बाल अधिकार: मेरा बचपन को संवारों

हमारा समाज अभी बाल अधिकारों के प्रति मित्रतापूर्ण बर्ताव करना नहीं सीख पाया है क्योंकि मूलत: हमारे यहां बच्चों को उनके माता-पिता की व्यक्तिगत संपत्ति समझा जाता है न कि एक नागरिक जिसे कि उतनी ही समानता का अधिकार है जितना कि किसी अन्य व्यक्ति को। इसलिए दुनियाभर में बाल उत्पीडऩ के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। विशेषकर विकासशील और गरीब देशों में बच्चों की स्थिति इतनी खराब है कि जिसको बयान कर पाना मुश्किल है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार 0 से 18 वर्ष की उम्र का कोई भी व्यक्ति बच्चे की श्रेणी में आता है। इसी आयु वर्ग में हमारा शरीर और मन, विकास के कई आयाम हासिल करता है और सही व सकारात्मक विकास होने पर वह आगे चल कर समाज का एक बेहतर नागरिक होने का दर्जा हासिल कर सकता है। यदि इस आयु वर्ग में बच्चों का शारीरिक, मानसिक व सामाजिक विकास अवरूद्ध होता है तो वह व्यक्तिगत तौर पर बच्चों को तो प्रभावित करता ही है साथ ही वह समाज व समुदाय को भी बहुत पीछे रखता है। यदि कोई समाज बच्चों के अधिकारों पर पूर्णत: सजग नहीं व उनकी उपलब्धता के प्रति समर्पित नहीं तो वह समाज आगे चलकर ऐसे व्यक्तियों को अपने बीच पाता है जिनका व्यक्तित्व विकास, शारीरिक व मानसिक विकास सामान्य के नीचे ही रह जाता है और इसका खामियाजा वह समाज हमेशा भुगतता है।

हमारे देश की कुल जनसंख्या का 50 प्रतिशत से भी अधिक 0-20 वर्ष आयु वर्ग का है इसलिए बच्चों, किशोर-किशारियों व युवाओं के अधिकारों व उनसे सम्बद्ध विकास की नीतियों पर खूब चर्चा की जानी चाहिए तथा लोगों को इस पर जागरूक करते हुए बच्चों को सहभागी बनाने पर जोर देना चाहिए। इसके साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि हम सरकार पर दबाव बनाते हुए बाल अधिकारों की लगातार पैरवी कर सकें ताकि बच्चों का उत्पीडऩ पूर्णत: समाप्त हो व उनके सम्पूर्ण विकास की सहभागितापूर्ण परिस्थितियां बन सकें।

बच्चों के मानवअधिकार एवं वे मानक जिनको लागू कराना सभी सरकारों की जिम्मेवारी है उन्हें बहुत ही साफगोई के साथ एक अन्तर्राष्ट्रीय मानवअधिकार समझौते में दिया गया है। इसे हम ''बाल अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलनÓÓ के रूप में जानते हैं। यह सम्मेलन अब तक के इतिहास में सबसे व्यापक रूप से स्वीकृति पाया मानव अधिकारों का महत्वपूर्ण उपकरण है। संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा ने इस सम्मेलन को 20 नवम्बर 1989 को स्वीकार करते हुए कई देशों के समक्ष सहमत होने व इसको स्वीकार कर इस पर हस्ताक्षर करने हेतु प्रस्तुत किया था। इस वर्ष 20 नवम्बर को इस सम्मेलन के 25 वर्ष पूर्ण होने जा रहे है इसलिए इस तारीख के पहले व बाद में जागरूकता के कई कार्यक्रम किये जाने चाहिए। हमारे देश में यह सम्मेलन सन् 1992 में स्वीकृति पा सका था यह सम्मेलन मानव अधिकारों के व्यापक परिपालन हेतु एक विशेष तरह से बच्चों को इसके केन्द्र में रखता है।

कुछ तथ्य....

ठ्ठ 5 से 12 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों को हमारे देश में सबसे ज्यादा उत्पीडऩ झेलना पड़ता है।

ठ्ठ उत्पीडऩ के खतरे लड़कियों के साथ-साथ लड़कों पर भी समान रूप से होते हैं।

ठ्ठ करीब के लोग व विश्वसनीय लोग ही सबसे ज्यादा बच्चों को उत्पीडऩ का शिकार बनाते हैं।

ठ्ठ कुल उत्पीडि़त बच्चों में से 70 प्रतिशत बच्चे स्वयं पर हुए उत्पीडऩ की शिकायत ही नहीं दर्ज करा पाते अथवा अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को कह नहीं पाते।

