कामगारों की भारी किल्लत: क्या आने वाले समय में नहीं मिलेंगे प्लंबर और इलेक्ट्रीशियन?
मुंबई | वैश्विक स्तर पर इस समय रोजगार के बाजार में एक बड़ा ढांचागत उलटफेर देखने को मिल रहा है। बाजार में 'व्हाइट कॉलर' (सफेदपोश) डिग्रीधारकों की बाढ़ आ चुकी है, लेकिन 'ब्लू कॉलर' यानी प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, बढ़ई और नर्स जैसे तकनीकी व व्यावहारिक पेशेवरों का भारी अकाल पड़ गया है। मैक्रो ट्रेंड्स रिसर्च फर्म पाइनट्री के संस्थापक रितेश जैन के एक हालिया विश्लेषण ने इस बहस को और हवा दे दी है कि आगामी पांच वर्षों में भारत के भीतर इंजीनियरों से ज्यादा प्लंबरों और इलेक्ट्रीशियन की किल्लत हो सकती है। इस व्यापक बिजनेस एक्सप्लेनर के जरिए हम समझने की कोशिश करेंगे कि क्या सचमुच भारतीय बाजार में इस प्रकार का श्रम संकट दस्तक देने वाला है।
विदेशी मांग और वैश्विक श्रम संकट के बीच भारतीय कार्यबल की स्थिति
वर्तमान में अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाएं अपनी बुजुर्ग होती आबादी और घटती जन्म दर के कारण अभूतपूर्व लेबर क्राइसिस (श्रम संकट) का सामना कर रही हैं। अपनी आर्थिक रफ्तार को बनाए रखने के लिए ये अमीर मुल्क भारत जैसे युवा आबादी वाले देशों से बड़े पैमाने पर कार्यबल को आकर्षित कर रहे हैं। इस दिशा में भारत सरकार ने भी ब्रिटेन (UK) सहित कई यूरोपीय देशों के साथ कुशल पेशेवरों की सुरक्षित आवाजाही के लिए द्विपक्षीय समझौते किए हैं। हालांकि, आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत में कामगारों की कुल संख्या का कोई अकाल नहीं पड़ने वाला है। भारत के पास इतनी प्रचुर श्रम शक्ति है कि वह अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ दुनिया भर के श्रम संकट को दूर करने की क्षमता रखता है।
दुनिया की 'स्किल कैपिटल' बनने की राह और प्रशिक्षण की बड़ी खाई
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई मंचों से यह विज़न साझा किया है कि अपनी विशाल युवा आबादी के दम पर भारत को वैश्विक स्तर पर 'स्किल कैपिटल' (कौशल राजधानी) के रूप में स्थापित होना चाहिए। सरकार की रणनीति युवाओं को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार कर वैश्विक नौकरियों के काबिल बनाने की है। विकसित देशों में बेहतर वेतन, मजबूत श्रम कानून और अच्छी कार्य संस्कृति के चलते भारतीय युवा तेजी से विदेशों का रुख कर रहे हैं। मगर, इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा 'कौशल की गुणवत्ता' का है। आंकड़ों की मानें तो भारत में लगभग पचासी प्रतिशत से अधिक श्रमबल असंगठित क्षेत्र का हिस्सा है, और मात्र चार दशमलव छह नौ प्रतिशत लोगों के पास ही किसी काम का औपचारिक प्रमाण पत्र या प्रशिक्षण है। देश में हर साल करीब एक करोड़ बीस लाख नए युवा रोजगार की तलाश में बाजार में आते हैं, जबकि हमारे पास सालाना सिर्फ चौंतीस लाख लोगों को प्रशिक्षित करने की ही औपचारिक क्षमता है।
घरेलू इंफ्रास्ट्रक्चर की रफ्तार और स्टाफिंग इंडस्ट्री से समाधान की उम्मीद
इस पूरी चुनौती का सबसे प्रभावी समाधान 'फॉर्मल स्टाफिंग इंडस्ट्री' और संगठित कार्यबल को बढ़ावा देना है। नारेडको महाराष्ट्र की वरिष्ठ उपाध्यक्ष मंजू याग्निक के मुताबिक, रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में कुशल कारीगरों की कमी एक बड़ी बाधा बन रही है, जिसे केवल बड़े पैमाने पर वोकेशनल ट्रेनिंग (व्यावसायिक प्रशिक्षण) देकर ही ठीक किया जा सकता है। सुखद पहलू यह भी है कि इस समय भारत के भीतर बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) का विकास इतनी तीव्र गति से हो रहा है कि भविष्य में कुशल श्रमिकों को आजीविका के लिए विदेश जाने की मजबूरी ही नहीं रहेगी; उन्हें अपने देश में ही सुरक्षित और सम्मानजनक काम के बेहतर अवसर मिल जाएंगे। निष्कर्ष यही है कि चुनौती कामगारों के संख्या बल की नहीं, बल्कि उनके सही प्रशिक्षण की है। यदि सरकारी एजेंसियां और निजी क्षेत्र मिलकर ट्रेनिंग की इस खाई को समय रहते पाट देते हैं, तो भारत अपनी घरेलू मांग को पूरा करते हुए दुनिया का सबसे बड़ा स्किल हब बनकर उभरेगा।


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