जनसंख्या की वृद्धि ज्यामिती अनुपात में होती है, जबकि संसाधनों की उपलब्धता में वृद्धि सरल अनुपात में।  प्रसिद्ध अर्थशास्त्री माल्थस के अनुसार यदि आत्म संयम एवं कृत्रिम संसाधनों से बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित नहीं किया हो गया तो प्रकृति इसे अपने कू्रर हाथों से नियंत्रित करने का प्रयास करेगी। जनसंख्या वृद्धि के रूझानों को संभालने के साथ-साथ जनसंख्या वृद्धि और व्यक्तिगत कल्याण के बीच संबंध को स्वीकार करना आवश्यक है। जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण करने के लिए कानून बनाने के स्थान पर परिवार नियोजन से जुड़े परिवारों को आर्थिक प्रोत्साहन देकर इस उद्देश्य की पूर्ति की जा सकती है। 

बढ़ती जनसंख्या के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए प्रति वर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। इस साल का जनसंख्या दिवस का थीम 'कोरोना महामारी के समय में दुनियाभर में महिलाओं और बालिकाओं के स्वास्थ्य और अधिकारों की सुरक्षाÓ है। 
पिछली एक सदी में बढ़ती हुई जनसंख्या के चलते आज भी दुनिया की बड़ी आबादी अपनी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। लाखों लोग बेघर हैं तथा करोड़ों को पीने का साफ पानी नहीं मिलता है। बढ़ती हुई जनसंख्या की निरंतर बढ रही आवश्यकताओं के कारण औद्योगीकरण, वाहनों के बढ़ते प्रयोग, वनों की अंधाधुंध कटाई तथा टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रयोग के कारण ग्रीन हाउस प्रभाव बढ़ा है। पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है तथा पृथ्वी का जल स्तर पर भी बढ़ रहा है। 
हमारे देश के सामने भी सबसे बड़ी समस्या बढ़ती जनसंख्या है। आजादी के समय हमारी आबादी 33 करोड़  थी जो अब लगभग चार गुना हो गई है। विश्व की 17.5 प्रतिशत जनसंख्या भारत में रहती है जबकि हमारे पास केवल 2.5 प्रतिशत जमीन तथा चार प्रतिशत जल संसाधन है। इसी रफ्तार से आबादी बढऩे पर हम 2030 तक विश्व के सर्वाधिक आबादी वाले देश बन जाएंगे तथा 2050 तक हमारी आबादी लगभग 160 करोड़ हो जाएगी। इतनी बड़ी आबादी होने तथा सीमित प्राकृतिक संसाधनों के कारण प्रदूषण बढ़ा है, बेरोजगारी बढ़ी है जिसके कारण आर्थिक एवं अन्य सामाजिक समस्याएं भी बढ़ रही है। 
हमारी बढ़ती हुई जनसंख्या का एक बड़ा कारण अशिक्षा एवं गरीबी है। जनसंख्या नियंत्रण हेतु हमारी जनसंख्या नीति में सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य सकल प्रजनन दर 2.1 प्रतिशत पर लाना, दो बच्चों के मापदंड को अपनाना, शिशु मृत्यु दर 30 प्रति हजार जीवित जन्म तक लाना, जन्म पूर्ण लिंग निर्धारण तकनीक पर रोक लगाना, लड़कियों को देर से विवाह के लिए प्रोत्साहित करना इत्यादि शामिल है। समय के साथ सकल प्रजनन दर में कमी अवश्य आई है परंतु 2050 के पूर्व इसे स्थिर किया जाना संभव नहीं है। 
जनसंख्या वृद्धि दर को हम कुछ हद तक रोकने में सफल हुए है, परंतु जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम में पूर्ण सफलता नारी सशक्तिकरण की अवधारणा तथा नारी के सामाजिक-परिवारिक-आर्थिक-धार्मिक एवं जीवन की उन्नति के समावेश के बिना संदिग्ध रहेगी। यह देखा गया है कि जनसंख्या वृद्धि दर प्राय: उन देशों में ज्यादा है जहां स्त्रियों में शिक्षा का अभाव है। जनसंख्या नियंत्रण के लिए महिलाओं को व्यापक स्तर पर शिक्षित करना आवश्यक होगा।  परिवार में संतानों की संख्या और उनके बीच समयांतराल के विषय में निर्णय लेने की प्रक्रिया में जब तक नारी की केन्द्रीय भूमिका नहीं होगी तब तक 'छोटा परिवार-सुखी परिवारÓ का नारा सही अर्थों में नहीं होगा।
जनसंख्या नियंत्रण के संबंध में लोगों को जागरूक करने के लिए शिक्षा प्रणाली में भी इसे शामिल करने की आवश्यकता है। समाज में बेटा-बेटी के बीच भेद खत्म करना होगा। वर्तमान में प्रति हजार पुरूषों पर 944 महिलाओं का लिंगानुपात इशारा करता है कि बालिका शिशु अभी भी परिवारों में अवांछनीय है। इस बारे में स्वयं महिलाओं को अपनी सोच बदलनी होगी। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि हमारे सामाजिक वातावरण में महिलाएं सुरक्षित, बराबर एवं आर्थिक रूप से सशक्त महसूस करें। जरूरत है कि देश का हर नागरिक जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणामों को समय रहते समझे तथा जागरूक रह कर सरकार के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले, तभी इस गंभीर चुनौती से निपटा जा सकता है।
शुभकामना सहित