परिवार समाज की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है, जो हमें प्रेम, सुरक्षा और पहचान देता है। यह हमें जीवन के नैतिक मूल्यों और संस्कार सिखाता है तथा मुश्किल समय में भावनात्मक सहारा प्रदान करता है। एक मजबूत परिवार ही एक मजबूत समाज का निर्माण करता है।  एक संस्था के रूप में परिवार के टूटने के मुख्य कारणों में आपसी संवाद की कमी, पाश्चात्य संस्कृति का विकृत प्रभाव, स्वार्थ, आर्थिक सोच, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा,  सहनशीलता की कमी, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की चाह, दहेज प्रथा, अंतरजातीय एवं अंतर धार्मिक विवाहों का परिवार में विरोध तथा आपसी संवाद की तुलना में तकनीकी गैजेट्स के प्रति अत्याधिक लगाव शामिल है। रिश्तों को सहेज कर ही परिवारों को बिखरने से रोका जा सकता है। 
पिछले कुछ समय से परिवारिक रिश्तों में हिंसक घटनाओं के अत्याधिक समाचार आ रहे हैं। पुणे में मंगेतर द्वारा युवक की हत्या, शिलाँग में पत्नी द्वारा पति की हत्या, कई स्थानों पर पति द्वारा विवाह के चंद दिनों बाद ही पत्नी की हत्या अथवा पति-पत्नी द्वारा आत्महत्या, बड़ी संख्या में किशोरों द्वारा किये जाने वाले जघन्य अपराध जैसी घटनाएं एक सामाजिक चिंता का विषय हंै। संपत्ति विवाद को परिवारजनों के मध्य हिंसा का कारण बनने के अनेक प्रकरण सामने आए हैं। इन सब घटनाओं को देखते हुए परिवारिक मानवीय संबंधों के बारे में एक समग्र विश्लेषण करने की आवश्यकता है। 
पहले लोग संयुक्त परिवार में रहते थे, परंतु घर से दूर नौकरी करने, भागदौड़ भरी जिंदगी और आधुनिकता की चकाचौंध में संयुक्त परिवार तेजी से टूटकर एकल परिवार में बदल रहे हैं। एकल परिवार व्यवस्था का बच्चों की परवरिश पर असर पड़ा है क्योंकि माता-पिता के कामकाजी होने कारण उन्हें उचित मार्गदर्शन और परिवारिक संस्कार नहीं मिल पाते हैं। परिवारों में बढ़ रही अंदरूनी कलह का बच्चों के व्यक्तित्व विकास पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। शोध के अनुसार परिवारिक कलह में पले बच्चों में अपचारिता की भावना ज्यादा होती है, जिसका नुकसान न केवल उस परिवार को बल्कि संपूर्ण समाज को झेलना पड़ता है। एकल परिवार व्यवस्था में प्राय: बुजुर्गों की उपेक्षा होती है तथा ऐसे परिवार उनके अनुभव तथा मार्गदर्शन से वंचित रह जाते हैं। 
आधुनिकता के इस दौर में अधिकांश माता-पिता भी एक दोहरी मानसिकता के शिकार है। एक तरफ तो वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने, छात्र जीवन में स्वच्छंद जीवन जीने की छूट देते हैं, परंतु साथ ही उनकी निजी जिंदगी के अनेक महत्वपूर्ण फैसले स्वयं लेना चाहते हैं तथा ऐसा करते समय अपनी सामाजिक मान्यताओं और रूढि़वादी सोच को ही प्राथमिकता देते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि बच्चे इस तरह की स्थिति आने पर या तो खुला विद्रोह कर अपनी बात पर टिके रहते हैं अथवा अनेक प्रकरणों में वह माता-पिता की बात को टाल नहीं पाते। इस परिस्थिति में एक विरोधाभासी और दोहरी जिंदगी जीने के दौरान बच्चे कोई अप्रिय फैसला ले लेते  हैं, जो परिवारों के लिए संकट का कारण बन जाता है।  कई बार बच्चे माता-पिता के फैसले मानने में परिवारिक गरिमा के अलावा अपना व्यक्तिगत, आर्थिक एवं व्यवसायिक हित भी देखते हैं। 
व्यक्ति के स्वार्थ एवं आर्थिक महात्वकांक्षाओं के कारण परिवारिक संपत्ति विवाद बढ़ रहे हैं। एकल परिवार होने तथा आपसी संवाद में तकनीकी गैजेट्स के अत्याधिक  उपयोग के कारण उत्पन्न संवादहीनता की स्थिति आपस में विश्वास की कमी मेें परिवर्तित हो जाती है। संवादहीनता के कारण ही संकट के समय परिवारों में सामूहिक सहयोग का अभाव हो जाता है तथा एकल परिवारों के सदस्यों में एक असुरक्षा की भावना बनी रहती है। बढ़ता हुआ मादक पदार्थों का सेवन भी समाज में बढ़ती व्यक्तिगत स्वेच्छाचारिता तथा परिवारों में संवादहीनता एवं टकराव का कारण बनता जा रहा है। 
केवल संयुक्त परिवार व्यवस्था अपनाने से ही इस स्थिति में सुधार संभव नहीं है, परंतु इसके लिए परिवार के सदस्यों/माता-पिता एवं बच्चों के मध्य संवाद बढ़ाने तथा एक ऐसा विश्वास पैदा करने की आवश्यकता है, जिसमें आपसी समस्याओं पर खुले दिमाग से चर्चा हो सके। शिक्षण संस्थानों में विषयों की पढ़ाई के अलावा चरित्र निर्माण तथा नैतिक मूल्य शिक्षा पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। हमारी संस्कृति सदैव से ही 'वसुधैव कुटुम्बकम्Ó का संदेश देती है, जहां रिश्तों को निभाना सिखाया जाता है, तोडऩा नहीं। यदि हम बच्चों को प्रेम, सम्मान और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाएंगे तो न केवल परिवार बल्कि संपूर्ण समाज अधिक सुरक्षित और संस्कारित बनेगा।  
शुभकामनाओं सहित...