लंबे समय से कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटरों को न्यायालय से राहत, सरकार को जल्द निर्णय के निर्देश
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रदेशभर के विभिन्न नगरीय निकायों में पिछले लंबे समय से अपनी सेवाएं दे रहे कंप्यूटर ऑपरेटरों की अचानक सेवा समाप्ति और उनके महीनों के बकाया मानदेय के भुगतान से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक आदेश पारित किया है। माननीय उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और राज्य शहरी विकास अभिकरण (SUDA) को यह सख्त निर्देश दिया है कि वे प्रभावित कर्मचारियों द्वारा दिए जाने वाले अभ्यावेदन पर आगामी छह सप्ताह के भीतर पूरी तरह नियमानुसार और निष्पक्ष निर्णय लें।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को दिया नया अभ्यावेदन प्रस्तुत करने का अवसर
इस मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस बिभु दत्त गुरु की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता कर्मचारियों को एक नया एवं विस्तृत अभ्यावेदन संबंधित अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत करने की अनुमति प्रदान की है। अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया है कि सक्षम प्राधिकारी को प्राप्त होने वाले इस अभ्यावेदन पर कानून के दायरे में रहकर पूरी पारदर्शिता के साथ विचार करना होगा और एक स्पष्ट कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा।
लगभग 10 वर्षों से विभिन्न निकायों में अपनी सेवाएं दे रहे थे कर्मचारी
न्यायालय में याचिका दायर करने वाले कुल 11 कर्मचारी छत्तीसगढ़ के विभिन्न नगर निगमों और नगर पालिकाओं के अंतर्गत संचालित 'दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन' (DAY-NULM) के तहत पिछले करीब एक दशक (लगभग 10 वर्षों) से लगातार कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में अपनी निष्ठावान सेवाएं दे रहे थे। इन प्रभावित कर्मचारियों में भिलाई-चरौदा, दुर्ग, बलौदाबाजार, जगदलपुर, धमतरी, गरियाबंद, बैकुंठपुर, महासमुंद, कवर्धा और कांकेर जैसे प्रमुख जिलों और निकायों के कर्मचारी शामिल हैं।
मानदेय रोके जाने और अचानक सेवा समाप्त करने के आदेश को दी गई चुनौती
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में यह बात प्रमुखता से रखी गई कि उन्हें पिछले साल यानी अक्टूबर 2025 से लेकर अप्रैल 2026 तक की लंबी अवधि का मानदेय (वेतन) जारी नहीं किया गया। इसके बाद, आनन-फानन में गत 7 अप्रैल 2026 को बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के उनकी सेवाएं अचानक समाप्त कर दी गईं। इन पीड़ित कर्मचारियों ने प्रशासन के इस कदम को पूरी तरह मनमाना, अन्यायी और तानाशाहीपूर्ण बताते हुए हाईकोर्ट की शरण ली थी।
अपनी इस याचिका के माध्यम से उन्होंने अदालत से मांग की थी कि उनकी सेवा समाप्ति के आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए, उनका पिछले सात महीनों का रुका हुआ बकाया मानदेय दिलाया जाए, उनकी सेवा पुनः बहाल की जाए तथा उनकी जगह पर किसी भी अन्य आउटसोर्स या नए संविदा कर्मचारियों की नियुक्ति किए जाने पर पूरी तरह रोक लगाई जाए।
कर्मचारियों के अधिवक्ताओं ने फैसले को बताया अधिकारों का हनन
मामले की सुनवाई के दौरान कर्मचारियों की पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं ने अदालत के समक्ष जोरदार दलील दी कि किसी भी कर्मचारी से वर्षों तक लगातार काम लेने के बाद, बिना किसी वैध और ठोस कारण के उनका वेतन रोक देना और अचानक उन्हें नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा देना बिल्कुल भी न्यायसंगत नहीं है। यह सीधे तौर पर इन मेहनतकश कर्मचारियों के मौलिक और संवैधानिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है।
राज्य और केंद्र सरकार की तरफ से अदालत में दिया गया आश्वासन
सुनवाई के दौरान राज्य शासन और केंद्र सरकार के नुमाइंदों की ओर से अदालत को आश्वस्त किया गया कि यदि ये कर्मचारी अपने दावों के समर्थन में नया अभ्यावेदन विधिवत प्रस्तुत करते हैं, तो सक्षम प्रशासनिक अधिकारी निर्धारित समय-सीमा के भीतर कानून के प्रावधानों के तहत इस पर विचार कर उचित निर्णय लेने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने संबंधित सभी अधिकारियों को आगामी छह सप्ताह के भीतर इस पूरे प्रकरण का निपटारा करने का स्पष्ट निर्देश दे दिया है।


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