कामकाजी माताएं...
महिलायें समाज का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। किसी भी राष्ट्र की संस्कृति और नैतिकता का स्तर उसकी महिलाओं की स्थिति से मापा जा सकता है। देश की महिलाओं का सामाजिक दर्जा वहां के सामाजिक परिवेश को दर्शाता है। भारतीय महिलायें अपनी बहूमुखी भूमिकाओं के लिए जानी जाती हंै। वह न सिर्फ परिवार की देख-भाल करती हैं, बल्कि समाज में सक्रिय रूप से भाग भी लेती हैं। बदलते समय में महिलाओं ने अनेक व्यवसायिक क्षेत्र में कार्य कर अपनी प्रतिभा तथा योग्यता का परिचर्य दिया है, पंरतु परिवारिक तथा व्यावसायिक जिम्मेदारियों के दोहरे दबाव ने उनके सामने अनेक चुनौतियां भी प्रस्तुत करी हैं।
अंतर्राष्ट्रीय माता दिवस के रूप में माताओं के प्रति आभार व्यक्त करने की प्रथा बढ़ती जा रही है, जबकि माता का दर्जा इतना बुलंद होता है कि कोई दिन विशेष उसके लिए कोई मायने नहीं रखता। माताएं जीवन भर प्रेम, पोषण, सहयोग और मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास एवं उसकी उलपब्धियों में उसकी माता का ही सर्वाधिक योगदान रहता है। माता की दैनिक दिनचर्या हममें लचीलापन, धैर्य, अनुकूलन क्षमता, नि:स्वार्थता, बिना शर्त प्रेम, भावनात्मक संवेदना, करूणा, सहानभूति और मानवतावादी दृष्टिकोण जैसे गुण विकसित कर एक बेहतर इंसान बनाने में हमारी मदद करती है।
भारत में पारंपरिक लैंगिंक भूमिकाएं इस तरह से संरचित की गई हंै कि महिलाएं घरेलू दायरे तक ही सीमित रहती हंै। इतिहास गवाह है कि महिलाओं की शारीरिक बनावट और बच्चों को जन्म देने की क्षमता को आधार बनाकर उन्हें कमजोर मानकर हमेशा कमतर आंका जाता रहा था। सामाजिक मान्यताओं और परंपराओं ने इन धारणाओं को और भी बलवती किया।पारंपरिक रूप से महिलाएं घरेलू दायरे तक ही सीमित रहती हैं।
भारत में कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत जो 2018 वर्ष में 23 प्रतिशत था अब बढ़कर 42 प्रतिशत हो गया है। इसमें ग्रामीण महिलाओं का रोजगार प्रतिशत 43.8 है जबकि शहरी महिलाओं में 28 प्रतिशत है। महिलाओं का काम काफी हद तक अनौपचारिक तथा श्रमप्रधान है। देश के सकल घरेलु उत्पाद में महिलाओं का योगदान 18 प्रतिशत है तथा लैंगिंक असामनताओं को दूर कर सकल घरेलू उत्पाद 30 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। घरेलू महिलाओं द्वारा किये गये कार्य की कोई आर्थिक गणना नहीं है परंतु यह सकल घरेलू उत्पाद में 24 से 28 प्रतिशत हो सकता है।
तकनीकी क्रांति ने महिलाओं की स्थिति को बदला है। औद्यौगीकरण, परिवार नियोजन और मशीनों के इस्तेमाल ने और ज्यादा महिलाओं को घर से बाहर निकलकर काम करने के लिए प्रेरित किया तथा आज वह अपनी मातृत्व संबंधी जिम्मेदारियों के साथ प्राय: सभी क्षेत्रों में पुरुषों के साथ बराबर की जिम्मेदारी निभा रही हैं। कामकाजी माताएं न केवल अन्य महिलाओं के लिए बल्कि अपने बच्चों और आने वाली पीढिय़ों के लिए भी आदर्श होती हैं।
इस बदले हुए परिदृश्य में कामकाजी महिलाओं के सामने नई चुनौतियां आई हैं। कामकाजी माताओं के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियां कार्य और परिवार के बीच संतुलन, अपनी कमाई पर नियंत्रण का अभाव, कार्यस्थल पर भेदभाव, लैंगिंक वेतन असामनता, कार्योजित महिलाओं की सुरक्ष और सम्मान की समस्या, कार्यस्थल पर जेंडर आधारित भेदभाव तथा यौन उत्पीडऩ, परिवारों के सहयोग का अभाव, मातृत्व छुट्टी की अपर्याप्तता हैं। परिवार की देखभाल करना और घर की जिम्मेदारियों के साथ-साथ कैरियर की प्रतिबद्धताओं और समय सीमाओं को पूरा करना उनके ऊपर बहुत दबाव डालता है तथा उनकी बहुत अधिक ऊर्जा काम और घर के बीच संतुलन बनाए रखने के प्रयास में खर्च हो जाती है। अपने बच्चों के लिए पर्याप्त समय न निकाल पाने के कारण वह प्राय: अपराध बोध से ग्रस्त रहती हैं। बीमार बच्चें को घर पर छोडऩा, बच्चों के साथ गुणवत्ता पूर्ण समय बिताने का अभाव तथा दोहरी आवश्यकताओं के कारण खुद की देखभाल में लापरवाही, कामकाजी महिलाओं के मानसिक तनाव में वृद्धि करती है तथा कई बार स्वास्थ्य समस्याएं भी पैदा करती है।
आवश्यकता है कि समाज कामकाजी महिलाओं के बारे नजरिया तथा व्यवस्था बदले तथा काम के लचीले तरीके अपनाए जाएं जिनमें कार्य के समुचित घंटे, बच्चों की देखभाल की सुविधा, बेहतर छुट्टी के विकल्प तथा घर से काम करने की सुविधा शामिल हो सकती हैं, ताकि कामकाजी महिलाएं अपनी दोहरी जिम्मेदारी ठीक से निभाकर समाज के विकास में अपना पूरा योगदान दे सकें।
शुभकामनाओं सहित....


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