बिलासपुर| स्वतंत्रता के 75 वर्षों के पश्चात भी छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सड़क सुविधा न होने का एक गंभीर मामला प्रदेश के उच्च न्यायालय तक पहुँच गया है। बिलासपुर-मरवाही बाईपास के निकट स्थित परसापानी और बंगला भाटा गांवों में सड़क और पुल की अनुपस्थिति को लेकर हाई कोर्ट ने लोक निर्माण विभाग (PWD) के सचिव से जवाब तलब किया है।

विकास की मुख्यधारा से कटे दो गांव

न्यायालय में दी गई दलीलों के अनुसार, परसापानी और बंगला भाटा के ग्रामीण आज भी एक अदद पक्की सड़क और पहाड़ी नाले पर पुल के लिए तरस रहे हैं। सड़क संपर्क न होने के कारण मानसून के दौरान यह क्षेत्र साल में कम से कम 2 से 3 महीने के लिए पूरी तरह टापू बन जाता है। इस अलगाव की वजह से ग्रामीण चिकित्सा सेवाओं, शिक्षण संस्थानों, बाजारों और आपातकालीन सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। दशकों से जारी इस उपेक्षा ने क्षेत्र के विकास को अवरुद्ध कर दिया है।

प्रशासनिक लापरवाही पर हाई कोर्ट सख्त

याचिका में बताया गया है कि ग्रामीणों ने कई बार उच्चाधिकारियों के समक्ष अपनी मांगें रखीं, लेकिन प्रशासन का रवैया उदासीन और टालमटोल वाला रहा। कोर्ट ने इसे ग्रामीणों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि अधिकारियों की इस लापरवाही के कारण ग्रामीणों को निरंतर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। अदालत ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए शासन को निर्देश दिया है कि प्रभावित गांवों को बाईपास रोड से जोड़ने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं।

PWD सचिव को व्यक्तिगत हलफनामा देने का निर्देश

राज्य सरकार के वकील ने मामले की जानकारी देते हुए बताया कि याचिकाकर्ता बिलासपुर जिले के कोटा ब्लॉक का निवासी है। इस मुद्दे की गंभीरता और बड़ी आबादी पर पड़ने वाले इसके नकारात्मक प्रभाव को देखते हुए हाई कोर्ट ने इस पर स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने लोक निर्माण विभाग के सचिव को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे इस मामले में अपना व्यक्तिगत हलफनामा (Personal Affidavit) पेश करें और बताएं कि अब तक सड़क और पुल का निर्माण क्यों नहीं हो सका।