होर्मुज पर बढ़ते तनाव के बीच अजीत डोभाल रियाद पहुंचे, ऊर्जा मंत्री से की मुलाकात
तेहरान। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप होर्मुज को लेकर सख्त रवैया अपनाए हुए हैं। वहीं ईरान भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। संकट गहराता जा रहा है। अमेरिकी नौसेना ने गल्फ ऑफ ओमान में ईरानी कार्गो जहाज तौस्का पर फायरिंग कर उसे जब्त कर लिया है। इधर ईरान ने सोमवार को इस्लामाबाद में होने वाली शांति वार्ता का प्रस्ताव ठुकरा दिया है। होर्मुज पर बढ़ते तनाव के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल रविवार को आधिकारिक दौरे पर रियाद पहुंचे। बता दें होर्मुज पर बढ़ते संकट के बीच भारत अब कच्चे तेल के लिए और देशों के ऑप्शन पर काम कर रहा है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इसी बढ़ते तनाव और अनिश्चितता के बीच डोभाल का यह दौरा एक औपचारिक यात्रा नहीं है, बल्कि पश्चिम एशिया में बदलते समीकरणों के बीच भारत की सक्रिय कूटनीतिक रणनीति का संकेत है। रियाद में होने वाली बैठकों में ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और आपसी सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। ऐसे समय में जब वैश्विक शक्तियां आमने-सामने हैं, भारत खुद को एक संतुलित और भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में पेश करता दिख रहा है। यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब होर्मुज में तनाव चरम पर है।
रिपोर्ट के मुताबिक अजीत डोभाल ने रियाद पहुंचकर सऊदी अरब के शीर्ष नेतृत्व के साथ कई अहम बैठकें कीं। उन्होंने ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुल अजीज बिन सलमान, विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान और अपने समकक्ष मुसैद अल-ऐबान से मुलाकात की। इन बैठकों में द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ क्षेत्रीय हालात पर विस्तार से चर्चा हुई। भारतीय दूतावास ने भी इस दौरे को रणनीतिक रूप से अहम बताया है। डोभाल की इस यात्रा का सबसे बड़ा फोकस ऊर्जा सुरक्षा रहा। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से पूरा करता है। ऐसे में सऊदी अरब जैसे देश के साथ करीबी सहयोग बेहद जरूरी है। इसके अलावा क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव और समुद्री सुरक्षा भी चर्चा का अहम हिस्सा रहे। अगर होर्मुज में तनाव बढ़ता है तो सबसे बड़ा असर तेल की कीमतों पर पड़ेगा। इससे भारत की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा समुद्री व्यापार भी प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि भारत पहले से ही वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और आपूर्ति के रास्तों पर काम कर रहा है।
भारत की विदेश नीति का आधार संतुलन, संवाद और रणनीतिक स्वायत्तता है। भारत अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी रखता है, वहीं ईरान के साथ ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के रिश्ते भी बनाए हुए हैं। यही संतुलन उसे एक विश्वसनीय और व्यावहारिक खिलाड़ी बनाता है। भारत सीधे तौर पर ‘मध्यस्थ’ का दावा नहीं करता, लेकिन बैक-चैनल बातचीत, रणनीतिक साझेदारी और बहुपक्षीय मंचों के जरिए माहौल बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है। यही वजह है कि मौजूदा संकट में भारत की कूटनीति को स्थिरता लाने वाली ताकत के रूप में देखा जा रहा है।


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