की स्थिति के बारे में माहौल काफी बदला है। महिलाओं को आगे बढऩे के ज्यादा मौके मिलने लगे हैं और विभिन्न शासकीय योजनाओं से  महिलाओं का सशक्तिकरण हो रहा है। लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी बढ गई हैं क्योंकि महिलाओं की इस तरक्की से पशु प्रवृत्ति के पुरूषों के अहंकार के आहत होने का परिणाम महिलाओं के विरूद्ध हिंसा के रूप में सामने आता है।  आजादी के 75वें साल में महिला सशक्तिकरण के लिए नवीन संकल्प, इच्छाशक्ति और सोच की आवश्यकता है।

पूरी दुनिया हर साल 8 मार्च को महिला दिवस मनाती है। अपने घर से लेकर देश की तरक्की में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र होगा जहां महिलाओं ने अपना योगदान ना दिया हो। वास्तव में  उनके त्याग और परिश्रम के लिए साल के 365 दिन भी न्यौछावर किए जाएं तो कम हैं। 
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार कोविड-19 महामारी के कारण विषमताएं बढ़ी है। सबसे ज्यादा असर महिलाओं के रोजगार पर पड़ा है तथा पुरुषों की तुलना में उनकी अजीविका खोने की संभावना बढ़ी है।  इस महामारी का सर्वाधिक विनाशकारी असर निर्बल दलित और निर्धन महिलाओं कीआर्थिक स्थिति पर हुआ है। नौकरीपेशा महिलाएं एक ओर 'वर्क फ्रॉम होमÓ के चलते 9 से 10 घंटे अपना व्यवसायिक काम कर रही हैं, वहीं घरेलू मदद के पूर्ण अभाव में ं उन्हें घर-परिवार का भी अधिक ध्यान रखना पड़ रहा है।   संयुक्त राष्ट्र ने कोरोनाकाल में सेवाएं देने वाली महिलाओं और लड़कियों के योगदान को रेखांकित करने के लिए इस वर्ष के महिला दिवस की थीम 'महिला नेतृत्व: कोविड-19 की दुनिया में एक समान भविष्य को प्राप्त करनाÓ रखी है। 
आजादी के 75 साल बाद भी आधी आबादी की संसाधन क्षमता का समुचित उपयोग नहीं होना प्रगति और विकास की राह में बडी बाधा है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं को आर्थिक तौर पर सशक्त बनाने के मामले में दुनिया के 190 देशों में भारत का स्थान 117वां है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में 57 देशों के सर्वेक्षण के मुताबिक 'महिला उद्यमिता सूचकांकÓ में भारत का स्थान 52वां है। 2018 के 'मास्टर सैलरी इन्डेक्सÓ के अनुसार भारत में महिलाओं का औसत वेतन भी पुरुषों की तुलना में 20 प्रतिशत कम है।
महिलाओं की सर्वांगीण उन्नति के लिए हमें एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, उनके व्यवसाय में आर्थिक मदद तथा रोजमर्रा के जीवन में उनकी सुरक्षा के लिए उचित व्यवस्था हो। बालिकाओं की शिक्षा की ओर सर्वाधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। बाल अधिकारों के संरक्षण के राष्ट्रीय आयोग की वर्ष 2018 की रिपोर्ट के अनुसार 15 से 18 वर्ष की लगभग 39 प्रतिशत बालिकाएं स्कूल/कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर घर के काम अथवा अन्य छोटे-मोटे कार्यों में लग जाती हैं। लड़कियों द्वारा शिक्षा छोडऩे का एक कारण  शिक्षण संस्थाओं में उनके लिए प्रथक एवं उचित प्रसाधन सुविधाओं का अभाव होता है। सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार 27 प्रतिशत विद्यालयों में बालक-बालिकाओं के लिए शौचालय उपलब्ध नहीं है तथा 'स्वच्छ विद्यालय अभियानÓ के अंतर्गत बनाए गए 40 प्रतिशत शौचालय या तो नहीं हैं अथवा उपयोग करने योग नहीं हैं।  देश में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की घटनाओं में एक दशक में लगभग 40 प्रतिशत वृद्धि हुई है तथा एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार 2019 में ही देश में प्रतिदिन 88 बलात्कार के केस दर्ज हुए। नारी सुरक्षा के प्रति प्रशासकीय उदासनीता का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2013 में स्थापित 'निर्भया कोषÓ की केवल 36 प्रतिशत राशि का ही उपयोग अभी तक हो सका है। 
स्वामी विवेकानंद के अनुसार 'जो जाति नारियों का सम्मान करना नहीं जानती वह न तो अतीत में उन्नति कर सकी है और न आगे उन्नति कर सकती हैÓ। महिलाओं द्वारा जीवन के हर क्षेत्र में पुरुषों की बराबरी हासिल करने के लिए हमारी सोच एवं नजरिये में आधारभूत सकारात्मक परिवर्तन आवश्यक है तथा हमें अपनी कुत्सित एवं रूढि़वादी मानसिकता से बाहर निकल कर उन्हें सम्मान के साथ शिक्षा, व्यवसाय, नौकरी एवं अन्य सभी प्रकार की बराबरी देनी होगी। 

महिला दिवस की शुभकामनाओं सहित