ठ्ठ प्रत्येक तीन बच्चों में से 2 के साथ शारीरिक उत्पीडऩ होता है।

ठ्ठ लगभग 54 प्रतिशत बच्चों के साथ यौन उत्पीडऩ होता है।

ठ्ठ मध्यप्रदेश बच्चों से दुर्व्यवहार के मामलों में काफी आगे है।

सन् 1992 में भारत सरकार ने जब उपरोक्त सम्मेलन को अपने यहां लागू करने की आधिकारिक घोषणा की तब यह लगा कि हमारी सरकार बाल अधिकारों को सुनिश्चित करने तथा संरक्षित करने के लिए संकल्पित है जिसके लिए उसने अपनी जवाबदेही दुनिया के सामने स्वीकार कर ली है। लेकिन उपरोक्त बॉक्स में दिये गए आंकड़े किसी और तरफ ही इशारा करते है। इसलिए हमें लगता है कि अपने देश व समाज को बच्चों के प्रति मित्रवत व्यवहार वाला बनाने के लिए अभी बहुत काम किए जाने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र का बाल अधिकारों पर सम्मेलन सभी जगह के व सभी बच्चों के भेदभाव रहित अधिकारों के विषय में दुनियाभर की सरकारों के बीच एक समझौता है। यह वर्ष सम्मेलन की पच्चीसवीं वर्षगाठ है इसलिए सरकार को अपने वायदे याद दिलाने की जरूरत है। सरकार से बात करने व लोगों को इस सम्मेलन पर जागरूक करने के लिए आवश्यक होगा कि हम इन अधिकारों के विषय में अपनी समझ को बेहतर बनाएं क्योकि तभी हम इन अधिकारों का क्रियान्वयन जमीनी स्तर पर सुनिश्चित करवा सकेंगे। अत: हम यहां संक्षेप में इन अधिकारों को समझेगे व दूसरों को भी इन्हें समझने व इन पर बातचीत करने के लिए प्रेरित करेंगे। इस सम्मेलन को आगे हम संक्षेप में यूएनसीआरसी कहेंगे। जो संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन का अंग्रेजी में संक्षिप्त नाम है। 

यूएनसीआरसी के 4 प्रमुखतत्व है

1. किसी भी प्रकार का किसी भी स्तर पर विभेदन नहीं होना।

2. बच्चों के बेहतर हितों के लिए वचनबद्धता।

3. जीवन और जीवित रहने का एवं विकास का अधिकार।

4. बच्चों की राय के प्रति सम्मान।

बच्चों के अधिकारों की 4 व्यापक श्रेणियां है 

1. उत्तरजीविता अथवा जीवित रहना प्रत्येक बच्चे के अधिकार है-

ठ्ठ जीवित रहने व विकास का हक

ठ्ठ जीवित रहने के पर्याप्त मानको का होना।

ठ्ठ स्वास्थ्य के बेहतरीन मानको को प्राप्त करने तथा प्रभावी स्वास्थ्य सेवाओं का हक

ठ्ठ यदि बच्चे/ बच्चियां नि:शक्त है तो उनकी विशेष देखरेख का हक़ 

ठ्ठ सामाजिक सुरक्षा तथा बाल देखरेख की सेवाएं व सुविधाएं।

2.विकास- प्रत्येक बच्चे को हक है कि 

ठ्ठ उसे मुफ्त प्राथमिक शिक्षा मिले।

ठ्ठ वह सेकेन्डरी स्तर की शिक्षा तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण ले सके।

ठ्ठ ऐसी शिक्षा जो बच्चे के व्यक्तित्व, योग्यता तथा मानसिक व शारीरिक क्षमताओं का पूर्णत: विकास कर सके।

ठ्ठ ऐसी शिक्षा जो उन्हें स्वतंत्र समुदाय में अपने वयस्क जीवन में सक्रिय जीवन बिताने योग्य बनाए।

ठ्ठ ऐसी शिक्षा जो उसकी व उसके परिवार, सांस्कृतिक पहचान, तथा भाषा को उसके अपने देश में सम्मान दिलाए तथा उसे प्राकृतिक वातावरण मिल सके।

ठ्ठ ऐसी शिक्षा मिले जो उसमें शांति, सहनशीलता तथा बराबरी की भावना का संचार कर सके।

ठ्ठ बच्चे को फुर्सत मिले, खेलने को समय मिले तथा सांस्कृतिक व कलात्मक गतिविधियों में भाग लेते रहने के अवसर मिले। 

ठ्ठ बच्चे को अवसर मिले ताकि वह अपने संस्कृतिक, धार्मिक विश्वासों में भाग ले सके तथा अपनी भाषा का उपयोग कर सके। 

