केंद्र और राज्यों को सुप्रीम कोर्ट का आदेश: पॉलिसी तैयार करें
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक पीडि़तों के पुनर्वास को लेकर केंद्र और राज्यों को अहम निर्देश दिए हैं। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा है कि वे तेजाब हमले के पीडि़तों को सरकारी नौकरी देने के लिए स्पष्ट नीति तैयार करें। अगर किसी कारणवश उन्हें सरकारी रोजगार देना संभव नहीं है, तो उनके लिए जीवन निर्वाह भत्ता या गुजारा भत्ता देने की योजना बनाई जाए। यह निर्देश मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान दिए। पीठ ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से यह भी पूछा कि सरकारी विभागों और एजेंसियों में नौकरियों के माध्यम से एसिड अटैक पीडि़तों के पुनर्वास के लिए अब तक कोई ठोस योजना क्यों नहीं बनाई गई। अदालत ने सरकारों से इस संबंध में जवाब दाखिल करने को कहा है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यदि किसी राज्य को एसिड अटैक पीडि़तों को सरकारी नौकरी देने में लॉजिस्टिक समस्याएं आती हैं, तो कम से कम उनके लिए निर्वाह भत्ता देने की नीति तो बनाई ही जा सकती है, ताकि पीडि़तों को आर्थिक सहारा मिल सके। मामले की सुनवाई के दौरान पीडि़ता शाहीन मलिक ने अदालत से अनुरोध किया कि वह अपनी पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा के माध्यम से कराना चाहती हैं।
अदालत ने सिद्धार्थ लूथरा से इस मामले को नि:शुल्क आधार पर लेने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने स्वीकार किया। पीडि़ता ने इस संवेदनशील मामले में समयबद्ध सुनवाई की भी मांग की। अदालत को बताया गया कि एसिड अटैक पीडि़ताओं को बैंक खाता खोलने, आधार कार्ड बनवाने, संपत्ति की रजिस्ट्री कराने या मोबाइल सिम कार्ड लेने जैसी प्रक्रियाओं में गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। डिजिटल केवाईसी प्रक्रिया में पलकें झपकाने या उंगलियों के निशान देने जैसी बायोमेट्रिक प्रक्रियाएं कई बार उनके लिए संभव नहीं होतीं। इस पर पीडि़ताओं ने अदालत से अनुरोध किया कि केंद्र सरकार को निर्देश दिए जाएं कि डिजिटल केवाईसी के लिए समावेशी और वैकल्पिक व्यवस्था बनाई जाए। अदालत ने कहा कि सरकार का जवाब आने के बाद मामले की आगे सुनवाई की जाएगी।


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