स्वतंत्रता और हम...
स्वतंत्रता मानव का उच्चत्तम नैसर्गिक अधिकार है। तुलसीदास जी ने भी कहा है 'पराधीन सपनेहु सुख नाहींÓ। किसी भी समाज में स्वतंत्रता निरंकुश नहीं हो सकती तथा उसे सीमा में रहना पड़ता है। स्वतंत्रता का अर्थ स्वछंदता नहीं है। स्वतंत्रता का एक प्रमुख आयाम दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान भी है। सड़कों पर कानून का उल्लंघन करना, कोलाहल करना, गंदगी फैलाना हम अपना अधिकार मानने लगे हैं। नागरिक ज्यादातर अपने अधिकारों को लेकर ही सचेत रहते हैं परंतु समाज एवं राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों एवं जिम्मेदारियों पर ध्यान नहीं देते। स्वेच्छाचारी सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारी तथा राजनेता अपने दायित्वों से मुकरते हुए सेवा धर्म से दूर होते जा रहे हैं। अपने स्वार्थ के लिए हम किसी भी स्तर पर गिरने के लिए तैयार हो जाते हैं। सत्याग्रह के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्त करने वाले देश में प्राय: व्यवस्था के समक्ष सत्य बोलने वालों की संख्या कम होती जा रही है। इन सब का परिणाम यह है कि हम एक ऐसे समाज के रूप में विकसित हो रहे हैं जो प्रमुखत: आत्मकेंद्रित ही है।
80वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामना। आज ही के दिन सदियों की गुलामी के बाद देश की सत्ता उसकी जनता के हाथों में आई तथा देश ने एक मजबूत एवं खुशहाल लोकतंत्र बनने की ओर कदम बढ़ाये थे। इन 79 वर्षों में हमने आर्थिक रूप से देश को मजबूत बनाने, अधोसंरचना निर्माण तथा विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किये हैं। सर्वाधिक महत्वपूर्ण है कि तमाम चुनौतियों के बाद भी हमारी लोकतंत्रिक व्यवस्था बरकरार रही है।
किसी भी राष्ट्र की जिंदगी में 79 वर्ष का सफर काफी लंबा होता है। स्वतंत्रता के बाद की तीसरी पीढ़ी अब जिम्मेदारियां संभालने के लिए तैयार है। ऐसे में यह सामयिक है कि अपने अभी तक के सफर का एक विश्लेषणात्मक लेखा-जोखा कर हम देश को प्रगति के मार्ग पर और आगे ले जायें।
आजादी के वक्त विषमताओं भरे देश में हमने देश के सभी नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की क्षमता प्राप्त करने तथा एकता और अखंडता बढ़ाने के लिए संकल्प लिया था। इन उद्देश्यों की पूर्ति में हम बहुत कुछ आगे बढ़े हैं, परंतु अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है। देश में आर्थिक विषमता बढ़ती जा रही है। रोजगारोन्मुखी शिक्षा तथा रोजगार के अवसरों के अभाव में युवा पीढ़ी बेरोजगार होकर कुंठित महसूस करती है। उनमें नैतिक मूल्यों के प्रति विश्वास की कमी है। इन सबका एक सबसे बड़ा कारण बढ़ी हुई आबादी के कारण अवसरों की कमी तथा युवा वर्ग के सामने आदर्श व्यक्तित्वों का अभाव है। धर्मांधता, जाति, धर्म और सांप्रदायिकता के नाम पर भेद-भाव एवं वैमनस्यता बढ़ रही है। समाज में समूह हिंसा तथा समाज को व्यवस्थित बनाने के लिए बने कानूनों का उल्लंघन करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। देश एक ऐसी वीआईपी संस्कृति की ओर बढ़ता जा रहा है, जहां कुछ व्यक्ति स्वयं को कानून से ऊपर तथा दूसरों से बड़ा मानकर व्यवहार करने लगे हैं तथा प्राय: व्यवस्था भी उनके सामने नतमस्तक हो जाती है। इस