कारगिल की राजनीति में बड़ा उलटफेर, बगावत के बाद डॉ. अखून पर NC का कड़ा फैसला
श्रीनगर। लद्दाख की राजनीति में पिछले कई महीनों से चल रहे भारी सत्ता संघर्ष का शनिवार को एक निर्णायक और नाटकीय अंत हुआ। जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (जेकेएनसी) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए कारगिल स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (एलएएचडीसी) के मुख्य कार्यकारी पार्षद (सीईसी) डॉ. मोहम्मद जाफर अखून को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से छह साल के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया है।
पार्टी विरोधी गतिविधियों और बगावत का आरोप
पार्टी महासचिव हाजी अली मोहम्मद सागर के आधिकारिक निर्देश पर जारी निष्कासन पत्र में कहा गया है कि डॉ. अखून ने न केवल पार्टी के अनुशासन को तोड़ा, बल्कि उनकी गतिविधियाँ सीधे तौर पर पार्टी की संगठनात्मक विचारधारा के खिलाफ थीं। पार्टी का आरोप है कि डॉ. अखून ने संगठन के शीर्ष नेतृत्व के निर्देशों की अवहेलना करते हुए एक ऐसी राजनीतिक लाइन अपनाई, जिससे न केवल पार्टी की साख गिरी, बल्कि लद्दाख में विपक्षी दलों के साथ बने गठबंधन की नींव भी डगमगा गई।
सत्ता-साझेदारी का विवाद और भाजपा से निकटता
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह निष्कासन अचानक नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से चली आ रही सत्ता-साझेदारी की खींचतान मुख्य कारण है। आरोप है कि डॉ. अखून ने अपनी सत्ता को सुरक्षित रखने के लिए भाजपा के साथ अंदरूनी तालमेल बिठाया था। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा जोरों पर है कि उन्होंने पार्टी के हितों को दरकिनार कर अपनी कुर्सी बचाने की जो रणनीति अपनाई, वह जेकेएनसी नेतृत्व को रास नहीं आई। इस 'खुली बगावत' ने अंततः पार्टी को यह कड़ा कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया।
लद्दाख की सियासत पर पड़ेगा बड़ा असर
डॉ. मोहम्मद जाफर अखून का निष्कासन श्रीनगर से लेकर कारगिल तक की राजनीति में बड़े बदलावों के संकेत दे रहा है। एक अनुभवी नेता के पार्टी से बाहर होने के बाद, अब कारगिल स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के भीतर नए सिरे से समीकरण बनने की संभावना है। पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट संदेश दिया है कि संगठन से ऊपर कोई नहीं है और अनुशासनहीनता को किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
भविष्य की संभावनाएं
पार्टी के इस निर्णय के बाद अब डॉ. अखून के अगले राजनीतिक कदम पर सबकी निगाहें टिकी हैं। क्या वे निर्दलीय बने रहेंगे या किसी अन्य राजनीतिक दल का दामन थामेंगे, यह आने वाला समय ही बताएगा। वहीं, जेकेएनसी अब परिषद में अपनी खोई हुई पकड़ को फिर से मजबूत करने के लिए नई रणनीति पर काम करना शुरू कर चुकी है। यह घटनाक्रम न केवल कारगिल की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है, बल्कि यह जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की गठबंधन राजनीति के लिए एक बड़ा सबक भी है।


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