समाज में संवेदनहीनता, हिंसा, पाशविकता और आक्रामकता की  प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। जैसे-जैसे समाज का शहरीकरण हो रहा है, वैसे-वैसे लोग संवेदनहीन व विवेक शून्य होते जा रहे हैं जो सामाजिक दायित्वबोध और मानवता के समाप्त होने का संकेत है। हम आधुनिकता के चक्रव्यूह में फंसकर अपने रिश्तों, मर्यादाओं और दायित्वों को भूल रहे हंै। नि:संदेह मानव सभ्यता के विकास में प्रौद्योगिकी की अहम भूमिका है, परंतु मनुष्यता का सफर हमने मानवीय मूल्यों के सहारे ही तय किया है।  इसलिए जब समाज इन मूल्यों से दूर जाता दिखता है तो सबको चिंता होना चाहिए। कोई भी समाज सिर्फ तंत्र और सरकार के भरोसे नहीं बढ़ सकता है। हमें अपने कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए। 
भारतीय सामाजिक व्यवस्था में प्राचीनकाल से ही संवेदना एवं संवेदनशीलता का विशेष महत्व रहा है। 'वसुधैव कुटुम्बकम्Ó की भावना के अनुरूप मानव ही नहीं प्रत्येक जीव-जंतु के प्रति भारतीय समाज सदैव से संवेदनशील था। परंतु, पिछले कुछ समय से ऐसे अनेक समाचार आ रहे हैं और सोशल मीडिया में ऐसे मैसेज होते हैं जिनमें दुर्घटना में घायल किसी व्यक्ति का वीडियो होता है अथवा किसी व्यक्ति के साथ मारपीट जैसी गंभीर घटना हो रही होती है, परंतु कई व्यक्ति प्रभावित व्यक्ति की मदद करने के स्थान पर इन घटनाओं का वीडियो बनाने में व्यस्त रहते हैं। भीड़-भाड़ की जगहों पर जब असामाजिक तत्व महिलाओं के साथ बदसलूकी करते हैं तो उस समय अधिकांश लोग प्राय: चुप रहते हैं। कई बार सरेआम चाकू-छुरी या पिस्तौल चलाकर किसी की हत्या कर उसका वीडियो बनाकर अथवा जानवरों के साथ क्रूरता करने वाले वीडियो बनाकर उनको वायरल किया जाता है। वीडियो व सोशल मीडिया के जरिए किसी शोषण या कमी को उजागर करना सराहनीय कार्य है, परंतु किसी की तकलीफ का तमाशा बनाना नि:संदेह अनैतिक तथा आपराधिक कृत्य है। 
पारिवारिक स्तर पर बढ़ रही व्यक्तिगत संवेदनहीनता ही परिवारों में बढ़ रहे तनाव के लिए मूल रूप से जिम्मेदार है। समाज में असहिष्णुता, अपराध, छोटी-छोटी बातों पर सामूहिक अथवा सांप्रदयिक हिंसा,  कमजोर को प्रताडि़त करना, धन के प्रति लगाव, सामाजिक अकेलापन और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। आपसी संबंधों में मात्र औपचारिकता शेष है, अपनापन कम होता जा रहा है। रिश्तों में संवेदना के स्थान पर प्राय: दिखावा बचा है। समाज में बढ़ती संवेदनहीनता के चलते युवा पीढ़ी अत्यंत आक्रामक एवं संवेदनहीन हो गई है।  प्राय: लोग अपनी खुशियों में इतने डूब जाते हैं कि सामाजिक मर्यादाओं और आसपास के लोगों को होने वाली असुविधा का कोई ध्यान नहीं रखते। सड़कों पर निकल रहे जुलूस और डीजे के शोर-शराबे से लोगों को कितनी परेशानी हो रही है, इसका कोई ध्यान नहीं रखा जाता। समाज में बढ़ती संवेदनहीनता का दुष्प्रभाव आसपास के जीव-जंतुओं और पर्यावरण पर भी पड़ रहा है। चारों तरफ घटती हुई हरियाली पर्यावरण के प्रति हमारी संवेदनहीनता का ही प्रतीक है। 
समाज से बढ़कर यह संवेदनहीनता नौकरशाही में भी आती जा रही है। नौरकशाही का मूल उद्देश्य था- नागरिकों की सुविधा, प्रशासन की पारदर्शिता और नीतियों की समानता। परंतु अब प्रशासनिक फैसले भी संवेदना के स्थान पर 'किसे खुश करना और किससे बचना हैÓ के आधार पर होने लगे हैं। 
 इस बढ़ती संवेदनहीनता की सबसे बड़ी वजह है सामाजिक मूल्यों का ह्यस और बढ़ती हुई आपसी प्रतिस्पर्धा। आज हर कोई केवल अपने तथा अपने परिवार के बारे में ही सोचता है। हर किसी को जल्दी रहती है, किसी के भी पास दूसरे के लिए जरा सा भी वक्त नहीं है। व्यक्ति खुद की समस्या के लिए तो दूसरों से मदद की अपेक्षा करता है, परंतु दूसरों को परेशान देख कर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता। लोग इतने महत्वाकांक्षी हो गए हंै कि वह दूसरे की तकलीफ में भी अपना फायदा ढूंढ़ लेते हैं। वह यह नहीं सोचते कि अगर उनके मुसीबत में फंसने पर उनकी मदद करने की जगह कोई दूसरा व्यक्ति केवल वीडियो बनाते हुए आगे बढ़ जायेगा तो उन पर क्या बीतेगी। कई दशकों पहले सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने इंसान होने की आसान कसौटी बताई थी- 'यदि तुम्हारे घर में एक कोने में आग लगी हो तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो, यदि तुम्हारे एक कमरे में लाशें सड़ रही हो तो क्या तुम दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो।Ó इस स्थिति से समाज को बाहर आना होगा।
 समाज में आ रही संवेदनहीनता की प्रवृत्ति को दूर करने के लिए सामाजिक मूल्यों को समझते हुए प्रत्येक व्यक्ति को जाति, धर्म, लिंग, वर्ग या संस्कृति के आधार पर बनी रूढ़वादी धारणाओं को छोड़कर हर व्यक्ति को सम्मान देना होगा। समाज में हो रही घटनाओं के प्रति सचेत होकर मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए अन्याय एवं अपराध के खिलाफ आवाज उठानी होगी। निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर सामुदायिक भागीदारी एवं समाज सेवा पर ध्यान देकर तथा समाज में खुले संवाद को बढ़ावा देकर ही एक अधिक समावेशी और सर्वहितकारी समाज का निर्माण हो सकेगा।
शुभकामनाओं सहित...