शिक्षा व्यक्ति की उन सभी भीतरी शक्तियों का विकास है जिससे वह वातावरण पर नियंत्रण रखकर समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर सके। शिक्षा समाज की एक पीढ़ी द्वारा अपने से निचली पीढ़ी को अपने ज्ञान के हस्तांतरण का प्रयास है। इससे समाज एवं व्यक्ति दोनों निरंतर विकास करते हैं। यह एक ऐसा शक्तिशाली हथियार है जिसका उपयोग दुनिया बदलने में किया जा सकता है।  शिक्षा में ज्ञान, उचित आचरण, तकनीकी दक्षता और विद्या प्राप्ति आदि समाविष्ट है। 


आप सबके सहयोग एवं शुभकामनाओं से 'समीराÓ अपने  नियमित मासिक प्रकाशन के 16 वर्ष पूर्ण कर 17वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। आशा है कि भविष्य में भी आप सब का सहयोग एवं स्नेह इसी तरह 'समीराÓ को मिलता रहेगा।
हमारे देश की लगभग 50 प्रतिशत आबादी 5 से 24 आयु वर्ग की है। इस आबादी के बौद्धिक एवं कौशल विकास के बिना आने वाले समय में देश की प्रगति एवं विकास की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इसके लिए एक सुदृढ़ शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है, जो न केवल इनके जीवन में रोजगार का साधन उपलब्ध कराए साथ ही देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनकी सक्रिय भागीदारी भी सुनिश्चित करें। 
हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था प्रति वर्ष बड़ी संख्या में डिग्रीधारी एवं साक्षर युवाओं को समाज को वापस देती तो है, परंतु उनका कोई भी योगदान हमारी सामाजिक व्यवस्था में नहीं हो पाता। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह परीक्षा केन्द्रित है तथा विद्यार्थियों/ शिक्षकों का पूरा ध्यान अधिक से अधिक अंक प्राप्त करने पर रहता है। ज्ञानार्जन एवं कौशल विकास की ओर समुचित ध्यान नहीं होने के कारण रोजगार उपलब्ध कराने में शिक्षा व्यवस्था का अत्यंत मामूली योगदान रहता है। परिणाम स्वरूप कुंठाग्रस्त युवा समाज के लिए परेशानी ही बनते हैं।
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में अनेक बच्चे शिक्षा से वंचित रहते हैं। अभी भी प्राथमिक शिक्षा में स्कूल छोडऩे वालों की संख्या 1.50 प्रतिशत, माध्यमिक स्कूलों 8 प्रतिशत तथा हायर सेकेंडरी स्तर पर 28 प्रतिशत है। स्कूलों की खराब अधोसंरचना तथा समूचित रूप से प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव समस्या को और जटिल बना रहा है। विभिन्न सरकारों ने शिक्षा की गुणवत्ता पर बहुत कम ध्यान दिया है तथा सरकारी स्कूलों की स्थिति काफी खराब है। उनकी संख्या में भी पिछले 4 वर्षों में लगभग 51 हजार की कमी आई है। शिक्षकों के बड़ी संख्या में पद रिक्त है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता की स्थिति अत्यंत खराब है, जबकि सरकारी शिक्षक निजी स्कूलों की तुलना में कहीं बेहतर वेतन प्राप्त करते हैं। यह चिंता का विषय है कि विश्व के 100 सर्वेश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों/ महाविद्यालयों में देश का कोई भी संस्थान शामिल नहीं है तथा शैक्षणिक एवं शोध संस्थानों की संख्या को देखते हुए विश्व स्तर पर हमारा योगदान प्राय: नगण्य है। 
युवाओं में शिक्षा का अभाव उनके अपराधीकरण की ओर ले जाता है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2019 में जेलों में बंद 28 प्रतिशत कैदी अशिक्षित तथा 42 प्रतिशत 10वीं से कम पढ़े हुए थे। बाल अपराधियों में लगभग एक तिहाई कक्षा 5वीं तक ही पढ़े होते हैं। कोरोना महामारी ने शिक्षा व्यवस्था को और भी प्रभावित किया है। उचित अधोसंरचना के अभाव एवं परिवारों की गरीबी के कारण सरकारी स्कूलों के अधिकांश बच्चे ऑनलाईन कक्षाओं से लाभ नहीं उठा पाए। देश में ऑनलाईन शिक्षा देने में प्रशिक्षित अध्यापकों की अत्याधिक कमी है।
नई शिक्षा में शिक्षा पर व्यय जीडीपी का 6 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है जो कि वर्तमान में केवल 4.43 प्रतिशत है। अमेरिका जैसा देश जीडीपी 7 प्रतिशत खर्च करता है। यह अनुभव रहा है कि शिक्षा नीतियों में केवल पाठक्रमों की समयसीमा एवं पाठक्रमों के पुनरीक्षण तक ही कार्य होता है तथा गुणवत्ता बढ़ाने की कार्यवाही प्रभावी नहीं रहती।
समय की मांग शिक्षा व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण अंग शिक्षा की गुणवत्ता सुधार पर विशेष ध्यान देने की है। देश की आम जनता को अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए सरकार को शिक्षण संस्थानों में अधोसंरचना विकास, उचित संख्या में शिक्षकों की भर्ती तथा शिक्षकों की गुणवत्ता सुधारने के लिए लगातार प्रयासों की आवश्यकता होगी। 
शुभकामना सहित....