सरकारी भवन की दुर्दशा, कहीं शौचालय तो कहीं पानी सप्लाई का केंद्र बना
मुरैना। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के पशुपालकों को घर के पास चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने के उद्देश्य से खोले गए पशु कृत्रिम गर्भाधान केंद्र विभागीय उदासीनता के कारण सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। मुरैना शहर के वार्ड नंबर-2 बड़ोखर इलाके में स्थित जीडी जैन हायर सेकेंडरी स्कूल परिसर में संचालित पशु गर्भाधान केंद्र बीते कई वर्षों से बंद पड़ा है। क्षेत्रीय निवासियों का सीधा आरोप है कि केंद्र में नियुक्त डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों की घोर लापरवाही के कारण यह महत्वपूर्ण सरकारी संस्थान अब पूरी तरह से खंडहर में तब्दील होने की कगार पर पहुंच गया है।
खंडहर हुआ सरकारी भवन, परिसर में पसरी गंदगी
स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस केंद्र के प्रभारी डॉक्टर एमएल खरे लंबे अरसे से ड्यूटी से नदारद हैं और अस्पताल नहीं आ रहे हैं। इस प्रशासनिक ढिलाई का नतीजा यह है कि केंद्र के मुख्य प्रवेश द्वार को लोगों ने खुला शौचालय बना दिया है, जिससे चारों तरफ भीषण गंदगी और दुर्गंध फैली रहती है। यही नहीं, भवन के बरामदे का फर्श धंसने के कारण वहां एक गहरा गड्ढा हो गया है, जिससे इस सरकारी इमारत के ढहने का खतरा भी लगातार बना हुआ है।
इस पूरे मामले में सबसे हैरान करने वाला खुलासा यह हुआ है कि अस्पताल परिसर के भीतर बनी पानी की टंकी और बोरवेल का लाभ मवेशियों या केंद्र को नहीं मिल रहा है। इसके विपरीत, सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करते हुए इस टंकी से पानी की सीधे सप्लाई पास में बने एक निजी मकान को दी जा रही है। आस-पास के पड़ोसियों ने बताया कि संबंधित डॉक्टर की आपसी साठगांठ और मौखिक मंजूरी के बाद ही उक्त मकान मालिक ने अपने घर तक अवैध नल कनेक्शन जोड़ रखा है।
अधिकारियों की भनक लगते ही डॉक्टर पहुंचे, खुद साफ की गंदगी
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जिम्मेदार डॉक्टर कभी-कभार ही यहाँ आते हैं, और केवल हाजिरी रजिस्टर में दस्तखत करने की औपचारिकता पूरी कर तुरंत रफूचक्कर हो जाते हैं। हालांकि, जब इस पूरे मामले और बदहाली की शिकायत मीडिया के माध्यम से विभाग के उच्च अधिकारियों तक पहुंची, तो प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में डॉक्टर तुरंत मौके पर पहुंचे और आनन-फानन में खुद ही मुख्य द्वार के सामने जमी गंदगी और मलमूत्र को साफ करवाते नजर आए।
इसके बाद जब अस्पताल के कमरों के भीतर का मुआयना किया गया, तो वहां जीवन रक्षक दवाओं के नाम पर महज कुछ पुराने इंजेक्शन मिले। दवाओं को रखने वाली ट्रे, अलमारियों और अन्य चिकित्सकीय उपकरणों पर धूल की मोटी परत जमी हुई थी, जो इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यहाँ महीनों से पशुओं के इलाज से जुड़ी कोई भी गतिविधि नहीं की गई है।
"सिर्फ कागजों पर चल रहा है अस्पताल" — तोमर साहब
पड़ोस में रहने वाले एक स्थानीय संभ्रांत नागरिक तोमर साहब ने इस अव्यवस्था पर गहरा रोष व्यक्त किया। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने सामने आज तक कभी भी किसी डॉक्टर या कर्मचारी को यहाँ नियमित रूप से आकर मवेशियों का इलाज करते नहीं देखा है। तोमर साहब का कहना था कि अस्पताल की यह जीर्ण-शीर्ण हालत और चारों तरफ पसरा सन्नाटा खुद-ब-खुद चीख-चीख कर गवाही दे रहा है कि सरकार की यह महत्वपूर्ण योजना धरातल पर दम तोड़ चुकी है और सेवाएं केवल सरकारी फाइलों और कागजों में ही संचालित दिखाई जा रही हैं। क्षेत्र के पशुपालकों ने मांग की है कि इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराकर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए।


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