लोकतंत्र का मतलब है प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार तथा शासन चलाने में बराबरी की सहभागिता। सफल लोकतंत्र के लिए मजबूत शासक नहीं बल्कि मजबूत संस्थाएं आवश्यक होती हैं जो लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षण कर सकें तथा लोकतंत्र पर आने वाले किसी भी खतरे से सुदृढ़तापूर्वक निपट सकें। उनकी प्रतिबद्धता लोकतांत्रिक मूल्यों से हो न कि शासकों से। हाल ही में चुनाव को लेकर अमेरिका में लोकतांत्रिक व्यवस्था को दी गई चुनौती को वहां की विभिन्न संस्थाओं ने ही सफलता पूर्वक विफलकर अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को अक्षुण्ण रखा है।

71 वर्ष पूर्व हमने अपना संविधान, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुता सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के उद्देश्य से आत्मार्पित किया था। हमारा उद्देश्य था, समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय दिलाना; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करना तथा व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाना। गणतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था में जनता ही अंतिम सम्प्रभु होती है तथा राज्य प्रमुख निर्वाचित होता है न कि वंशानुगत।
हमने आजादी के तत्काल बाद सभी नागरिकों को सरकार बनाने में सहभागिता का अधिकार दिया है जो कि अनेक पाश्चात्य लोकतंत्रों ने भी अपनी आजादी के लंबे अंतराल के बाद दिया। सदियों से उपेक्षित समाज के वर्गों एवं महिलाओं का सशक्तिकरण हमारे संवैधानिक उद्देश्यों का ही फल है। पश्चिमी देशों की तमाम आशंकाओं और अपनी अनेक कमियों के बावजूद हम आज अपने लोकतंत्र एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने में सफल हुए है। 
ऐसा नहीं है कि सब कुछ ठीक है तथा हम चैन से बैठ सकते हैं। हमने टेक्नालॉजी एवं आधारभूत संरचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। परंतु अभी भी मानव संसाधन विकास सूचकांक के क्षेत्र में हमारी स्थिति सुखद नहीं है। यूएनडीपी द्वारा 2020 में जारी रिपोर्ट के अनुसार मानव संसाधन विकास सूचकांक की सूची में 189 देशों में भारत का स्थान 131वां है। आज भी हमारी शिक्षा एवं स्वास्थ सेवा का आधारभूत ढांचा स्तरीय नहीं कहा जा सकता है। हमारे युवा देश के बाहर जा कर तो उल्लेखनीय उपलब्धि प्राप्त करते हैं, परंतु देश में नहीं। यह हमारी व्यवस्था की किसी कमजोरी की ओर ही इशारा करता है।
आजादी के 74 वर्ष बाद भी अनेक क्षेत्रों में अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हम अपना विशिष्ट स्थान नहीं बना पाए हैं। संख्यात्मक प्रगति की होड़  में हम गुणात्मकता को प्राय: भूल गए है। कई बार ऐसा लगता है कि लोकतंत्र पर भीड़तंत्र हावी हो रहा है। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में बढ़ती असष्हिणुता देश में बंधुत्व की भावना को कमजोर कर रही है। व्यक्तिगत/ राजनैतिक स्वार्थों के चलते संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित मानवीय मूल्य प्राय: भुला दिए जा रहे है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में दोहरे मापदंडों ने व्यक्ति तथा समाज की विश्वसनीयता को गिराया है। भावनात्मक मुद्दों पर बिना परीक्षण किए एवं अपनी तार्किक क्षमता को तिलांजलि देकर हम असंयमित एवं  उद्वेलित हो जाते हैं।  लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने वाली कई संस्थाओं का ढांचा कमजोर हो रहा है तथा उनके प्रति आम जन का विश्वास कम हो रहा है। 
आजादी पाने तथा लोकतंत्र की स्थापना में देश के हर नागरिक का त्याग और योगदान था। इस व्यवस्था को बनाए रखना हमारा सबका कर्तव्य है। हमें व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में शुचिता एवं पारदर्शिता को अपना आर्दश बनाना होगा। किसी व्यवस्था के सुचारू रूप से चलाने तथा उसमें विकृतियां रोकने के लिए सही फीडबैक आवश्यक है। इसके लिए जरूरी है कि बिना किसी पूर्वागृह के, व्यवस्था से सही मुद्दों पर सवाल पूछें जाए।  तभी हम आज से 71 वर्ष पूर्व अपने स्वयं के साथ किए गए सुदृढ़ गणतंत्र के वायदे को पूरा कर सकेंगे। 
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं सहित