अंधेरे को हटाना है...

दीपावली को दीपों के पर्व के रूप में मनाया जाता है। दीपक अज्ञानता और नकारात्मकता के अंधकार को दूर करने का प्रतीक है। आध्यात्ममिक दृष्टि से दीपक का प्रकाश आत्मज्ञान और सत्य की विजय का प्रतीक भी है। दीपावली पर्व घर की और बाहरी सफाई के साथ-साथ आंतरिक शुद्धि करने का प्रतीक है जो आत्मा की पवित्रता को दर्शाता है। इस अवसर पर महालक्ष्मी की पूजा केवल भौतिक धन के लिए नहीं बल्कि आंतरिक समृद्धि और आंतरिक शांति के लिए भी की जाती है। आज के भौतिकतावादी युग में दीपावली मनाने की सम्पूर्ण प्रक्रिया धन और ऐश्वर्य का दिखावा भर रह गई है। वास्तव में समाज में व्याप्त अंधकार और गहरा होता जा रहा है।
दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामना।
वैदिक प्रार्थना है 'तमसो मा ज्योर्तिगमय:Ó। अंधकार से प्रकाश में ले जाने वाला और अपने चारों ओर का अंधेरा दूर करने की दीपक की शक्ति का पूजा का पर्व है दीपावली। प्राय: लोग दीपावली पर मात्र घर की सफाई एवं रंगाई पुताई करने, दीपावली से जुड़े प्रसंगों का स्मरण करने, रोशनी करने, पूजा करने, पटाखे चलाने एवं परिचितों को शुभकामना देकर पर्व मनाने की इतिश्री समझ लेते हैं। किन्तु प्रकाश पर्व के उन आंतरिक संदेशों को अनदेखा कर दिया जाता है जो हमें आत्मा में निहित प्रकाश को उत्पन्न करने की प्रेरणा देते हैैं। हकीकत में दीपावली के समस्त सांसारिक आयोजन हमारे जीवन में अज्ञान रूपी अंधकार के ही सूचक हैं। अंधकार हमारे अज्ञान, दुराचरण, दुष्ट प्रवत्तियों, आलस्य और प्रमाद, बैर और विनाश, क्रोध और कुंठा, राग और द्वेष, हिंसा और दुरागृह अर्थात हमारी राक्षसी मनोवृत्तिओं का प्रतीक है। जबकि प्रकाश हमारी सद्प्रवृत्तियों, सद्भाव, संदेवना एवं करूणा, प्रेम और भाईचारे, सुख और शांति का प्रतीक है।
यह त्यौहार हमें यह सिखाता है कि सत्य और ज्ञान के प्रकाश को जलाये रखना चाहिए ताकि अज्ञानता और अंधेरा दूर हो सके। दीये की रोशनी हमारे भीतर की अच्छाईयों का और अंधकार के विरुद्ध संघर्ष की हमारी इच्छा शक्ति और विजय के विश्वास का प्रतीक भी है जिसे हमें हर समय जलाए रखना चाहिए। दीपावली का मूल है अंधकार, असत्य और बुराई का अंत निश्ििचत है और प्रकाश, सत्य और अच्छाई की हमेशा जीत होती है। हमारे भीतर जो अज्ञान का अंधकार छाया हुआ है वह ज्ञान के प्रकाश से ही मिट सकता है।
आज आतंकवाद, भय, असमानता, हिंसा, प्रदूषण, ओजोन परत का नष्ट होना आदि वृहत् समस्याएं 21वीं सदी के मनुष्य के सामने चुनौती बनकर खड़ी हंै। आज भी हमारे देश में जातीय भेदभाव, साम्प्रदायिकता, अशिक्षा, लैंगिंक भेदभाव, कन्या भू्रण हत्या, दहेज प्रथा, बालविवाह, नशे का व्यापार, अंधविश्वास और रूढि़वादिता, भ्रष्टाचार, प्रदूषण जैसे पयार्वरणीय अपराध, वनों की कटाई, सामाजिक हिंसा और बालश्रम जैसी बुराईयों का अंधकार हम को घेरे हुए है। हमारे समाज में परिवार में पुत्री का जन्म लक्ष्मी के आगमन के रूप में देखा जाता है तथा पत्नी को गृहलक्ष्मी माना जाता है, परंतु दीपावली पर लक्ष्मी पूजन करने वाले समाज में प्राय: इन लक्ष्मिओं की स्थिति कई बार सुखद नहीं कहीं जा सकती। धनार्जन एवं सुख-सुविधाओं को एकत्र करने में पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचाई जा रही है। निहित स्वार्थ के सामने मानवीय मूल्य एवं नैतिकता गौण हो गए हंै। दुख है कि इन सभी समस्याओं का जनक मनुष्य ही है। इन व्याप्त अंधेरों को दूर किये बगैर दीपावली पर्व पर रोशनी करना एक तरह से बेमानी है। असली दीपावली मनाने के लिए हमें समाज में व्याप्त इन बुराईयों को दूर करना होगा।
आइये, इस दीपावली पर हम संकल्प लें कि हम एक दीपक की तरह अपने चारों और फैले सभी प्रकार के अंधकार को दूर करेंगे तथा समाज को न्याय, समरसता, समानता एवं सद्भाव के प्रकाश से आलोकित करेंगे।
एक बार पुन: ज्योति पर्व की बधाई एवं शुभकामना....