3. सुरक्षा: प्रत्येक बच्चे को विशेष सुरक्षा का हक है

ठ्ठ आपातकालीन परिस्थितियों में जैसे युद्ध या बच्चे जो अपने परिवार व घर से बिछड़े है या अलग है।

ठ्ठ जब वह कानूनी उलझनों में हो।

ठ्ठ उत्पीडऩ व शोषणकारी परिस्थितियों जैसे बालश्रम, नशीली दवाओं की लत, यौनिक शोषण, या यौन उत्पीडऩ, उन्हें बेच दिया गया हो, तथा उनका अपहरण किया गया हो।

ठ्ठ किसी भी तरह के विभेदन को वे झेल रहे हों।

4. सहभागिता: प्रत्येक बच्चे को हक है कि वह  

ठ्ठ उन सभी मामलों में सहभागी रहें जो कि उसके जीवन को प्रभावित करते हैं।

ठ्ठ उनके मत को सुना जाए व उसे गंभीरता से लिया जाए।

ठ्ठ उन्हें बोलने की या व्यक्त करने की आजादी हो।

ठ्ठ उन्हें विचार, विवेक तथा धर्म की स्वतन्त्रता हो।

ठ्ठ संबद्ध होने व शांतिपूर्ण सभा करने की अनुमति हो।

ठ्ठ विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त करने की स्वतन्त्रता।

निर्देशक सिद्धांत: सभी अधिकारों हेतु सामान्य आवश्यकताएं

धारा 1-18 वर्ष से कम आयु के सभी व्यक्तियों को इस सम्मेलन में सभी तरह के अधिकार प्राप्त हैं।

धारा 2-यह सम्मेलन सभी जाति, धर्म, योग्यता, विचार, वचन या परिवारों, जिनसे आप सम्बद्ध है, पर लागू होता है।

धारा 3- बच्चों से संबंधित सभी संगठन वह करेंगे जो हर बच्चे के लिए सबसे बेहतर है।

धारा 4 - सरकार को यह अधिकार सभी बच्चों को उपलब्ध कराने होंगे।

धारा 6 - कन्वेंशन सभी जाति, धर्म, योग्यता, विचार, वचन या परिवार के प्रकारों पर लागू है।

धारा 12 - जब व्यस्क आपको प्रभावित करने वाले निर्णय ले रहे हों तो आपको जो घटित होना है उस पर अपना विचार व्यक्त करने का अधिकार है, और आपको यह भी अधिकार है कि आपके विचार को संज्ञान में लिया जाये।

जीवन के मौलिक अधिकार तथा अपनी उच्चतम योग्यता प्राप्त करना -

धारा 7- आपको कानूनी रूप से पंजीकृत नाम व राष्ट्रीयता का अधिकार है। आपको जानने का भी अधिकार है और जहां तक संभव हो अपने अभिभावकों द्वारा देखभाल प्राप्त करने का भी अधिकार है।

धारा 9- आपको अपने अभिभावकों से तब तक अलग नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि यह स्वयं आपके हित में न हो, उदाहरण कि लिए यदि एक अभिभावक एक बच्चे से दुर्व्यवहार कर रहा है या उसकी उपेक्षा कर रहा है। यदि आपके माता-पिता अलग-अलग हो गये हों, तो आपको दोनों से संपर्क बनाये रखने का अधिकार है जब तक कि इससे आपको कोई आघात न पहुंचे।

धारा 20 - यदि आपका अपना परिवार आपकी देखभाल नहीं करता तो ऐसे लोगों को आपकी देखभाल करनी चाहिए जो आपके धर्म, संस्कृति तथा भाषा का सम्मान करते है।

धारा 22 - यदि आप देश में शरणार्थी बनकर आये है तों आपको वही अधिकार प्राप्त होने चाहिए जो देश में जन्म लेने वाले बच्चे को मिलते हैं।

धारा 23 - यदि आप किसी प्रकार की विकलांगता से प्रभावित हैं तो आपको विशेष देखभाल व सहयोग मिलना चाहिए जिससे आप एक संपूर्ण व स्वतंत्र जीवन जी सकें।

धारा 24 - आपको अच्छी गुणवत्ता की स्वास्थ्य सुविधा, साफ पानी, पौष्टिक भोजन तथा शुद्ध पर्यावरण का अधिकार है, जिससे आप स्वस्थ रहे सकें।

धारा 25 - यदि आपकी देखभाल आपके माता-पिता के बजाए स्थानीय प्राधिकार द्वारा की जा रही है तो नियमित रूप से आपकी स्थितियों की लगातार समीक्षा की जाना चाहिए।

धारा 26 - यदि आप गरीब या जरूरतमंद हैं तो आपको या आपके अभिभावकों को सरकार से सहायता प्राप्त करने का अधिकार है।

