दुर्गोत्सव पर हमारे देश में कन्यापूजन की भी परंपरा है, परंतु आवश्यकता इस बात की है कि बालिकाओं के अधिकारों एवं उनके संरक्षण के संबंध में हम सतत जागरूक रहें। अब भी देश में जन्म के पूर्व से लेकर सारी उम्र बालिकाओं को दोयम दर्जे का व्यवहार झेलना पड़ता है एवं बालकों की तुलना में उनके नैसर्गिक विकास की ओर समाज का ध्यान कम है। कन्या भू्रण हत्या, अशिक्षा, बालविवाह, दहेज कुप्रथा एवं रोजगार के अवसरों की अपर्याप्तता ऐसी चुनौतियां हैं जो बालिकाओं के संरक्षण एवं उनके व्यक्तित्व विकास में बाधक हैं।


दुर्गोत्सव एवं दशहरा की हार्दिक बधाई। हर वर्ष दशहरा पर बुराई के प्रतीक रावण का दहन तो होता है, पर हमारे मन और समाज में व्याप्त बुराई का रावण न केवल यथावत है बल्कि बढ़ता ही जा रहा है। जिस गति से दहन होने वाले रावणों की संख्या और ऊंचाई बढ़ रही है, उसी गति से देश/समाज में बुराईयां बढ़ती जा रही है। रावण प्रतीक है अहंकार, अनैतिकता तथा सामथ्र्य के दुरूपयोग का। आज भी हमारे चारों ओर भ्रष्ट्राचार, मिलावट खोरी, सामाजिक विषमता, धार्मिक असहिष्णुता, जातिवाद, लैगिंक असमानता, नारी उत्पीडऩ, दहेज, यौन हिंसा, अशिक्षा, गरीबी, प्रदूषण, जैसी समस्याओं का रावण चुनौती देता खड़ा है। रावण वध का सांकेतिक दशहरा मनाने के साथ इन बुराईयों पर विजय पाने की आवश्यकता है।  
अंतराष्ट्रीय पत्रिका 'दि लैन्सेटÓ में छपे एक शोध के मुताबिक भारत में पिछले तीस सालों में कम से कम 40 लाख बच्चियों की भू्रण हत्या की गई है। यह अनुमान अधिकतम 1 करोड़  20 लाख भी हो सकता है। कन्या भू्रण हत्या की पुष्टि 2011 की जनगणना के अनुसार 1000 लड़कों के मुकाबले देश में 914 लड़कियां थी। विश्व में यह औसत 983 है तथा इस औसत में विश्व में हमारा स्थान ऊपर से 189वां है। हरियाणा एवं पंजाब में 830 वह 846 के आंकड़े के साथ यह स्थिति सबसे खराब है। हालांकि 17 वर्ष पहले देश मेें  पैदा होने से पूर्व लिंग मालूम करने को गैरकानूनी बनाया गया था, परंतु इस कानून का सख्ती से पालन नहीं हो रहा है। 
व्यक्तित्व विकास में सबसे महत्वपूर्ण योगदान शिक्षा का होता है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश के औसत 74 प्रतिशत के विपरीत महिलाओं में साक्षरता का प्रतिशत 65.46 है। हालांकि पुरुषों की तुलना में 2001 के बाद महिला साक्षरता दर तेजी से बढ़ी है। परंतु राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं आंध्रप्रदेश में अभी भी महिला साक्षरता 60 प्रतिशत या उससे कम है। बालिका शिक्षा में अभी भी ग्रामीण अंचलों में अनेक बालिकाएं स्कूल नहीं जा पाती है, क्योंकि या तो उनके घर के समीप स्कूल नहीं है, आवागमन का सुविधाजनक एवं सुरक्षित साधन उपलब्ध नहीं है अथवा स्कूल में पृथक् टॉयलेट की सुविधा नहीं है। एक उम्र के बाद ऐसी अनेक बालिकाएं पढ़ाई के स्थान पर घर का कामकाज करने लगती है। फलस्वरूप प्राथमिक से उच्चरत माध्यमिक स्तर के बीच बालकों की तुलना में बालिकाओं की स्कूल छोडऩे की दर अधिक है।
बालिकाओं के विकास में एक अन्य बाधा बाल विवाह है। जबकि पिछले 90 वर्ष से इस पर रोक के लिए कानून है तथा 1978 में बालिकाओं कि विवाह हेतु न्यूनतम आयु 18 वर्ष निर्धारित की गई है। एक शोध के अनुसार देश में हर वर्ष लगभग 15 लाख बाल विवाह होते हैं। 2020 के लिए इस संबंध में एनसीआरबी द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 2020 में 785 प्रकरण दर्ज हुए है जो उसके पिछले वर्ष की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक है। परंतु ऐसे भी अनेक प्रकरण होंगे, जिनमें समझाने पर बाल विवाह नहीं हुआ अथवा बाद में चोरी छिपे बाल विवाह हो गए।
एक अन्य समस्या बालश्रम की है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 1 करोड़ से अधिक बाल श्रमिक थे। जिनमें लगभग 45 प्रतिशत बालिकाएं थी। 
बालिका संरक्षण की इन चुनौतियों से निपटने का संकल्प पूर्ण करने के लिए देश में कानून का सख्ती से पालन करने के अलावा एक सामाजिक चेतना लाने एवं बालिकाओं की शिक्षा एवं रोजगार के लिए उचित संसाधन एवं अवसर उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।
शुभकामनाओं सहित....