रेल दुर्घटना पीड़ित परिवार के बच्चों को कोर्ट से मिली बड़ी मदद
जबलपुर/कटनी। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने कटनी-सिंगरौली रेल मार्ग के दोहरीकरण प्रोजेक्ट में काम के दौरान अपनी जान गंवाने वाले श्रमिक कुलपत दास कुलदीप (निवासी देवरी, सिवनी) के तीन मासूम बच्चों के पक्ष में एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक निर्णय दिया है। हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक जैन ने कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त (श्रम न्यायालय) को कड़े निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि इस मामले में मुख्य फैसला सुनाने से पहले, मृतक श्रमिक के रोजगार से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर शामिल करने की अर्जी पर विधि सम्मत निर्णय लिया जाए।
हादसे में पिता और सदमे में मां को खो चुके हैं तीन मासूम
यह मर्माहत करने वाला मामला साल 2018 का है, जब रेल लाइन परियोजना में मजदूरी करते समय एक बड़ा कोयले का खंड गिरने से कुलपत दास की दर्दनाक मौत हो गई थी। इसके बाद साल 2019 में उनकी पत्नी बबली ने मुआवजे के लिए लेबर कोर्ट में दावा ठोका था। दुर्भाग्य से, कानूनी प्रक्रिया के लंबित रहने के दौरान ही वर्ष 2023 में बबली का भी आकस्मिक निधन हो गया। माता-पिता के साए से महरूम हुए 9 से 12 साल के तीन अनाथ बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उनके बुजुर्ग नाना प्रेमदास ने संभाली। अब वे ही बच्चों के कानूनी संरक्षक बनकर अदालती चौखट पर न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं।
दस्तावेजों पर विचार किए बिना अंतिम फैसले पर उच्च न्यायालय की रोक
श्रम न्यायालय में इस प्रकरण की अंतिम सुनवाई और बहस 4 मई 2026 को पूरी हो चुकी थी। इसी बीच पीड़ित बच्चों और उनके नाना को ज्ञात हुआ कि दिवंगत पिता की नौकरी और काम से जुड़े कई आवश्यक दस्तावेज कोर्ट के रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं हो पाए हैं। चूंकि बच्चे नाबालिग हैं, इसलिए उनके पास ये कागजात पहले से मौजूद नहीं थे।
बच्चों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता राकेश सिंह ने 6 मई 2026 को सिविल प्रोसिजर कोड (CPC) के नियमों के तहत संबंधित विभाग से मूल दस्तावेज तलब करने का आवेदन कोर्ट में लगाया था। जब लेबर कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण अर्जी पर तुरंत सुनवाई नहीं की, तो अनाथ बच्चों के हक के लिए मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
अर्जी खारिज होने पर भी बच्चों को मिलेगा अपील का पूरा मौका
उच्च न्यायालय ने मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए स्पष्ट आदेश दिया कि श्रम न्यायालय सबसे पहले दस्तावेजों से जुड़ी इस अर्जी का निपटारा करे, उसके बाद ही मुआवजे पर अपना अंतिम फैसला सुनाए। उच्च न्यायालय ने यह भी हिदायत दी कि यदि लेबर कोर्ट बच्चों के इस आवेदन को किन्हीं कारणों से नामंजूर भी करता है, तो पीड़ितों को उस फैसले के विरुद्ध ऊपरी अदालत में अपील दायर करने के लिए पर्याप्त और उचित समय दिया जाना अनिवार्य होगा।


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