देश में श्वांस संबंधी बीमारियों से पीडि़त व्यक्तिओं की संख्या जहां 1990  में 2 करोड़ 80 लाख थी, वहीं 2013 में बढ़कर 5 करोड़ 53 लाख हो गई थी। अस्थमा, निमोनिया तथा टीबी जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ती जा रही हैं। धूम्रपान नहीं करने वाले व्यक्तियों एवं युवाओं में भी इस तरह की बीमारियों का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है जिसका प्रमुख कारण बढ़ता वायु प्रदूषण ही है। देश में लगभग 11 प्रतिशत मृत्यु फेंफड़े संबंधी बीमारियों से होती हंै। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में प्रति वर्ष लगभग 70 लाख अकाल मौतें वायु प्रदूषण के कारण होती हंै।  आईसीएमआर की रिपोर्ट के अनुसार अकेले दिल्ली में गत 3 वर्षों में 2 लाख से अधिक श्वांस संबंधी बीमारियों के प्रकरण प्रकाश में आए हैं। एक अनुमान के अनुसार वायु प्रदूषण से 2019 में देश में सकल घरेलु उत्पाद का 1.36 प्रतिशत नुकसान हुआ। 
सर्दी की शुरुआत होते ही देश के अनेक नगरों में वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक तरीके से बढऩे लगता है। इसका हमारे जीवन पर कई तरह से प्रभाव पड़ता है। न केवल श्वांस संबंधी समस्याओं से पीडि़त व्यक्तियों को अनेक परेशानियां आती है परंतु आवागमन पर भी इसका विपरीत असर पड़ता है। उत्तर भारत में तो एक दो महीने के लिए इससे जल-जीवन बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। पराली जाने से लेकर मौसम की अनेक जटिलताओं को इसका कारण बताया जाता है। परंतु, इसके वास्तविक कारणों और संभावित समाधान की ओर न तो कोई उचित ध्यान दिया जाता है न कोई कार्यवाही की जाती है। 
यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि हमारे नगरों में वायु की गुणवत्ता का स्तर लगातार गिर रहा है। लोगों में श्वांस संबंधी बीमारियां बढ़ रही हैं तथा हर वर्ष सर्दी के मौसम में बच्चों, बुजुर्गों एवं श्वांस बीमारियों से पीडि़त व्यक्तियों को स्वास्थ्य संबंधी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। खराब स्वास्थ्य, अकाल मृत्यु और बीमारियो से कार्य बल की उत्पादकता घटती है, स्वास्थ्य खर्च बढ़ता है (जिससे लोग गरीब होते हैं) तथा यह निवेश को हतोत्साहित करता है। इससे आर्थिक विकास धीमा होता है जिसका सकल घरेलू उत्पाद पर नकारात्मतक प्रभाव पड़ता है। 
वायु प्रदूषण के बढऩे का प्रमुख कारण वाहनों के कारण होने वाला प्रदूषण, उद्योगों के कारण होने वाला प्रदूषण, जीवाश्म ईधन का अत्याधिक उपयोग, कृषि संबंधी गतिविधियां, निर्माण गतिविधियां तथा खुले में कचरे का निष्पादन है।  मुख्य रूप से ऊर्जा, सीमेंट, रसायन, रिफायनरी, खनन तथा वेस्ट संबंधी उद्योगों के कारण वायु प्रदूषण होता है। इन उद्योगों से निकलने वाली सल्फर डाई आक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड, ग्रीन हाउस गैसों तथा धुंआ एवं उत्सर्जनों कणों के कारण वायु प्रदूषित होती है। 
देश में सड़कों पर वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। 2010 में यह संख्या लगभग 12 करोड़ थी जो वर्तमान में लगभग 36 करोड़ है तथा 2050 तक बढ़कर 50 करोड़ हो जायेगी। देश में वायु प्रदूषण में लगभग 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा वाहनों के कारण होता है। दिल्ली में यह लगभग 72 प्रतिशत है। बेहतर यातायात प्रबंधन से वाहनों के प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है। दिल्ली में सड़कों पर वाहनों की संख्या कम करने के लिए सम एवं विषम वाहन संख्या वाले वाहन अलग-अलग दिनों सड़कों आने की अनुमति का प्रयोग किया गया, लेकिन यह सफल नहीं रहा। यातायात में आ रहे अवरोधोंं को कम कर, बेहतर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था तथा इलेक्ट्रीक वाहनों के प्रयोग से वायु प्रदूषण कम किया जा सकता है। 
ऊर्जा का उत्पादन (खासकर जीवाश्वम ईंधन के उपयोग से) और उपभोग, वायु प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण का कारण बनता है। ऊर्जा बचाने तथा हरित ऊर्जा के उपयोग से इन पर्यावरणीय समस्याओं में कमी आती है तथा प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे हमें स्वच्छ हवा मिल सकती है। 
उद्योगों से निकल रहे गैसीय उत्सर्जन तथा बहि:स्त्रावह को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए मापदंडों को सख्ती से लागू कर ही उनके कारण हो रहे प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है। उद्योग एवं कृषि में प्रचलित प्रक्रियाओं में सुधार के लिए शोध को बढ़ावा देना होगा, ताकि न्यूनतम प्रदूषण संबंधी प्रक्रियाओं का विकास किया जा सके। 
आम नागरिक, शासन एवं वैज्ञानिकों की सक्रिय पहल ही इस धरती को एक गैस चैम्बर बनने से रोक सकती है तथा एक स्वस्थ जनसमूह के माध्यम से देश को तेजी से विकास की राह पर ले जाया सकेगा। 
शुभकामनाओंं सहित...