धारा 27-  आपको ऐसे जीवन स्तर को प्राप्त करने का अधिकार है जो आपकी शारीरिक तथा मानसिक जरूरतों को भली-भांति पूरा कर सके। यदि आपका परिवार आपकी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं है तो सरकार को आपके परिवार की मदद करनी चाहिए।

धारा 28 - आपको शिक्षा पाने का अधिकार है। प्राथमिक शिक्षा मुफत होनी चाहिए।

धारा 29 - शिक्षा ऐसी हो जो आपके व्यक्तित्व व प्रतिभा को उतना विकसित करे जितना अधिकतम संभव है। यह शिक्षा आपको अपने माता-पिता, अपनी, तथा अन्य संस्कृतियों का आदर करने के लिए प्रोत्साहित करने वाली होनी चाहिए।

धारा 30 - आपको अपने परिवार की भाषा व रीति-रिवाज सीखने तथा उपयोग करने का अधिकार है, चाहे यह देश की बहुसंख्य लोगों की भाषा व रीति हो या न हो। 

धारा 31 - आपको आराम करने, खेलने तथा व्यापक स्तर पर गतिविधियों में शामिल होने का अधिकार है।

धारा 42 - इस सम्मेलन की जानकारी सरकार को सभी माता-पिता व बच्चों को देनी चाहिए।

सुरक्षा अधिकार: क्षति से सुरक्षित 

होने के लिए

धारा 19 - सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि आपकी उचित देखभाल हो रही तथा आप अपने अभिभावकों या अन्य व्यक्ति जो आपका पालन-पोषण कर रहे हैं उनकी हिंसा, दुर्व्यवहार व उपेक्षा से सुरक्षित रहें। 

धारा 32 - सरकार को आपको ऐसे कार्य से सुरक्षित रखना होगा जो खतरनाक है या जिससे आपके स्वास्थ्य या शिक्षा को नुकसान पहुंच सकते हैं।

धारा 36 - आपके विकास को क्षति पहुंचाने वाली किसी भी गतिविधि से आपको सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

धारा 35- सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों का अपहरण तथा खरीद फरोख्त न हो।

धारा 11 - यदि आपको गैर कानूनी तरीके से आपके अपने देश से बाहर ले जाया जा रहा है तो सरकार को इसे रोकने के लिए कदम उठाना चाहिए।

धारा 34 - सरकार को चाहिए कि आपको लैंगिक दुर्व्यवहार से सुरक्षित रखे।

धारा 37- आप से कोई निर्दय, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए, तथा आपको दण्ड नहीं मिलना चाहिए।

धारा 40 - यदि आप पर कानून तोडऩे का आरोप है तो आपको कानूनी सहायता मिलनी चाहिए। आपको कारागार में वयस्कों के साथ नहीं रखा जाना चाहिए और हर स्थिति में आपको अपने परिवार के संपर्क में रखा जाना चाहिए। केवल अत्यधिक गंभीर अपराध के मामले में ही बच्चों को कारावास का दण्ड देना चाहिए।

सहभागिता का अधिकार: 

एक सक्रिय अभिव्यक्ति

धारा 13 - आपको सूचना पाने तथा सूचना साझा करने, मिलने-जुलने, समूह या संगठन में शामिल होने का अधिकार है जब तक कि यह आपके लिए या किसी अन्य के लिए नुकसानदायक न हो।

धारा 14- आपको जो आप चाहते हैं उसे सोचने और उसमें विश्वास रखने का, और अपने धर्म के पालन का अधिकार है जब तक कि आप किसी अन्य को अपने अधिकार का उपयोग करने से बाधित न करें। इन मामलों में अभिभावकों को आपका मार्गदर्शन करना चाहिए।

धारा 15 - आपको आपस में मिलने-जुलने और किसी समूह या संगठन में शामिल होने का अधिकार है, जब तक यह अन्य व्यक्तियों को उनके अधिकार उपयोग करने से न रोकता हो।

धारा 16 - आपको निजता का अधिकार है। कानून को आपकी जीवन शैली, आपकी प्रतिष्ठा, आपके परिवार तथा घर के विरूद्ध होने वाले आक्रमण से आपको सुरक्षित रखना चाहिए।

धारा 17 - आपको जनमाध्यमों द्वारा विश्वसनीय सूचना पाने का अधिकार है। टेलीविजन, रेडियो व समाचार पत्रों को आपको ऐसी सूचना देनी होगी जो आप समझ सकें तथा ऐसी सामग्री को बढ़ावा नहीं देना चाहिए, जिससे आपको क्षति पहुंचे।  

साभार: डॉ. राहुल