भारत को शिक्षा खर्च बढ़ाकर जीडीपी 6 फीसदी करने की जरूरत: सीआईआई
सुधीर गोरे
सन् 1964 की बात है। कोठारी आयोग ने साफ कह दिया था — देश को शिक्षा पर GDP का कम से कम 6 फीसदी खर्च करना होगा, तभी असली तरक्की होगी। साठ साल गुजर गए। सरकारें आईं, गईं। नीतियां बनीं, बदलीं। लेकिन वो 6 फीसदी का आंकड़ा आज भी दूर का सपना है।
दिसंबर 2024 में भारतीय उद्योग परिसंघ — यानी CII — ने एक तुलनात्मक अध्ययन जारी किया। इसमें आठ देशों की स्कूली शिक्षा व्यवस्थाओं को परखा गया — भारत, ऑस्ट्रेलिया, चीन, इंडोनेशिया, स्वीडन, थाईलैंड, ब्रिटेन और अमेरिका। नतीजा एक बार फिर वही पुरानी तस्वीर सामने लाया — भारत पीछे है, और यह पिछड़ापन कोई नई बात नहीं।
जब दुनिया आगे बढ़ी, हम ठहरे रहे
CII की रिपोर्ट बताती है कि पिछले छह साल में भारत का शिक्षा पर खर्च GDP के 2.7 से 2.9 फीसदी के बीच अटका रहा — एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा। इसी दौरान स्वीडन ने 6.7 से 6.9 फीसदी, ब्रिटेन ने 5.3 से 5.6 फीसदी खर्च किया। यहां तक कि इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देश भी 4 फीसदी से ऊपर रहे।
यह केवल संख्याओं का खेल नहीं है। World Bank के आंकड़े बताते हैं कि भारत में दस साल के 55 फीसदी से अधिक बच्चे एक सरल पाठ भी नहीं पढ़ पाते — इसे Learning Poverty कहते हैं — और यह आंकड़ा पूर्वी एशिया के औसत से कहीं ज्यादा है। शिक्षकों की ट्रेनिंग, स्कूलों का बुनियादी ढांचा, डिजिटल कक्षाएं और बच्चों की शुरुआती पढ़ाई — इन सब पर पर्याप्त निवेश नहीं हुआ, तो नतीजा यही होगा।
📌 "भारत में 10 साल के 55% बच्चे एक साधारण वाक्य नहीं पढ़ पाते — World Bank"
माध्यमिक स्कूल: जहां बच्चे रास्ते में छूट जाते हैं
CII रिपोर्ट में सामने आया कि भारत में प्राथमिक नामांकन दर 103.4 फीसदी है, लेकिन जैसे ही बच्चा माध्यमिक स्तर पर पहुंचता है, यह दर गिरकर 79.6 फीसदी रह जाती है। मतलब — पांच में से एक बच्चा माध्यमिक शिक्षा तक पहुंचने से पहले ही रास्ता छोड़ देता है।
दूसरी तरफ ब्रिटेन और स्वीडन में यह दर 100 फीसदी है। अमेरिका में 98, चीन में 92 और ऑस्ट्रेलिया में 90 फीसदी। Economic Survey 2024-25 के अनुसार माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने की दर 14.1 फीसदी है — जो प्राथमिक स्तर के 1.9 फीसदी के मुकाबले कई गुना ज्यादा है।
यह खाई सिर्फ इरादे से नहीं भरती — इसके लिए पैसा चाहिए, नीति चाहिए, और उसे जमीन पर उतारने की इच्छाशक्ति चाहिए।
| मुख्य तथ्य एक नजर में |
| देश | शिक्षा पर GDP का खर्च | माध्यमिक स्तर पर नामांकन दर |
|---|---|---|
| स्वीडन | 6.7–6.9% | 100% |
| ब्रिटेन | 5.3–5.6% | 100% |
| अमेरिका | ~5% | 98% |
| चीन | ~4.1% | 92% |
| ऑस्ट्रेलिया | ~4.5% | 90% |
| इंडोनेशिया | 3.7–4.3% | 82% |
| थाईलैंड | 4.0–4.3% | 80% |
| भारत | 2.7–2.9% | 79.6% |
(स्रोत: CII तुलनात्मक अध्ययन, दिसंबर 2024)
NEP 2020 का वादा — और हकीकत की दूरी
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में साफ लिखा है कि शिक्षा पर GDP का 6 फीसदी खर्च किया जाएगा। लेकिन शिक्षा बजट 2024-25 में भी यह आंकड़ा 2.7 फीसदी पर ही रुका रहा। कागज पर नीति है, बजट में नहीं।
केंद्र और राज्य सरकारें लंबे समय की मानव पूंजी निर्माण की जगह तात्कालिक खर्चों को तरजीह देती रही हैं। यह प्राथमिकताओं का सवाल है। और यही असली समस्या है।
CII अध्यक्ष संजीव पुरी ने भी इस बात को दोहराया। उन्होंने कहा कि देश के GDP का 6 फीसदी शिक्षा पर खर्च होना ही चाहिए। यह मांग न नई है, न अनजानी — बस पूरी नहीं हुई।
📌 "NEP 2020 में 6% GDP का वादा — लेकिन बजट अभी भी 2.7% पर अटका"
आगे का रास्ता
CII की रिपोर्ट ने चीन, ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन और ब्रिटेन के मॉडल से सीखने की बात कही है। यह केवल पैसे की बात नहीं — यह इस बात की भी है कि पैसा कहां लगाया जाए। शिक्षक प्रशिक्षण, डिजिटल ढांचा, ग्रामीण इलाकों में स्कूलों की गुणवत्ता — ये सब ध्यान मांगते हैं। भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। लेकिन तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था और बेहतर शिक्षा व्यवस्था — ये दोनों साथ-साथ नहीं चल रहे। जब तक शिक्षा बजट सिर्फ भाषणों में बढ़ता रहेगा और असल खर्च वहीं ठहरा रहेगा — तब तक न Learning Poverty घटेगी, न माध्यमिक नामांकन की खाई भरेगी।
साठ साल पहले कोठारी आयोग ने जो कहा था, CII आज भी वही कह रहा है। सवाल वही पुराना है — सुनेगा कौन?


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