क्या 'इस्लामिक नाटो' के लिए कुवैत का समर्थन चाहता है पाकिस्तान? जानिए पूरा मामला
इस्लामाबाद। पाकिस्तान अपनी आर्थिक बदहाली से उबरने के लिए एक नई और विवादास्पद कूटनीति का सहारा ले रहा है, जिसे 'बैरल फॉर बूट्स' यानी 'तेल के बदले सैनिक' के मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान और कुवैत के बीच एक संभावित रक्षा समझौते को लेकर प्रारंभिक स्तर की बातचीत चल रही है। इसके तहत पाकिस्तान कुवैत को सैन्य सुरक्षा प्रदान करने के बदले तेल, गैस और बड़े निवेश की उम्मीद कर रहा है। हालांकि, क्षेत्रीय भू-राजनीति और ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण इस समझौते की राह में कई चुनौतियां भी मौजूद हैं।
रक्षा सहयोग और कुवैत की रणनीतिक प्राथमिकताएं
कुवैत की इच्छा है कि उसे पाकिस्तान से वैसे ही व्यापक रक्षा सहयोग मिले, जैसा पिछले वर्ष सऊदी अरब को प्राप्त हुआ था। इसमें हजारों पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती के साथ-साथ लड़ाकू विमान, ड्रोन और उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं। हालांकि, पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारियों ने यह स्पष्ट किया है कि वे वर्तमान में सीधे लड़ाकू सैनिकों की तैनाती पर विचार नहीं कर रहे हैं। कुवैत इन रक्षा सुविधाओं के अतिरिक्त पाकिस्तान में बॉन्डेड फ्यूल स्टोरेज बनाने की संभावनाओं पर भी गौर कर रहा है, ताकि दोनों देशों के बीच ईंधन आपूर्ति को और अधिक सुदृढ़ किया जा सके।
इस्लामिक नाटो और क्षेत्रीय रक्षा समीकरण
पाकिस्तान खाड़ी देशों के साथ मिलकर एक 'इस्लामिक नाटो' जैसे रक्षा गठबंधन के निर्माण की महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है। इस श्रृंखला में सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता पहले ही हो चुका है, जबकि तुर्की, बहरीन और जॉर्डन के साथ भी सैन्य प्रशिक्षण और हथियारों के आदान-प्रदान के लिए बातचीत जारी है। इस त्रिपक्षीय और बहु-पक्षीय रक्षा ढाँचे का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच सुरक्षा की एक सामूहिक गारंटी तैयार करना है, जहाँ एक देश पर हुआ हमला सभी देशों पर हमला माना जाएगा।
अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर घटता भरोसा
खाड़ी देशों में पाकिस्तान के प्रति बढ़ते इस सैन्य झुकाव का एक मुख्य कारण अमेरिका की सुरक्षा गारंटी के प्रति इन देशों में पैदा हुआ अविश्वास है। पश्चिम एशिया के रणनीतिक जानकारों का मानना है कि खाड़ी देश अब अमेरिका के विकल्प के रूप में एक विश्वसनीय रक्षा साझीदार की तलाश कर रहे हैं। पाकिस्तान के साथ उनके ऐतिहासिक, धार्मिक और सैन्य संबंध होने के कारण इसे एक सुरक्षित और कम संवेदनशील विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। पाकिस्तान की यह नीति न केवल उसकी अपनी गिरती अर्थव्यवस्था को बचाने का एक प्रयास है, बल्कि मध्य-पूर्व में अपनी रणनीतिक धाक जमाने की कोशिश भी है।


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