हिमालय का पारिस्थिति तंत्र, वन्य जीवन, अनमोल वनस्पतियां हमारे देश की अमूल्य प्राकृतिक संपदा है। हिमालय की नदियों से देश की लगभग 60 प्रतिशत जलपूर्ति होती है। हिमालय की जैव विविधता एवं हरीतमा खतरे में है और इसकी रक्षा के लिए अब एक राष्ट्रीय संकल्प की आवश्यकता है। अगर हिमालय सुरक्षित नहीं रहेगा तो हम और आने वाली पीढियां सुरक्षित नहीं रहेगी। इसके लिए सरकार, पर्यावरणविद, स्वयंसेवी संस्थाओं और जनसामान्य की मजबूत भागीदारी की आवश्यकता है। 

हाल ही में उत्तराखंड में ग्लेशियर के पिघलने एवं भूस्खलन के कारण आई आपदा ने हमें फिर एक चेतावनी दी है कि विकास के नाम पर हिमालय के साथ की जा रही छेड़छाड़ के क्या गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं। अफसोस है कि 1991 में उत्तरकाशी भूकंप, 1998 का मालपा भूस्खलन, 1999 का चमोली भूकंप, 2013 की केदारनाथ त्रासदी और अब 2021 की ऋषिगंगा/ तपोवन त्रासदी की चेतावनियों के बाद भी हम कुछ नहीं सीख रहे है तथा हिमालय पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यावरण नुकसान की गतिविधियां बददस्तूर जारी है। 2013 में भारी वर्षा, भूस्खलन और प्रलंयकारी बाढ़ के बाद लगा था कि सरकार और समाज एक ऐसे विकास पथ की ओर अग्रसर होंगे जिसमें हम हिमालय के परितंत्र को पुर्नजीवित करने का प्रयास करेंगे। परंतु समय बीता और बात गई। 
वर्तमान में उत्तराखंड में विभिन्न नदियों पर 14 माध्यम तथा बड़े बांध और 47 हाड्रोइलेक्ट्रीक परियोजनाएं संचालित हैं। इसके अलावा 41 अन्य योजनाएं निर्माणाधीन एवं 74 परियोजनाएं प्रस्तावित है। हिमालच प्रदेश की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है। वहां 27 परियोजनाएं कार्यरत, 8 निर्माणाधीन तथा 20 से ज्यादा प्रस्तावित हैं। इन सभी परियोजनाओं में न केवल बहुत बड़ी संख्या में पेड़ काटे जाते है वरन बहुत बड़ा क्षेत्र जलमग्न भी होता है। आने वाले समय में चारधाम के लिए बेहतर सड़क व्यवस्था बनाने के लिए 38 हजार पेड़ काटे जाने की योजना है। शक्तिशाली वर्ग पहाड़ों के ऊपर पर्यटन के नाम पर अन्य गतिविधियां गैरकानूनी तरीकों से संचालित कर रहे हैे। संरक्षित क्षेत्रों में भवन निर्माण तथा सड़क निर्माण लगातार हो रहा है। विकास के नाम पर अंधाधुंध पेड़ों कटाई, लगातार वनों से अमूल्य से प्राकृतिक संपत्ति का दोहन, हिमालय के पर्यावरण के लिए खतरा बन गए हैं। हिमालय एशिया के बड़े क्षेत्र में बदलते मौसम एवं जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करता है। 2008 से 2018 के मध्य हिमालय क्षेत्र में हरीतमा आवरण में लगभग 4700 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है तथा संपूर्ण हिमालय क्षेत्र की संम्पूर्ण जैव विविधता खतरे में है। 
प्राकृति ने हमारे ईको-सिस्टम को सभी प्राणियों के बीच संतुलन हेतु बनाया था। परंतु मानवीय मनोवृत्ति है कि हम प्रकृति पर एकछत्र अधिकार चाहते है तथा ईको-सिस्टम को क्षति पहुंचा रहे हैैं। जिससे हिमालय के ऊपर पारिस्थितिकीय संकट की स्थिति उत्पन हो गई है। जमीन का क्षरण हो रहा है और ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं। प्रति व्यक्ति आय और ऊर्जा का उपभोग एवं प्रति व्यक्ति उत्पादन पर आधारित अंतरराष्ट्रीय मानको से जुड़े मानव विकास सूचकांक को लेकर दुनिया में आर्थिक सम्पन्नता और उच्च विकास की होड लगी है। विकास की इस वैश्विक अपाधापी ने विश्व की जलवायु को परिवर्तित कर दिया है। जंगलों की कटाई के कारण जैवविविधता को हुए नुकसान के कारण जूनेटिक बीमारियां बढ़ रही हैं। शोध के अनुसार एड्स, सार्स, इबोला की तरह कोरोना वायरस भी अन्य जंतुओं के माध्यम से आया है। ओद्यौगिकीकरण एवं आधुनिकीकरण ने वनों को नष्ट कर दिया है। जंगलों की कटाई, वन्य जीवों के प्राकृतिक आश्रय स्थल कम होने और वन्य जीवों के व्यापार ने जानवरों से फैलने वाली बीमारियों को महामारी बनने का अवसर दिया है। लगभग 80 प्रतिशत आपदाएं हाइड्रो-मेट्रोलॉजीकल होती हैं, अर्थात उनका संबंध जलवायु परिवर्तन से है और इस जलवायु परिर्वतन के लिए मानव स्वयं जिम्मेदार है। 
हिमालय की अत्यंत संवेदनशील पर्यावरणीय स्थिति को देखते हुए इस विशाल पर्वतमाला को सिर्फ एक उपभोग स्त्रोत समझकर इसका दोहन नहीं किया जाए। बल्कि, समय रहते इसकी सुरक्षा व संरक्षण के लिए एक बड़ा जन अभियान खड़ा किया जाए ताकि इसकी रक्षा के लिए हम सब सोचना और कार्य करना शुरू कर दें। यह भावी पीढिय़ों के लिए हमारी सबसे बहुमूल्य विरासत होगी।


शुभकामना सहित
मीरा गांधी सिंह