सबके कारण सामान्यजन में कुंठा तथा व्यवस्था के प्रति अवश्विास बढ़ता जा रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई मानकों पर हम वहां नहीं पहुंच पाये है, जहां इतने लंबे अंतराल के बाद किसी भी राष्ट्र को होना चाहिए तथा हम अपने समकालीन स्वतंत्र हुए अनेक देशों से अनेक आयामों में गुणवत्ता में पीछे रह गये हैं। मानव विकास सूचकांक, लैंगिंक समानता सूचकांक लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की विश्सनीयता सूचकांक तथा सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के संबंध में अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा हमें सर्वाधिक निचली पायदानों में रखा गया है। हमारी शिक्षा व्यवस्था तथा जनसाधारण को मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाएं अभी भी स्तरीय नहीं है। हमारा कोई भी शिक्षण संस्थान विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में शामिल नहीं है। हमारी अनेक संस्थाओं की स्वायत्तता किसी भी लोकतंत्रिक व्यवस्था की अपेक्षानुसार नहीं है। हमारी न्याय व्यवस्था शिथिल है। विकास के दौरान पर्यावरण की अनदेखी भी एक नई समस्या पैदा कर रही है।
देश के हर क्षेत्र में हमने राजनीति को सर्वपरि कर दिया है परंतु अधिकांश राजनेताओं का आचरण अनुकरणीय नहीं कहा जा सकता। सर्वाधिक चिंता का विषय है कि प्रतिभाशाली व्यक्तियों तथा आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्तियों में देश के बाहर जाकर निवास करने की प्रवत्ति बढ़ती जा रही है। लैंगिंक असामनता विचारधारा के चलते देश में महिलाओं को अभी भी राजनैतिक व्यवस्था व आर्थिक विकास में अपनी बराबरी के लिए जूझना पड़ता है। समाज में सामाजिक रूप से पिछड़े रहे व्यक्तियों को अभी भी कई बार प्रताडऩा से गुजरना पड़ता है तथा व्यवस्था में उनकी भागीदारी का स्तर अनुपातिक नहीं है।
इन सब विकृतियों को दूर करने के लिए हमें अपनी सोच तथा आचरण में एक आमूलचूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है, जिसमें हम स्वतंत्रता के वास्तविक अर्थ को समझें तथा अपने आचरण को देश के प्रति समर्पित कर उसे दूसरों के लिए भी एक आदर्श के रूप में स्थापित करें।
एक बार पुन: स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाओं सहित...


ममता बनर्जी की रैली पर हाईकोर्ट का ब्रेक, सभा को मिली अनुमति; जानें शर्तें
दलीप ट्रॉफी 2026 पर ईस्ट जोन का कब्जा, पहली पारी की बढ़त से बना चैंपियन
किसानों को साधने की BJP की रणनीति में MP आगे, लाल सिंह आर्य को नई जिम्मेदारी
कौन हैं IAS निधि निवेदिता? ट्रांसफर के बाद उनके दिए आदेश निरस्त होने से चर्चा तेज
राजनांदगांव में करोड़ों की धोखाधड़ी का मामला, भाजपा नेता समेत 3 आरोपी नामजद
‘दृश्यम 2’ को लेकर तब्बू की चिंता हुई थी हद से ज्यादा, बोलीं- मैं पूरी तरह परेशान थी
गौरव भाटिया केस: कोर्ट बोला- बिना जांचे पोस्ट करना ठीक नहीं, 24 घंटे में हटाने का निर्देश
राजघाट हादसे पर सियासत तेज, अजय राय ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर सरकार को घेरा
‘खड़े हनुमान कहीं नहीं जाएंगे’, उमा भारती ने मोहन यादव से कहा- हटाने का प्लान बदलें
थाईलैंड में पुलिस अफसर की खौफनाक करतूत, पत्नी की हत्या के बाद 18 घंटे तक चला ऑपरेशन