स्वतंत्रता किसी भी नागरिक के जीवन जीने का ऐसा संतुलित विकल्प है, जिसमें उसे संप्रभुता के अधिकार प्राप्त हों, वह अपने विचार खुल कर व्यक्त करे, सम्मान का अनुभव करे और व्यवस्था में उसकी उचित भागीदारी हो। लोकतंत्र का असली अर्थ मात्र 5 वर्ष में चुनाव कराना नहीं है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा एवं संवैधानिक अधिकारों की रक्षा, कानून के सामने बराबरी, भ्रातृत्व का विकास तथा विकास में बराबर की सहभागिता तथा स्वतंत्र संस्थाओं का सुदृढ़ीकरण होता है।


75वें स्वतंत्रा दिवस की हार्दिक बधाई। 
वर्षों की गुलामी सहने और लाखों देशवासियों की कुर्बानी के बाद हमने यह बहुमूल्य आजादी पाई है। आजादी का जश्न उल्लासपूर्वक मनाने के साथ-साथ हमें आजादी के मायनों पर भी चिंतन मनन करना होगा। 74 वर्ष की इस यात्रा का लेखा-जोखा करने का भी यह समय है। 
आजादी को परिभाषित करना बहुत मुश्किल है। हर व्यक्ति स्वतंत्र रहना चाहता है तथा अपनी बुद्धि का सही उपयोग करते हुए आजादी की सीमा तय करता है। आजादी का सही अर्थ वही समझ सकता है, जिसने गुलामी के दिन झेले हों। हमारी बीच बहुत से ऐसे लोग भी हैं जिन के लिए आजादी का मतलब मनमानी और स्वछंदता है। कोई भी समाज अपने लोगों को पूर्ण स्वतंत्रता, सापेक्षित रूप में ही दे सकता है। क्योंकि अगर समाज में हर कोई जो कुछ करना चाहता है वह कर ले, चाहे वह गलत भी हो, तो यह अराजकता होगी। 
प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तू के अनुसार लोकतंत्र को वैधानिक व्यवस्था से मर्यादित नहीं किया जावे तो उसे भीड़तंत्र में तबदील होते देर नहीं लगेगी।  लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक एवं व्यवस्था के अंग अपनी किसी भी आकांक्षा की पूर्ति के लिए पूर्णत: स्वतंत्र नहीं हैं। वह संविधान से मर्यादित हैं। अगर प्रभुसत्ता किसी कि है तो वह संविधान की है। संविधान में संशोधन के प्रावधान भी पहले से ही हैं। लोकतंत्र में माना जाता है कि जनप्रतिनिधि जो कर रहे वह जनता की ही आकांक्षा है, परंतु हमारे देश में चुनाव के अलावा जनता की आकांक्षा को जानने का कोई निरापद तरीका हम ईजाद नहीं कर पाए हैं। फलस्वरूप कई बार विकृतियां सामने आई है। 
पिछले 74 वर्षों में हमने विकास के नए आयाम छुए हैं। टैक्नोलॉजी एवं कई अन्य क्षेत्रों में हम विश्व के अग्रणी राष्ट्रों में शामिल है।  परंतु हमारी बढ़ती हुई आबादी और हाल ही के कोरोना के दुष्प्रभाव ने हमारी विकास संबंधी चुनौतियों को और भी गंभीर कर दिया है। पिछले 74 वर्ष में हम अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने में सफल हुए है। परंतु अभी भी मानव विकास के अनेक मापदंडों पर हम को अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरियां एवं अपर्याप्तता कोरोना महामारी के दौरान उजागर हो गई है। हमारी शिक्षा व्यवस्था ने बड़ी संख्या में केवल साक्षर लोग तैयार किए है परंतु अधिकांश व्यक्तियों को रोजगार दिलाने में यह सफल नहीं हुई है। परस्पर समन्वय, प्रेम, भ्रातृत्व और सच्चाई को दरकिनार कर घृणा और असहिष्णुता हम पर हावी हो रही है। राजनीति में पास्परिक वैमनस्य एवं घृणा की भूमिका गहरी होती जा रही है। अभी भी महिलाएं तथा समाज के अन्य कमजोर वर्ग, व्यवस्था में बराबरी की सहभागिता हेतु लगातार लड़ाई लड़ रहे हैं। हालात को देखकर कई बार अली सरदार जाफरी की यह पंक्तियां बरबस याद आ जाती हैं...
''कौन आजाद हुआ? 
किस के माथे से गुलामी की सियाही छूटी,
मेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी का
मादर-ए-हिन्द के चेहरे पे उदासी है वहीÓÓ 
जरूरत है कि हम देश को भ्रष्टाचार, गरीबी, नशाखोरी, अज्ञानता, सांप्रदायिक एवं जातीय वैमनस्य तथा लैंगिक मतभेद से आजादी दिलाने का हर संभव तरीके से व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रयास करें। सांप्रदायिक एवं जातीय सोच से ऊपर उठकर हम स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पुन: संकल्प लें कि हम अपने संवैधानिक मूल्यों का संरक्षण करते हुए सबको शामिल कर समन्वित विकास के लिए देश और समाज को सही दिशा में विकास के पथ पर ले जाने के लिए प्रतिबद्ध रहेंगे।
पुन: स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाओं सहित.....