हम सभी को जीवन का, स्वतंत्रता और सुरक्षा से जीने का अधिकार तथा एक शांतिपूर्ण और व्यवस्थित समाज में  रहने का अधिकार है। मानव अधिकार और पर्यावरण एक-दूसरे से जुड़े हैं। स्वच्छ, स्वस्थ और टिकाऊ पर्यावरण का अधिकार मानव अधिकारों में शामिल है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 28 जुलाई 2022 को घोषणा की कि हर किसी को स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार है। 100 से ज्यादा देश स्वस्थ, सुरक्षित और स्वच्छ पर्यारण के अधिकार को मान्यता देते हैं। मानव अधिकार सम्मान के बिना व्यवस्थित पर्यावरण शासन अस्तित्व में नहीं रह सकता। मानव समाज के लिए स्वच्छ तथा स्वास्थ्यवर्धक पर्यावरण अति आवश्यक है। मानव की गतिविधियों स्वार्थ पूर्ण एवं अनियोजित होना पर्यावरण को अत्याधिक हानि पहुंचाता है। पर्यावरण को स्वच्छ व स्वास्थ्यवर्धक बनाना मनुष्यों पर ही निर्भर करता है। 
प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक एवं स्वस्थ जीवन जीने का नैसर्गिक अधिकार प्राप्त है। पर्यावरण और मानव जाति का सम्बन्ध काफी गहरा है। सभी मानव, जीव-जंतु, वनस्पतियां, पेड़ -पौधे, जलवायु, मौसम पर्यावरण में ही समाहित हैं। जलवायु में संतुलन बनाये रखने और जीवन के लिए जरूरी चीजें उपलब्ध कराने का काम पर्यावरण करता है, इसलिए पर्यावरण की पवित्रता और मौलिकता को बनाये रखना जरूरी है।
बाह्य रूप से, हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक हमारा पर्यावरण है। हमारा पर्यावरण केवल उस हवा में नहीं है जिसमें हम सांस लेते हैं। पानी जिसे हम पीते हैं, मिटटी जिसे हम अपने आसपास पाते हैं, भोजन जिसे हम खाते हैं, यह उन सबको प्रभावित करता है और इस प्रकार हमारे स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। वाहनों, कारखानों और आग से उत्सर्जन के कारण हमारी वायु आपूर्ति विषाक्त रसायनों से भरी हुई है जो श्वांस रोग, फेफड़ों के कैंसर, हृदय रोग और अस्थमा का खतरा पेश करती है। हम जो भोजन करते हैं, उसमें कीटनाशक  शामिल होते हैं जो मिट्टी की उर्वरक क्षमता कम करते हैं और हमारे लिए कैंसरकारी हो सकते हैं।  मानव शरीर को जीवित रहने के लिए पानी की आवश्यकता होती है लेकिन हमारे जल स्रोत मानव और औद्योगिक कचरे से भरे होते हैं जो गंभीर स्वास्थ्य मुद्दों को पैदा करते हैं। बढ़ते हुए ध्वनि प्रदूषण के कारण अनिद्रा एवं मानसिक बीमारियों के प्रकरण बढ़ते जा रहे हैं। ऐरोसॉल के अत्याधिक उपयोग से ओजोन सतह की हानि हो रही है। प्रदूषित पर्यावरण का समग्र प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर अनेक बीमारियों एवं वायरस/बैक्टेरिया जनित महामारियों के रूप में सामने आता है। 
बिगड़ते पर्यावरण के कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन का पृथ्वी की भूगर्भीय, जैविक और पारिस्थितिकी प्रणालियों पर बहुत अधिक विपरीत प्रभाव पड़ता है। इन परिवर्तनों के कारण मानव स्वास्थ्य के लिए पर्यावरणीय खतरे उत्पन्न हुए हैं, जैसे कि चरम मौसम, ओजोन परत का क्षरण, जंगली भूमि में आग लगने का खतरा बढऩा, जैव विविधता का नुकसान, खाद्य उत्पादन प्रणालियों पर दबाव और संक्रामक रोगों का वैश्विक प्रसार।
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने भी पाया है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए दुनिया के सबसे अच्छे वैधानिक और नीतिगत ढांचे में से एक होने के बावजूद, भारत वायु और जल प्रदूषण और पारिस्थितिक क्षरण की एक गंभीर समस्या का सामना कर रहा है जिससे बुनियादी मानव अधिकारों के उपभोग में बाधा उत्पन्न हो रही है। इस संदर्भ में आयोग ने मई-2022  में मानव अधिकारों पर पर्यावरण प्रदूषण और इसमें गिरावट के प्रभावों को रोकने, कम करने और धीमा करने के लिए  केंद्र, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और उच्च न्यायालयों को जिन पांच प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हुए कार्यवाही करने हेतु परामर्शी जारी की है, वह हैं; प्रदूषण फैलाने वालों और पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन करने वालों को सजा, वाहनों से होने वाले प्रदूषण की रोकथाम और न्यूनीकरण एक सूचित, पारदर्शी और गैर-पक्षपातपूर्ण तरीके से विभिन्न पर्यावरण कानूनों द्वारा अनिवार्य मंजूरी/अनुमोदन मांगने वाले प्रस्तावों का प्रसंस्करण पर्यावरण प्रदूषण और इसमें गिरावट को रोकने, कम करने और धीमा करने और स्थानीय निकायों के सुदृढ़ीकरण और क्षमता निर्माण के लिए लागत प्रभावी अभिनव उपायों के विकास, प्रचार, प्रसार और प्रतिकृति के लिए आवश्यक उपाय। 
हमें यह याद रखने की जरूरत है कि हमें अपने पर्यावरण के साथ तालमेल में रहना होगा। हम इसमें जो डालेंगे वह लौटकर हमारे पास ही आयेगा। पर्यावरण सरंक्षण के बारे हमें सतर्क होकर तत्काल प्राथमिकता के आधार पर प्रभावी कार्यवाही करने की आवश्यकता है अन्यथा वह समय दूर नहीं है कि यह पृथ्वी रहने के लिए योग्य नहीं रह जायेगी। 
शुभकामना सहित