रहा है। कोरोना के कारण 2020 में उत्पन्न समस्याओं से आने वाले समय में निपटना सब के लिए बड़ी चुनौती रहेगी। आवश्यकता होगी कि सभी राष्ट्र तथा समुदाय आपसी विवादों तथा निहित स्वार्थों को छोड़कर नवनिर्माण तथा मानव कल्याण की ओर एकजुट प्रयास करें। 

अवसाद और लाचारी से भरा वर्ष 2020,जिसमें हमने चारों तरफ एक अजीब सी खामोशी और वेदना देखी तथा जिसकी शायद ही कोई सुखद याद रहे, समाप्त होने को है। बच्चे, युवा, बुजुर्ग सभी एक दहशत के माहौल में जी रहे थे। औद्योगिक प्रगति हो या व्यक्तिगत जीवन में रिश्तों की नजदीकी, सब कुछ एक दम जम सा गया था। अपने ही देश में प्रवासी बन गए मजदूरों की व्यथा तथा बड़ी संख्या में लोगों के रोजगार छिन जाना मानवीय संवेदनाओं को बुरी तरह झंझकोर गया था। इस बदहाली के माहौल में भी अनेक व्यक्तियों एवं स्वयं सेवी संगठनों ने अपनी सामथ्र्य से कहीं अधिक सेवा की आदर्श मिसाल भी पेश की है। पिछले दो माह में माहौल कुछ सुधारता हुआ नजर आया है पर वह भी शंकाओं के घेरे में है।
वर्ष में अनेक लोगों को रोजगार खोने का या अपने परिजनों के अकस्मात बिछड़ जाने के असामयिक दुखों का सामना करना पड़ा। हमने त्यौहार, व्यक्तिगत समारोह तो एकाकीपन में मनाए ही, सर्वाधिक दुखद रहा इस महामारी से पीडि़त व्यक्तिओं का मौत में भी एकाकीपन। एक गुमनाम व्यक्ति की तरह अस्पताल में काल का ग्रास बनना और फिर परिजनों का एकाकी शोक। यह सब जीवन के बारे में हमें कुछ नया सिखा गया है।
 कोरोना का सबसे खराब प्रभाव हमारे बच्चों ने झेला है। स्कूलों के बंद होने तथा उनकी गतिविधियों पर रोक ने उनके सामाजिक विकास को लगभग रोक दिया है। छोटे फ्लैट  या छोटे घरों में रहने वाले बच्चों का जीवन किसी नजरबंद व्यक्ति से बेहतर नहीं रहा।  स्कूली शिक्षा के नाम पर ऑनलाईन कक्षाएं लगी जरूर हैं, परंतु उसका लाभ केवल संपन्न वर्ग के बच्चे ही उठा पा रहे हैं। कोरोना के चलते वास्तव में एक पूरी पीढ़ी विशेषकर गरीब वर्ग जैसे औपचारिक शिक्षा से वंचित हो गई है। विश्व में लगभग एक अरब बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं तथा ऐसी आशंका है कि इनमें से तीन करोड़ शायद ही कभी स्कूल का मुंह देखे। एक बड़ा खतरा दिख रहा है बाल मजदूरी का तथा बालकों की तस्करी का बढऩा। अर्थ व्यवस्था में गिरावट के कारण सस्ते मजदूरों की बहुत ज्यादा मांग होगी। अपने परिवार से अथवा स्कूल से अलग हुए बच्चे इस कमी को पूरा करने का एक अच्छा साधन रहेंगे। परिवार की आय में गिरावट आने के कारण अनेक बच्चों के खान-पान की पौष्टिकता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा है।
हालांकि धीमी आर्थिक गति के कारण कार्बन डाई आक्साईड के उत्र्सजन में 7 प्रतिशत कमी आई है, परंतु वर्ष 2020 अब तक के तीन सबसे गर्म वर्षों में शामिल है। इस वर्ष अनेक वनों में आग लगने, धरती एवं समुद्र के अधिकतम गर्म होने के प्रकरण सामने आए है। आर्कटिक की बर्फ पिघलने की रफ्तार भी बढ़ी है। कोरोना के कारण धीमी आर्थिक प्रगति को गति देने की दौड़ में प्राय: सभी राष्ट्रों द्वारा निकट भविष्य में पर्यावरण को नजरअंदाज करना एक स्वाभाविक कदम रहेगा। प्रदूषण नियंत्रण तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए यह बड़ी चुनौती होगी।
संचार तकनीक में हुई क्रांति के बावजूद कोरोना के चलते हमारे व्यक्तिगत जीवन में संवादहीनता बढ़ी है। टेक्नालॉजी मानव की केवल मदद कर सकती है,  वह मानव की जगह नहीं ले सकती। संवादहीनता की वृद्धि का दुष्परिणाम हमारी व्यवस्था पर भी पड़ता दिख रहा है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह सुखद संकेत नहीं है। 
वर्ष की समाप्ति के साथ ही कोरोना वैक्सीन के सफलता पूर्वक लांच होने के समाचार आ रहे है तथा इस महामारी पर शीघ्र नियंत्रण की आशा बढ़ गई है। आने वाला वर्ष संपूर्ण विश्व के लिए आशा तथा खुशहाली का नया सवेरा लाए जिसमें सब सुखी रहे। 
सर्वे भवन्तु सुखिन:। सर्वे सन्तु निरामय्।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित दु:ख भाग्भवेद।

आने वाले वर्ष की शुभकामनाओं सहित