राहुल गांधी का फैसले ने खड़गे के घर में मचाई हलचल, केरल लिस्ट पर विवाद
नई दिल्ली. केरल (Kerala) में विधानसभा चुनाव (assembly elections) का बिगुल बज चुका है. वोटिंग 9 अप्रैल को होगी और नतीजे 4 मई को आएंगे. तमाम राजनीतिक पार्टियों ने कमर कस ली है. जाहिर है, जब केरल में चुनाव हैं तो दिल्ली में राजनीतिक हलचल (Political Turmoil) भी तेज होगी. लंबे समय से कांग्रेस केरल में सत्ता से दूर है, ऐसे में सत्ता में वापसी की बेचैनी दिल्ली तक साफ दिखाई दे रही है. बीती रात कांग्रेस के भीतर जो हलचल हुई उसने पार्टी के अंदर चल रही स्थिति को खुलकर सामने ला दिया. रात साढ़े दस बजे से लेकर सुबह ढाई बजे तक चला यह हाई-वोल्टेज ड्रामा सिर्फ एक बैठक नहीं था, बल्कि सत्ता की रणनीति, असहमति और नेतृत्व की पकड़ का लाइव प्रदर्शन था. मल्लिकार्जुन खड़गे के घर पर जुटे दिग्गज नेताओं के बीच माहौल गंभीर था. इसकी वजह राहुल गांधी की नाराजगी थी. केरल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस कैंडिडेट की लिस्ट जारी हो चुकी थी लेकिन राहुल गांधी ने उसे रोक दिया. सवाल उठे, फैसले बदले और पूरी प्रक्रिया पर फिर से मंथन शुरू हो गया.
यह सिर्फ टिकट बंटवारे का मामला नहीं था. यह नेतृत्व बनाम संगठन, रणनीति बनाम दबाव और चुनावी गणित बनाम जमीनी हकीकत की टक्कर थी. राहुल गांधी ने साफ संकेत दे दिया कि बिना ठोस डेटा, जातीय समीकरण और सर्वे फीडबैक के टिकट बांटना अब मंजूर नहीं होगा. सांसदों को चुनाव लड़ाने पर भी रोक लगा दी गई. इससे कई दिग्गजों की उम्मीदों पर पानी फिर गया. इस फैसले ने यह भी दिखा दिया कि पार्टी अब जोखिम लेने के बजाय सोच-समझकर कदम बढ़ाना चाहती है.
क्या हुआ बैठक में, किसे मिला झटका, किसका बढ़ा दबदबा?
रात 10:30 बजे शुरू हुई CEC बैठक तड़के 2:30 बजे तक चली. इस दौरान सबसे बड़ा फैसला यह रहा कि कोई भी लोकसभा सांसद विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेगा. के सुधाकरन, अदूर प्रकाश औरशफी परम्बिल जैसे नेताओं की उम्मीदों को झटका लगा. राहुल गांधी का तर्क साफ था अगर सांसद चुनाव लड़ेंगे तो उपचुनाव होंगे और पार्टी कमजोर पड़ेगी.
टिकट वितरण में वेणुगोपाल का दबदबा साफ नजर आया. करीब 60% उम्मीदवार उनके गुट से जुड़े बताए जा रहे हैं. वहीं रमेश चेन्निथला औरवी डी सतीशन के गुट को भी हिस्सेदारी मिली. दिलचस्प बात यह रही कि शशि थरूर ने टिकट वितरण में कोई दखल नहीं दिया.
कांग्रेस ने इस बार सोशल इंजीनियरिंग पर बड़ा दांव खेला है. ईसाई, नायर और एझावा समुदाय को संतुलित प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई है. 92 में से 52 उम्मीदवार 50 साल से कम उम्र के हैं, यानी युवाओं को प्राथमिकता दी गई है. लेकिन महिला प्रतिनिधित्व को लेकर विवाद खड़ा हो गया है, जहां केवल 9 महिलाओं को टिकट मिला.


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