जरूरत है कि इस संकट के समय में समाज को जाति, धर्म, अमीर-गरीब के विभाजन तथा वैमनस्य से दूर रखा जाए।  वास्तव में हमें बीमारी से लडऩा है  बीमार से नहीं। अनेक दशकों तक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की लगातार उपेक्षा इस गंभीर संकट में हमारे प्रयासों की अपर्याप्तता तथा महामारी के कारण फैल रहे भय के वातावरण का मूल कारण है।  सीमित स्वास्थ्य संसाधनों के प्रभावी उपयोग के लिए आवश्यक है कि सावधनियां बरतकर कोरोना को फैलने से रोका जाए।

कोरोना महामारी के चलते हमारे जीवन के अव्यवस्थित होने को लगभग 125 दिवस पूरे हो चुके हैं। इस दौरान हमारे अधिकांश क्रियाकलापों की नई सीमाएं तय हुई हैं तथा अनेक क्रियाकलाप पूर्ण रूप से बंद हो गए हैं। इस महामारी ने हमारी जीने की एक नई परिभाषा लिख दी है। हमारी वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपलब्धियों से प्राप्त अनेक संसाधन प्राय: उपयोगहीन हो चुके हैं। साथ ही यह भी लगता है कि यदि दूरसंचार क्रांति नहीं हुई होती तो इस दौर में मानव कितना अकेला हो जाता। 
हम इस दौर में प्राय: अनेक व्यक्ति कहते हैं कि उनका समय व्यतीत नहीं हो पा रहा है। प्रश्न यह है कि क्या हम  केवल समय व्यतीत करना चाहते हैं या उसका सदुपयोग करना चाहते हैं। इस संदर्भ में याद आता है कि तीन-चार दशक पहले एक कलाई घड़ी होती थी, जिसमें चाबी नहीं देना पड़ती थी। उसे पहनकर चलने-फिरने पर ही उसमें स्वचालित तरीके से चाबी भर जाती थी। यदि उस घड़ी को लंबे समय तक नहीं पहना जाता तो वह रूक जाती थी तथा समय भी थम जाता था। या हम कहें कि समय का सृजन बंद हो जाता था। यह मान्य तथ्य है कि हमारी कर्महीनता समय को रोक देती है। वास्तव में हमें समय को व्यतीत करने के स्थान पर उसका सृजन करना चाहिए। समय व्यतीत करने की जगह हम यदि अपनी हर गतिविधि में उसका सृजन करें तो पायेंगे कि हम उस गतिविधि का अधिक आनंद उठा रहे हैं तथा हमें किसी उपलब्धि का आभास भी होगा। इस कठिन दौर में स्वयं को शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हम अपने आप को रचनात्मक रूप से व्यस्त रखें। अपनी किसी हॉबी को संवारने तथा पठन-पाठन संबंधी अपना बैकलॉग पूरा करने का यह एक स्वर्णिम अवसर है। समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के निर्वहन का यह एक चुनौतीपूर्ण अवसर है क्योंकि इस समय समाज का एक बहुत बड़ा तबका सहायता के लिए उन लोगों की ओर देख रहा है जो अपेक्षतया बेहतर स्थिति में है। हम यह भी देख रहे है कि पिछले साढ़े तीन महीने में हमारी गतिविधियों पर अंकुश होने के कारण हमारे आसपास का पर्यावरण कितना सुधरा है। इस सुखद अनुभव से पर्यावरण संरक्षण के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को और मजबूत होना चाहिए तथा हमें और जोश के साथ इस कार्य में जुट जाना चाहिए। पर्यावरण संरक्षण आने वाली पीढी के लिए  हमारी बहुमूल्य सौगात होगी।
देश में कोरोना प्रभावित व्यक्तियों की संख्या 3.25 लाख से ऊपर हो चुकी है तथा लगभग 4 प्रतिशत प्रति दिन की रफ्तार से आगे बढ़ रही है तथा आर्थिक एवं अन्य गतिविधियां प्रारंभ हो चुकी है। कई अनुमानों के अनुसार 60 से 70 प्रतिशत प्रभावित व्यक्तिओं में इस बीमारी के कोई लक्षण नहीं दिखते। ऐसी दशा में कोरोना के इनफेक्शन से बचने के लिए विशेष सावधानियां बरतने की आवश्यकता है। कोई प्रभावी टीका बनने की स्थिति तक इससे बचने का एक ही उपाय है कि शारीरिक दूरी बनाए रखें तथा सेनेटाईजेशन के सिद्धांतों का पूर्ण रूप से पालन किया जाए। 
कोरोना के इस आपदा काल में कभी-कभी समाज के दो वर्गों में बंटने का आभास होता है। कोरोना पीडि़तों को इस समस्या का जनक मान कर उनसे घृणा करना उचित नहीं है। वास्तव में इस विषम परिस्थिति में हमारा सामाजिक दायित्व और बढ़ गया है कि हमारे आसपास होने वाली ऐसी हर एक गतिविधि का विरोध करे जिसके कारण यह बीमारी और अधिक फैल सकती है। हमारी सामूहिक इच्छा शक्ति तथा दृढ़ संकल्प ही हमारे इस दौर से सफलतापूर्वक बाहर निकलने का मूल मंत्र होगा। 

शुभकामना सहित