विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी में हुई असीमित प्रगति के कारण मानव द्वारा प्रकृति पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की प्रक्रिया में  प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया है। विकास चाहे जितनी ऊंचाई प्राप्त करे, वह मानव जीवन का विकल्प नहीं हो सकता।  प्रकृति और मानव के बीच संतुलन एवं सुरक्षित जीवन के लिए आवश्यक है कि प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग में कम उपयोग करना, पुनरावृत्ति करना तथा पुन: उपयोग के सिद्धांत का पालन किया जाए।


मानव के चारों तरफ प्राकृतिक आवरण या परिवेश जैसे वायु, जल, मिट्टी, वनस्पतियां, जीव-जंतु आदि पर्यावरण के घटक है। वर्तमान में विकास की अंधा-धुंध दौड़ में हमारा प्राकृतिक परिवेश खतरे में है। यह मानव सभ्यता पर आसन्न ऐसा खतरा है जो एक दिन पूरी सभ्यता को लील सकता है। 
ओद्यौगिक क्रांति के कारण पैदा हुई विकास की दौड़ ने पर्यावरण को अतुलनीय क्षति पहुंचाई है। बड़ी-बड़ी नदी परियोजनाएं, जंगल काटना, जीवाश्म ईधन का अधिकाधिक उपयोग, भूगर्भीय जल का दोहन, ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन पर्यावरण को लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं। प्लास्टिक और पॉलीथिन के बढ़ते उपयोग के कारण प्रतिवर्ष लगभग 80 लाख टन प्लास्टिक एवं पॉलीथिन का कचरा समुद्रों में जा रहा है। 1970 से 2016 के बीच विश्व में जीव-जंतुओं की संख्या में 67 प्रतिशत कमी आई है।  वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि के कारण खाद् उत्पादन का संकट बढ़ा है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं तथा समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। बढ़ते बंजर इलाके, फैलते रेगिस्तान, कटते जंगल, लुप्त होते पेड़-पौधे और जीव-जंतु, प्रदूषित पानी, कस्बों एवं शहरों पर गहराती गंदी हवा और हर वर्ष बढ़ते बाढ़ एवं सूखे के प्रकोप मानव एवं पर्यावरण के बीच बढ़ते असंतुलन का ही परिणाम हैं। 
भारत जैसे विकासशील देश में बढ़ती जनसंख्या और बेेरोजगारी भी पर्यावरण प्रदूषण में बड़ा योगदान देते हैं। 'झूम खेतीÓ के कारण वनों का कटान एवं ईंधन के रूप में लकड़ी का उपयोग जंगलों को अपूरणीय क्षति पहुंचा रहे हैं। पिछले 10 वर्षों में हालांकि वन क्षेत्र में मामूली वृद्धि हुई है, परंतु वनों की गुणवत्ता कम हुई है। पूर्वात्तर के 6 राज्यों में वन क्षेत्र 10 प्रतिशत कम हुआ है। ओद्यौगिक कचरे के कारण अनेक नदियां अत्यंत प्रदूषित हो गई हैं। लगातार दोहन के कारण भू-जल स्तर में चिंताजनक गिरावट आई है। मानसून में लगातार परिवर्तन एवं बढ़ती हुई बीमारियां, यह सभी पर्यावरण क्षति का ही दुष्परिणाम है।
 समावेशी और सतत् विकास के लिए पर्यावरण एवं जैविविधिता संरक्षण के प्रति हमारा दायित्व अपरिहार्य है। केवल कानूनी प्रावधानों से यह संभव नहीं है। संम्पूर्ण समाज को इस बारे में जागरूक करना होगा। इसके लिए जरूरी है कि हम सब जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण एवं ध्वनि प्रदूषण को कम से कम करें तथा पेड़-पौधे एवं जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता रखते हुए अपनी जीवनशैली अपनाएं। आवश्यकता है कि हम वृक्षारोपण करें, प्लॉस्टिक एवं पॉलीथिन का कम से कम उपयोग करें, पेट्रोल एवं डीजल के उपयोग में मितव्ययिता बरतें, औद्योगिक वेस्ट का सख्ती से नियमन करें, सौर एवं अन्य वैकल्पिक ऊर्जाओं का ज्यादा से ज्यादा दोहन करें, कृषि के तोर तरीखों में बदलाव कर पानी के उपयोग को कम करें, वॉटर हार्वेस्टिंग पर ध्यान दें तथा विकास कार्यों के संबंध में पर्यावरण संरक्षण संबंधी प्रावधानों का सख्ती से प्रवर्तन करें। अन्यथा जितनी तेजी से मानव सभ्यता का विकास हुआ है उतनी ही तेजी से मानव जीवन की समाप्ति हो जाएगी। 
 शुभकामनाएं सहित.....