विकास के इस दौर में सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरण संकट की है और पर्यावरण को संरक्षित करना सबसे बड़ी आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन 21वीं सदी की सबसे जटिल समस्याओं में से एक है। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण विनाश का आपदाओं से सीधा संबंध है। पर्यावरण का संरक्षण आज हमारी सबसे बड़ी आवश्यकताओं में से एक है। आज इस बात की पहले से अधिक जरूरत है कि विकास की प्रक्रिया को इस तरह से संशोधित किया जाये कि मनुष्य को सुख-सुविधा उपलब्ध कराने के साथ पर्यावरण का संरक्षण होता रहे। इन चुनौतियों से कोई देश अकेले नहीं निपट सकता। इस संबंध में राजनैतिक सोच तथा अपनी संर्कीण विचारधारा से अलग होकर विश्वस्तरीय सामूहिक प्रयास ही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। 

सुखी, शांत और आपदा रहित जीवन की यह पहली शर्त है कि हम उस प्रकृति और पर्यावरण को संरक्षित रखेंं जिसने अपने अनमोल खजाने से मानव जीवन को न सिर्फ सुखमय बनाया है और हमें सिर्फ दिया है। हमसे कुछ लिया नहीं है। विश्व व्यापी पर्यावरण संतुलन की समस्या के लिए प्रकृति की उपेक्षा तथा उसका अविवेकपूर्ण दोहन कर किया गया अंसतुलित विकास ही जिम्मेदार है। हम पंचतत्वों वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी और आकाश के बीच सहअस्तित्व और संतुलन की पूंजी को खो चुके हैं। इन पंचतत्वों के परिवर्तन के कारण ही प्राकृतिक घटनाएं बढ़ रही हंै और प्रकृति ने हम पर पलटवार करना शुरू कर दिया है। विकास की इस दौड़ में सबसे अधिक क्षति  जंगलों की हुई है। पिछले 15 वर्षों में चक्रवात, बाढ़, सूखा, अतिवृष्टि, बर्फीलें तूफान, गर्मी और शीतलहर की उग्रता काफी बढ़ रही है।
औद्योगीकरण व मशीनीकरण की दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का पर्यावरण प्रदूषण में योगदान सबसे बड़ी चुनौती है। पृथ्वी का तापमान एक ऐसे नाजुक मोड़  पर पहुंच चुका है जिसका बदलता रूप पृथ्वी के विनाश का कारण बन सकता है। विश्व के लगभग सभी हिमग्लेशियरों का पिघलना तेज हो गया है। यदि यही रूझान रहा तो धरती के तापमान में लगातार वृद्धि होगी, जल संकट पैदा होगा, समुद्रीय जल स्तर बढ़ेगा और समुद्रीय व भूमि पारिस्थितिक तंत्रों और मानव जीवन को खतरा पैदा हो जायेगा। 
विकास के इस दौर में वर्तमान में एआई के विकास और उपयोग की ओर सभी के प्रयास जारी हंै। एआई के माध्यम से जहां पर्यावरण की निगरानी करने, वन संरक्षण, ऊर्जा दक्षता में मदद, मौसम का सटीक पूर्वानुमान करने, खेती में कीट नाशक और पानी की खपत को अनुकुलित बनाने, प्रदूषण नियंत्रण में हवा की गुणवत्ता की निगरानी, औद्योगिक प्रदूषण की पहचान, जंगलों की आग को समय से पहले पहचनना और मानव और वन्य जीवों के बीच संघर्ष को कम करने में मदद मिलेगी। वहीं दूसरी ओर इसके विकास, प्रशिक्षण और उपयोग में होने वाली ऊर्जा और पानी की खपत तथा उत्पन्न होने वाले ई-कचरा द्वारा पर्यावरण को होने वाला नुकसान एक बड़ी चुनौती है। आवश्यकता है पर्यावरण की मदद करने वाले एक ग्रीन एआई को विकसित करने की, जिसमें ऊर्जा कुशल डाटा केंद्रों और पुर्नचक्रण प्रक्रियाओं का उपयोग हो। 
पर्यावरण परिवर्तन एक सामाजिक न्याय का मुद भी है। इसके दुष्परिणाम प्राय: कुछ समूहों के लिए दूसरों की तुलना में अधिक  गंभीर होते हैं। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर लोगों को प्रदूषण और संसाधनों की कमी, भीषण मौसम संबंधी घटनाओं और अन्य पर्यावरणीय समस्याओं से नकारात्मक रूप से प्रभावित होने की अधिक संभावना होती है।
हमारे देश में भी वायु प्रदूषण, कमजोर अपशिष्ट प्रबंधन, बढ़ रही पानी की कमी, गिरता भू-जल स्तर, जल प्रदूषण, वनों की गुणवत्ता में कमी, वन संरक्षण के प्रति लापरवाही, जैवविविधिता को नुकसान, भूमि का क्षरण जैसी समस्याएं बढ़ती जा रही है। बढ़ी हुई आबादी की आवश्यकताओं को देखते हुए विकास की तेज दर की आवश्यकता, इन समस्याओं को बढ़ाती जा रही है। पर्वतीय क्षेत्रों में आंधधुंध विकास तथा खनन वहां के पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुंचा रहा है, जिसका प्रभाव संपूर्ण देश की जलवायु पर भी पड़ रहा है। 
पर्यावरण संरक्षण में हर व्यक्ति को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। हमें उत्पादन और खपत के तरीकों पर ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे कार्बन उत्सर्जन में कमी लाई जा सके। पर्यावरण संरक्षण समन्वित विकास के लिए नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग, वृक्षारोपण, अपशिष्ट प्रबंधन, नियामक उपाय और जनता में पर्यावरण संरक्षण के प्रति चेतना और शिक्षा का प्रसार आवश्यक है। पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों ने विकास को सदैव गति प्रदान की है और इसलिए हमारी भी जिम्मेदारी बनती है कि आने वाली पीढिय़ों के लिए हम एक सुंदर और जीने योग्य धरती छोड़कर जायें।
शुभकामनाओं सहित....

- गांधी मीरा सिंह