समभाव और सद्भाव सदैव से भारतीय संस्कृति के मूल आधार रहे है। हमारे पौराणिक आदर्शों में श्रीराम स्वयं सामाजिक समरसता, कमजोरों के उत्थान एवं आदर्शों के लिए सब कुछ छोड देने वाले व्यक्तित्व के रूप में पूजे जाते हैं।  भारत में होने वाले अहिंसक प्रयोगों से सारी दुनिया प्रेरणा पाती रही है और अब उन प्रयोगों की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। तथागत बुद्ध द्वारा प्रतिपादित अहिंसा का सार है करूणा। गीता के अहिंसा सिद्धांत की फलश्रुति है अनासक्ति। ईसा मसीह  ने जिस विचार को प्रतिष्ठापित  किया  वह है प्रेम और मैत्री। इसी प्रकार मोहम्मद साहब के  उपदेशों का सार है भाई-चारा।

आज देश-विदेश में चारो ओर हिंसा, युद्ध एवं आक्रामकता का वातावरण बना हुआ है। हिंसा चाहे शारीरिक हो या शाब्दिक अथवा विचारों की, लगता है हर शक्तिशाली व्यक्ति अपना प्रभुत्व जमाने का प्रयास कर रहा है। असरदार लोग कमजोर लोगों पर हावी हो रहे है तथा अपनी सत्ता को चुनौती देने वालों के खिलाफ हिंसक तरीके अपना कर उन्हें दबाने की कोशिश कर रहे हैं। जातीय हिंसा एवं यौन हिंसा भी इसी मनोवृत्ति का एक रूप है। सर्वाधिक चिंता का विषय है कि इस तरह की हिंसा को लेकर समाज दो-फाड़ होता जा रहा है। अब हम पाशविक मनोवृत्ति के बचाव अथवा उसे न्याय संगत बताने वालों के एक बड़े तबके तथा हिंसा के पक्ष में कुर्तक करने के वालों को भी देख रहे है। प्राय: हिंसा-पीडि़त की विश्वसनीयता पर संदेह भरे सवाल उठाए जाते हैं। वॉटस-एप, फेसबुक एवं अन्य सोशल मीडिया वैचारिक हिंसा तथा ऐसे लोगों के विचारों से भरे पड़ें है। वीडियो गेम के माध्यम से भी बच्चों एवं किशोरों में हिंसक होने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। तकनीक के अधकचरे इस्तेमाल ने एक अधकचरी और पढ़ी लिखी हिंसा का जन्म दिया है।
वैचारिक स्वतंत्रता की आड में कुछ भी कह देना आम होता जा रहा है। समाचार-पत्र तथा टीवी चैनल भी इस बुराई से बच नहीं पाए हैं तथा कई बार वैचारिक हिंसा बढ़ाने एवं समाज को विभाजित करने में बड़ी भूमिका निभा रहे है। लोकतंत्रिक व्यवस्था जिसमें संख्या महत्वपूर्ण होती है, परंतु बहुमत से अल्पमत के विचारों एवं भावनाओं की इज्जत रखने की अपेक्षा भी होती है, में बहुमत की शक्ति को अल्पमत की अनदेखी करने का माध्यम बनाया जा रहा है। संख्या बल का स्थान बाहुबल ने ले लिया है।  
बॉलीवुड को नशा मुक्त बनाने के अभियान में मात्र महिला अभिनेत्रियों से पूछताछ और उनके विरुद्ध कार्यवाही भी यौन हिंसा एवं नारी सम्मान के प्रति असष्हिुणता का परिचायक है। नारी के प्रति हो रही हिंसा के बारे में व्यवस्था का रिस्पांस एक पितृ- सत्तात्मक समाज का स्वाभाविक नमूना है। कई बार ऐसा लगता है कि नारी समानता को लेकर महिलाओं के प्रयासों की सफलता की यह प्रतिक्रिया है कि उनके प्रति हो रही हिंसा में वृद्धि हो रही है। ताकि उन्हें यह संदेश दिया जा सके कि समानता की राह पर चलना निरापद नहीं है। जातीय हिंसा का मूल कारण भी इसी प्रकार का प्रतीत होता है। 
साध्य और साधन दोनों की पवित्रता का ध्यान बिलकुल नहीं रखा जा रहा। अहिंसा के पुजारी की 151वीं जयंती के समय यह परिदृश्य काफी अशांत करने वाला है। हिंसक प्रवृत्तियां एवं मानसिकता जब प्रबल होती है तो अहिंसा का मूल्य स्वयं बढ़ जाता है। ऐसे समय में गांधी विचार एवं गांधी की दार्शनिकता पथ प्रदर्शक बन सकते हैं। गांधी आज से 100 साल पहले भी प्रासंगिक थे और आज भी प्रासंगिक हैं। अफसोस यह है कि गांधी में विश्वास रखने वाले तथा उन्हें पथ प्रदर्शक मानने वाले व्यक्तियों की संख्या कम होती जा रही है। गांधी विचारों के विरोध को कई बार गांधी के व्यक्तिगत विरोध में बदल दिया जाता है। जबकि गांधी स्वयं कहते थे कि 'बुराई से लड़ो, बुरा करने वाले से नहीं।Ó गांधी ने कहा था 'जब हम दूसरे पर अक्रमण कर रहे होते तो हम भूल जाते है कि सबसे बड़ा शत्रु हमारे भीतर बैठा हैÓ। 
आवश्यकता है कि समाज एकजुट होकर हिंसा का परित्याग करने का संकल्प ले तथा दूसरों के विचारों एवं व्यक्तित्व का सम्मान करने की मनोवृत्ति अपनाए। 

नवदुर्गा एवं विजयदशमी की शुभकामना सहित