संकट में भारत: युद्ध की भंवर में भी देश ने पड़ोसियों को सुनिश्चित की ऊर्जा आपूर्ति
नई दिल्ली। अमेरिका-इजरायल युद्ध ने पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को झकझोर कर रख दिया है। विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से, जहां से वैश्विक तेल और गैस का 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है, दक्षिण एशियाई देशों में हाहाकार मचा है। इस महासंकट के बीच भारत ने अपनी नेबरहुड फर्स्ट (पड़ोसी प्रथम) नीति का परिचय देते हुए उन देशों की ओर भी मदद का हाथ बढ़ाया है, जिन्होंने हाल के वर्षों में भारत विरोधी रुख अपनाया था। मालदीव और बांग्लादेश जैसे देशों ने, जो कभी इंडिया आउट और बॉयकॉट इंडिया जैसे अभियानों में मशगूल थे, आज गहरे ईंधन संकट के समय नई दिल्ली को ही अपना सबसे भरोसेमंद साथी पाया है।
मालदीव की बात करें तो राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने इंडिया आउट के नारे पर सत्ता हासिल की थी और भारतीय सैन्य कर्मियों को बाहर निकाल दिया था। हालांकि, युद्ध के कारण तेल की किल्लत और चीन से तत्काल राहत न मिलने पर उन्हें भारत का ही रुख करना पड़ा। भारत ने कूटनीतिक परिपक्वता दिखाते हुए मालदीव के पर्यटन उद्योग को बचाने के लिए आपातकालीन कोटे के तहत पेट्रोल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) की विशेष खेप भेजी है। मुइज्जू ने अब भारत को मालदीव का सबसे भरोसेमंद साझेदार स्वीकार किया है। इसी तरह, बांग्लादेश में अगस्त 2024 के सत्ता परिवर्तन के बाद उभरी भारत विरोधी भावनाओं और बॉयकॉट इंडिया अभियान के बावजूद, भारत ने मानवता को प्राथमिकता दी है। ईरान युद्ध के कारण बांग्लादेश का पावर ग्रिड और कपड़ा उद्योग ठप होने की कगार पर है। ऐसे में भारत ने मैत्री पाइपलाइन के जरिए हाई-स्पीड डीजल की आपूर्ति बढ़ा दी है। मार्च 2026 में भारत ने 15,000 टन डीजल भेजा और अगले महीने 40,000 टन अतिरिक्त आपूर्ति की योजना है। बिजली आपूर्ति को भी बिना किसी बाधा के जारी रखा गया है ताकि वहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह न ढह जाए।
श्रीलंका में भी स्थिति गंभीर है, जहां राष्ट्रपति दिसानायके के अनुरोध पर भारत ने 28 मार्च 2026 को 38,000 मीट्रिक टन ईंधन की खेप कोलंबो भेजी। श्रीलंका ने इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर का सार्वजनिक रूप से आभार व्यक्त किया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत अपनी घरेलू जरूरतों को संतुलित करते हुए पड़ोसियों को एनर्जी सिक्योरिटी प्रदान कर रहा है। ईरान युद्ध ने यह साबित कर दिया है कि वैश्विक अस्थिरता के समय जहां अन्य देश व्यावसायिक हित देखते हैं, वहीं भारत वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत पर चलते हुए एक निस्वार्थ रक्षक की भूमिका निभा रहा है।


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