आओ अंधकार दूर करें...
मानव जीवन में त्यौहारों का विशेष महत्व है। त्यौहार न केवल हमें हमारी संस्कृति से जोड़कर रखते हैं बल्कि वह समाज के अन्य लोगों से हमारे संबंधों को प्रगाढ़ भी करते हैं। यह हमें खुशी व आनंद देने के साथ समुदायिक जीवन में सौहाद्र्र तथा प्र्रेम बढ़ाने का संदेश भी देते हैं। त्यौहार हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। त्यौहारों पर हम दूसरों के साथ अपनी खुशियां बांटकर उन्हें अपने जीवन का हिस्सा बना लेते हैं। त्यौहार का असली मतलब है समाज में छोटे-बड़े का भेद भूलकर एक हो जाना तथा दूसरे की खुशी का साधन बनना। त्यौहारों के संबंध में हमारी यह नजरिया है न केवल हमें विशेष आनंद देगा, बल्कि अन्य व्यक्तिओं में भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार करेगा।
विजयादशमी एवं दीपावली की हार्दिक शुभकामना...
इस वर्ष यह माह त्यौहारों की दृष्टि से अत्याधिक महत्वपूर्ण है। माह की शुरुआत शक्ति पूजा के समापन तथा असत्य पर सत्य की जीत के त्यौहार से हुई तथा माह के अंतिम दिनों में अंधकार को दूर करने का दीपोत्सव मनाया जा रहा है।
विजयादशमी का त्यौहार हमें बुराई पर अच्छाई की जीत के बारे में जागृत करता है। यह अज्ञान पर ज्ञान की विजय, समृद्धि और सुख-शांति का भी प्रतीक है। वास्तव में रावण अहंकार, हिंसा, अत्याचार तथा लोभ जैसी तामसी प्रवृत्तियों का प्रतीक है। इन प्रवृत्तियों का नाश कर ही समरसता, न्यायपूर्ण तथा समानता से परिपूर्ण राम राज्य वाले समाज की रचना की जा सकती है। रावण का दहन केवल एक पुतले के दहन तक सीमित नहीं रह कर वास्तव में हमारी आंतरिक तथा बाहरी उन सभी बुराईयों के शमन का प्रतीक बनना चाहिए जो हमारे आत्मिक तथा सामाजिक विकास में बाधक हंै।
दीपावली पर जलाये गए दीपक उन सभी तरह के अंधकारों, जो हमारे जीवन और समाज को जकडऩे का प्रयास करते रहते हैं, के विरुद्ध हमारे संकल्प को दर्शाते हंै। अपने घर की सफाई कर एवं दीपक जलाकर हम उसे साफ एवं प्रकाशमय कर लेते हैं, परंतु त्यौहार का असली मकसद तब होगा जब हम अपने मन के भीतर बैठें हुए सभी तरह के भेदभाव, दुर्भावनाओं एवं बुरी प्रवृत्तियों को निकालकर दूर कर दें तथा समाज में व्याप्त कुरीतियां, वैमनस्य, अन्याय एवं गरीबी के अंधेरे को दूर कर दें।
अभी भी हमारे समाज की सोच रूढि़वादी है तथा उसमें अनेक कुरीतियां है, जिनका सर्वाधिक दुुष्प्रभाव समाज के कमजोर वर्गों विशेषकर महिलाओं एवं बालिकाओं पर पड़ता है। पिछले समयाओं में इतना विकास होने के तथा साक्षरता दर बढऩे के बावजूद देश में बालिकाओं एवं महिलाओं का जीवन अत्यंत चुनौतीपूर्ण एवं संघर्ष से भरा है। इनके विरुद्ध हिंसा गर्भ से ही कन्या भू्रण हत्या के रूप में शुरू हो जाती है तथा जन्म के उपरांत कुपोषण, अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा में असुविधायें, रोजगार की असमानतायें, वेतन विसंगतियां, शारीरिक एवं यौन हिंसा तथा राजनैतिक प्रतिनिधित्व की कमी जैसी समस्याएं उन्हें अभी भी दोयम दर्जे का नागरिक बनने के लिए मजबूर करती हैं। इसी तरह समाज के अन्य कमजोर वर्गों को अभी भी ताकतवर वर्ग की भेदभाव पूर्ण प्रवृत्तियों का शिकार बनना पड़ता है। छुआछुत जैसी सामाजिक कुरीतियां अभी भी विद्यमान है। सांप्रदायिकता, जातीय एवं धार्मिक भेदभाव तथा भ्रष्टाचार समाज एवं व्यवस्था को कमजोर करता जा रहा है। इन सब बुराईयों को समाप्त करने वाला दीपक जलाकर ही हम एक सच्चे राम राज्य की स्थापना कर सकते हैं। दीपावली पर हमें इसी संकल्प का दीपक जलाना होगा।
महात्मा बुद्ध ने कहा था 'अप्प दीपो भवÓ, अर्थात अपना दीपक (प्रकाश) स्वयं बनो। अर्थात किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर रहने के वजह स्वयं के अंतज्ञान और विवेक से सत्य को समझना चाहिए। अत:, इतने बड़े देश में इन सामाजिक अंधकारों को दूर करने के लिए प्रत्येक नागरिक को इस बारे में स्वप्रेरणा से प्रयास करने होंगे।
एक बार पुन: विजयादशमी एवं ज्योतिपर्व की
हार्दिक शुभकामनाओं सहित...


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